Monday, April 14, 2014

काश “आप” थोड़े गंभीर होते...


28 दिसंबर की सर्द सुबह जब अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान पर बने मंच से दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, तो देश के लोगों में एक सिहरन सी थी. लग रहा था जैसे राजनीतिक के सारे पुराने समीकरण खारिज हो रहे हैं. डेमोक्रेसी, फॉर पीपुल, बाइ पीपुल और ऑफ पीपुल होने की ओर कदम बढ़ा चुकी है. उस दिन शपथ लेने वालों में ऐसे कई चेहरे थे जो अक्सर हमारे पास-पड़ोस की गलियों में हमसे टकरा जाते हैं. राजनीति के जरिये देश में बदलाव लाने का असंभव सा स्वप्न देखने वाले लाखों लोग जो साइकिल, मोटरसाइकिल और पैदल चलकर अपने-अपने इलाकों में ठस पड़े सिस्टम को थोड़ा-थोड़ा सरकाने में जुटे थे, उनके चेहरों पर उम्मीद की किरण दिखने लगी थी कि सबकुछ इतना असंभव भी नहीं है. यह लोकतंत्र, राजनीति और सत्ता सिर्फ पैसे वालों के खेल नहीं रह गये हैं. हम और आप भी एक विकल्प खड़ा कर सकते हैं. उन दिनों पिछले एक साल में पहली बार मोदी ब्रिगेड भी डिफेंसिव मोड में था और वामपंथी मित्र अपनी ही पार्टियों की आर्बिच्युरी लिखने लगे थे. उन दिनों पत्रकारिता के हमारे सीनियर प्रमोद जोशी जी ने फेसबुक पर लिखा था, आप को लोग गंभीरता से लेने लगे हैं, अब आप पर निर्भर है कि आप खुद को कितनी गंभीरता से लेते हैं...
वह दिन है और आज का दिन है, इस बीच में महज तीन-सवा तीन महीने हैं. उन दिनों सबकुछ बदल जाने की उम्मीद करने वालों में अब शायद 25 फीसदी लोग ही बचे हैं. शेष पचहत्तर फीसदी हताशा में एक बार फिर से लोकतंत्र के अपहरण का इंतजार कर रहे हैं. आम आदमी पार्टी का नायक टीवी में दिखने के लिए कभी भाजपा के पीएम कैंडिडेट को सीधी चुनौती देने की बात करता है, कभी थप्पड़ खाता है, तो कभी राजघाट पर बैठता है, कभी अपनी ही गलतियां स्वीकारता है. अगर टीवी चैनल दो दिन उसकी बात न करें तो वह अस्थमा के मरीज की तरह इनहेलर तलाशने लगता है. वह बार-बार कहता है मेरी औकात क्या है, और बार-बार मीडिया वालों पर चीखता है कि मीडिया बिक गयी है. उसकी हालत सिजोफ्रेनिया से पीड़ित हिंदी फिल्मों के उस प्रतिनायक जैसी है जो नायिका को दिलो जान से चाहता है, मगर नायिका उसे जब नापसंद करती है तो वह आवेग में उसे मिटा देने की कोशिश करता है. जिस तरह आजकल के असफल प्रेमी जेब में तेजाब की बोतल लेकर घूमते हैं. उसे अपनी स्थिति का भान है फिर भी वह उम्मीद रखता है कि दिल्ली में जैसे उसे 28 सीटें मिल गयी, इस बार भी देश के लोग उसे सत्ता के करीब पहुंचा देंगे. उसे 2013 के आखिरी महीने में हुए हर करिश्मे पर ऐतबार है और उसे दुहराने के लिए वह बेचैन है. इस देश एकमात्र आम आदमी पार्टी ही है जो 450 के करीब सीटों पर चुनाव लड़ रही है और जिसने किसी दल से गठबंधन नहीं किया है.
मगर 2013 के दिसंबर और 2014 के अप्रैल के बीच काफी चीजें बदल गयी हैं. तब अरविंद एक ऐसे नेता थे जिसे परखा नहीं गया था, उसके साथ जो लोग थे वे सचमुच आम थे. तब आम आदमी पार्टी अरविंद की पार्टी नहीं थे, हां अरविंद उस पार्टी के नेता जरूर थे. तब आम आदमी पार्टी कहती थी कि जीतना-हारना उसके लिए महत्वपूर्ण नहीं है, आज की तरह वे जीत के लिए मुख्तार जैसे नेताओं से समर्थन मांगने के लिए तैयार नहीं थी. तब सचमुच उस पार्टी के उम्मीदवार मुहल्ला सभाओं से चुने जाते थे. तब पार्टी में बहस और असहमतियों की गुंजाइश हुआ करती थी. आम आदमी पार्टी ने राजनीति बदलने की बात कही थी और उनके साथ जुड़े लोग सचमुच राजनीति बदलना चाहते थे. राजनीति में व्यक्तिवाद, वंशवाद, बाहुबल और धनबल का जो बढ़ता चलन था उसे खत्म करना ही उनका मकसद था.
किसी भी राजनीतिक दल को खत्म करने के पीछे सबसे बड़ा हाथ कल्चर और डिनायल का होता है. सफलता के एक झोके के बाद उन्हें लगने लगता है वे जीतने के लिए ही बने हैं और वे जो कह और कर रहे हैं वही अंतिम सत्य है. उन हालात में वे अपनी गलतियों को खुद खारिज कर देते हैं और खुद ही खुद को सर्टिफिकेट दे देते हैं कि वे सही हैं. उस दौर में कई ऐसे सलाहकार भी होते हैं जो नेता को बताते हैं कि अगर आपने गलती मान ली तो आप खत्म हो जायेंगे. राजनीति में एक अनकहा सिद्धांत है कि अगर आप कुरसी से उतर गये तो गये. इसी चक्कर में कई नेता येन-केन प्रकारेण कुरसी से चिपके रहते हैं, वे खुद तो डूबते ही हैं अपने साथ पार्टी को भी ले डूबते हैं. लालू से लेकर येदियुरप्पा तक ऐसे तमाम उदाहरण हैं. उनके बारे में आम सहमति बन जाती है कि वे दोषी हैं मगर वे तरह-तरह के कुतर्क से खुद को निर्दोष साबित करते हैं, लिहाजा जनता में उनके लिए जो थोड़ी उम्मीद होती है वह भी खत्म हो जाती है. जबकि सच्चाई यह है कि जिन लोगों ने राजनीति में अपनी गलतियां स्वीकारी हैं वे कहीं अधिक ऊंचाई पर गये हैं. सबसे बड़ा उदाहरण खुद महात्मा गांधी हैं, जिन्होंने अपनी और देशवासियों की गलतियां स्वीकार कर आजादी के आंदोलनों को कई दफा स्थगित किया और लंबा खींचा. तात्कालिक तौर पर उन्हें जरूर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा होगा, मगर आज जब हम उन बातों को देखते हैं तो वह किसी आख्यान की तरह लगता है. जैसे लगता है कि सबकुछ स्क्रिप्टेड था, ऐसा ही होना चाहिये था.
मगर आम आदमी पार्टी अपने तमाम विचारक साथियों के बावजूद कल्चर ऑफ डिनायल के फेर में फंसने से खुद को बचा नहीं सकी. चाहे राखी बिड़लान का वाहन प्रेम और उसके चलते एक बच्चे को अपराधी बनाने की कथा हो या सोमनाथ भारती का रात गये किसी परदेसी महिला के साथ निंदनीय हरकत करना हो. आज भी आम आदमी पार्टी के समर्थकों के पास इन कथाओं के भिन्न दृष्टांत हैं, मगर आम राय आज भी यही है कि इन दोनों मंत्रियों ने गलत किया और अगर वे अपनी गलतियां मान लेते तो आज बात का बतंगड़ नहीं बनता. यह सोमनाथ भारती को सच्चा साबित करने की जिद ही थी जो अरविंद को अपनी सरकार के साथ सड़क पर उतरना पड़ा. शायद आज पार्टी महसूस कर रही होगी कि अगर अरविंद सड़क पर नहीं उतरते तो सरकार से हटने की नौबत नहीं आती और आज उनकी उम्मीदवारी पर इतने सवाल नहीं होते.
आज भी सैकड़ों तर्क हैं कि क्यों एक मुख्यमंत्री को सड़क पर नहीं उतरना चाहिये और क्यों एक मुख्यमंत्री को महज चुनावी जरूरतों के लिए जनता की उम्मीदों को छोड़कर अपनी ही सरकार नहीं गिरा लेनी चाहिये. वे तर्क मजबूत भी हो सकते हैं, आप मेरे जैसे लोगों को उन तर्कों के सहारे चुप भी करा सकते हैं. मगर मेरे जैसे लाखों लोग जो आज आपके साथ नहीं है, उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि वे मानते हैं कि आप एक मंत्री के बचाव में सड़क पर उतर गये और आपने आम चुनाव में बेहतर संभावनाओं की उम्मीद में करोड़ों दिल्लीवासियों की उम्मीद की सरकार गिरा दी. आपकी 49 दिनों की सरकार की उपलब्धियों की लिस्ट जोरदार हो सकती है, मगर हम कंविंस नहीं हो पा रहे हैं और आपकी बढ़त पर भी ब्रेक लग गया है. माफ कीजियेगा आप अपने चंदों के आंकड़े बतायेंगे, मगर वे कंविंस नहीं कर पाते.
अब मैं कुछ सैद्धांतिक बातें करना चाहूंगा. आपको लोगों ने पंसद इसलिए नहीं किया था कि आप दिल्ली में सरकार बनाने वाले हैं, बल्कि इसलिए कि आप इस देश की राजनीति को सड़ांध से मुक्त करने की कोशिश कर रहे हैं. इस बात से आप से अधिक कंविंस और कोई नहीं होगा कि इस देश की राजनीति में सबसे बड़ी खामी राजनीति में धनबल, बाहुबल, जाति और धर्म का हस्तक्षेप है, इसके बाद व्यक्तिवाद और वंशवाद. अंततः इसकी वजह राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है. आपसे उम्मीद थी कि आप साबित करेंगे कि इन खामियों के बिना भी इस देश की राजनीति ठीक-ठाक चल सकती है. दिल्ली चुनाव के वक्त आपने चंदे में पारदर्शिता के जरिये धनबल से मुकाबला किया तो उम्मीदवारों में चयन के वक्त लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सहारा लेकर बाहुबल और दल के आंतरिक लोकतंत्र को स्थापित किया. एक दफा आपने एक मुसलिम नेता से मुलाकात कर उनसे समर्थन मांगा, मगर फिर भी तकरीबन आप सही राह पर चले.
मगर आम चुनाव की आपकी तैयारियों में आप खुद दिल पर हाथ रखकर कहें कि आपने चंदे की पारदर्शिता के अपने अभियान के सिवा और किस मानक का पालन किया है. आपकी पार्टी में व्यक्तिवाद हावी है, आम आदमी के नाम पर बड़े-बड़े उद्योगपति और अफसरान धड़ल्ले से आते रहे. आपने न उम्मीदवारी तय करने में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन किया और न ही अपने उस संविधान की रक्षा की जिसमें आपने तय किया था कि पार्टी में आने वाले किसी भी सदस्य को एक नियत समय तक कार्यकर्ता की तरह काम करने के बाद ही पद या कोई और जिम्मेदारी दी जायेगी.
देश भर में आपके ही कार्यकर्ता आपके द्वारा तय किये गये उम्मीदवारों के खिलाफ आवाज उठाते रहे. आपके वेबसाइट के कमेंट बॉक्स आपके उम्मीदवारों के दागी होने की सूचनाओं से भरे हैं. आप ने कुछ लोगों की उम्मीदवारी जरूर खारिज की है. साथ ही कई अवसरवादी लोग जो आपकी शोहरत के सहारे राजनीति में एंट्री मारने की उम्मीद से आपका टिकट पा गये थे, उन्होंने आपकी गिरती साख को देखकर आपके टिकट वापस कर दिये.
दिल्ली चुनाव के वक्त आप मीडिया के भरोसे मैदान में नहीं थे, मगर आज शाम में आपके यहां और कुछ हो न हो मीडिया कवरेज की समीक्षा जरूर होती होगी. जैसे मीडिया ही आपकी संजीवनी है. दिल्ली चुनाव के वक्त आपने कुछ सकारात्मक कार्य करके लोगों का अटेंशन हासिल किया था, आज आप अटेंशन हासिल करने के लिए कुछ भी करते हैं. हालांकि आप इस बात को कभी याद नहीं करते कि आप को मीडिया ने जरूरत से काफी अधिक अटेंशन दिया, और आज भी दे रहे हैं, क्योंकि पत्रकारों की बिरादरी में कई लोग आप से बदलाव की उम्मीद रखते हैं. अगर मीडिया तटस्थ होकर काम करता तो शायद आपको दस फीसदी अटेंशन भी नहीं मिलता.
अगर मैं यह कहूं कि आप में सामान्य लोकाचार का भी अभाव है तो यह गलत नहीं होगा. आपके यहां योगेंद्र यादव और मनीष सिसोदिया को छोड़कर कोई नेता तरीके से अपनी बात नहीं रखता. टीवी पर बहसों में पहुंचे आपके ज्यादातर नुमाइंदे गैरजिम्मेदार, बदजुबान और धैर्यहीन नजर आते हैं. इसके अलावा आप यह भी साबित करना चाहते हैं कि सड़क पर उतरना ही अंतिम सत्य है और आपके सड़क पर उतरने भर से ही लोग आपको राजनीति का मसीहा मान लें. मगर आप भूल जाते हैं कि लोग सड़क पर तभी उतरते हैं जब दूसरे तमाम रास्ते बंद हो जायें. अगर आप दूसरे रास्तों को टटोले बगैर सड़क पर उतर जाते हैं तो इसका मतलब यह है कि आप विद्रोह को फैशन स्टेटमेंट मानने लगे हैं. इसलिए एक राज्य सरकार के मुख्यमंत्री का सड़क पर सोना सिर्फ भावुक लोगों को प्रभावित कर सकता है मगर गंभीर लोग इसे आपका बचकाना रवैया ही मानते हैं. अब दो सवाल हैं, पहला ऐसा हुआ क्यों, दूसरा इस प्रयोग के अंजाम क्या हुए...
जहां तक ऐसा होने की वजह की बात है वह बहुत साफ है. आपने गलत को गलत मनाने से इनकार किया, आपने अपने कान बंद कर लिये, पार्टी में लोकतंत्र के सवाल को हाशिये पर रख दिया, अरविंद ही आम आदमी पार्टी है जैसे व्यक्तिवादी राजनीति को स्वीकार कर लिया और आपने सक्सेस एट एनी कॉस्ट को अपना मूल मंत्र बना लिया. सबसे महत्वपूर्ण बात आप यह भूल गये कि आपसे लोग यह अपेक्षा नहीं रखते थे कि आप कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बनें बल्कि लोगों की अपेक्षा थी कि आप इन दलों को स्वच्छ राजनीति का ककहरा सिखायें. जबकि आप बाद के दिनों में इनकी ही राह पर चलने लगे.
आपने जेपी आंदोलन के नतीजों से नहीं सीखा यहां तक कि अन्ना के पतन से भी नहीं सीखा कि किस तरह आदमी बौना दिखने लगे तो लोग उसे आसमान से गिराने में संकोच नहीं करते. आज आपके पास राजनीति में हिट होने के चंद फार्मूले हैं और हर बदलाव पर फिदा होने वाले युवाओं की फौज. कई बड़े लोग आज भी कहते हैं कि आप का होना राजनीति की परिघटना है, मगर उनके लिए आप सिर्फ एक हथियार हैं जो उनके मोदी के प्रति नफरत को तुष्ट करते हैं. दूसरों की मैं कह नहीं सकता मगर आप का योगदान बस इतना है कि आपने लोगों को एक झलक दिखायी कि प्रयास सच्चे हों तो अच्छे बदलाव लाये जा सकते हैं, मगर साथ ही आपने उन दूसरे तमाम लोगों की राह में गहरी खायी भी खोद दी है जो आने वाले दिनों में बड़ा बदलाव लाने की कोशिश करेंगे. कल को अगर कोई समूह कहेगा कि मैं देश की राजनीति में बदलाव लाना चाहता हूं तो पता नहीं लोग उनकी बातों को कितनी गंभीरता से लेंगे...

No comments: