मंजूनाथः ईमानदारी कोई स्टुपिडिटी नहीं है


फिल्म समीक्षा- मंजूनाथ
मंजूनाथ एक ईमानदार अफसर की सच्ची कहानी है जो सिस्टम को सुधारने की कोशिश में मारा गया था. मगर यह कहानी ईमानदारी की मौत की नहीं है, बल्कि इससे उलट इस कहानी में दिखाने की कोशिश की गयी है कि ईमानदारी ही अंततः जीतती है. यह समाज आमतौर पर ईमानदारी को मूर्खता समझता है और हर आदमी ईमानदार कोशिशों को समझदारी से बीच का रास्ता अपनाने की सलाह देता है. ऐसे में हमेशा सिस्टम को चुनौती देने वाला शख्त मिसफिट, बेवकूफ और कई मामलों में सनकी मान लिया जाता है. मगर मंजूनाथ की कहानी के जरिये निर्देशक संदीप वर्मा इस पूरी समझ को उलटने की कोशिश करते हैं. यह फिल्म आज 9 मई को रिलीज हो रही है.
यह फिल्म मंजूनाथ षंमुगम नामक एक दक्षिण भारतीय दलित युवक की सच्ची कहानी पर आधारित है. 2004 में आइआइएम पास आउट यह युवक अपने कैरियर की शुरुआत यूपी के लखीमपुर खीरी में इंडियन आयल कॉरपोरेशन में सेल्स ऑफिसर के रूप में करता है. मगर वहां उसका सामना डीजल में सब्सिडी वाले कैरोसिन मिलाकर बेचने वाले गिरोह से हो जाती है. वह उस गिरोह के खिलाफ कार्रवाई करना चाहता है, मगर खुद उसके साथी, उसके अफसर, दुनिया वाले और दूसरे लोग उसे समझाते हैं कि यह बड़ा खेल है इसमें उलझना बेवकूफी है. वह इस दौरान मानसिक रूप से बीमार हो जाता है, फिर बीमारी से उबर कर वह उस गैंग से टकराता है. एक पेट्रोल पंप उसकी वजह से सील भी हो जाता है. मगर इन कार्रवाइयों की वजह से पेट्रोल पंप का संचालक उसका दुश्मन हो जाता है और अंततः वह उसकी हत्या कर देता है.
मगर फिल्म मंजूनाथ की मौत के साथ खत्म नहीं होती. उसके बाद एक लंबा एंटीक्लाइमेक्स चलता है. इस एंटीक्लाइमेक्स का मकसद इस सच को स्थापित करना है कि ईमानदारी स्टुपिडिटी नहीं है. मौत के बाद भी मंजूनाथ का किरदार अपने हत्यारे से लगातार संवाद करता है. इस संवाद में हत्यारा उसे समझाने की कोशिश करता है कि वह बेवकूफ है, कोई भी मां-बाप अपने घर में मंजूनाथ जैसा बेटा नहीं चाहेगा जो भरी जवानी में उन्हें छोड़ कर चला जाये. जबकि मंजूनाथ साबित करता है कि मां-बाप उसके जैसे बेटे को क्यों चाहेंगे जो हत्यारा साबित हो रहा है. इस एंटीक्लाइमेक्स के बीच आइआइएम के छात्रों-पूर्व छात्रों का उसे न्याय दिलाने के लिए अभियान चलता रहता है. इस अभियान की अपनी विसंगतियां हैं, जैसे तमाम संवेदनाओं के बावजूद कोई इस अभियान को लीड करने सामने नहीं आता, चंदे के नाम पर महज पांच हजार रुपये इकट्ठा हो पाते हैं. इसके बावजूद लड़ाई जीती जाती है, मंजूनाथ के हत्यारे को फांसी की सजा सुनायी जाती है और फिल्म इस नोट के साथ खत्म होती है कि मंजूनाथ बनना और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए मारा जाना स्टुपिडिटी नहीं है. इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि मंजूनाथ का किरदार निभाने वाला दक्षिण भारतीय कलाकार सशो सथियश सारथी है. सारथी की यह पहली फिल्म है, वह देखने में बहुत साधारण है, मगर वह अपने अभिनय के जादू लोगों के दिल में आसानी से घर बना लेता है और पूरी फिल्म उसकी धुन पर थिरकती रहती है. इसके अलावा प्रतिनायक के रूप में यशपाल शर्मा जो पेट्रोल पंप का संचालक की भूमिका में हैं ने भी उतनी ही लाजवाब अदाकारी की है. उनका किरादर हमें यह समझने में मदद करता है कि भ्रष्टाचार में लिप्त छोटे-छोटे लोग कितने कमजोर होते हैं और कैसे मक्कारी से लेकर हत्या करने तक के हुनर में पारंगत होते चले जाते हैं. सीमा विश्वास मंजू की मां बनी हैं और उनका अभियन भी बेहतरीन है. फिल्म के आखिर में दिव्या दत्ता और विनीत नारायण नजर आते हैं, छोटी-छोटी भूमिकाओं में उन दोनों के करने लिए कुछ खास नहीं है. इसके अलावा कई और किरदार हैं जो बेहतर अभिनय करते नजर आते हैं.
दूसरे हाफ में, खास तौर पर मंजूनाथ की हत्या के बाद फिल्म की पकड़ ढीली होती है. लंबा एंटीक्लाइमेक्स संभलता नहीं है और निर्देशक संदीप वर्मा फिल्म को किसी नतीजे पर पहुंचने के दबाव में नजर आते हैं. मगर फिल्म का पहला हाफ इतना प्रभावशाली है कि दर्शकों के मन से फिल्म उतरने से पहले खत्म हो जाती है. मगर इसे बेहतर बनाया जा सकता था. सवाल यह नहीं है कि मंजूनाथ सही था या पेट्रोल पंप का संचालक. सवाल यह है कि वे लोग जो मंजूनाथ की लड़ाई से जुड़े थे, क्या वे अपने जीवन में इमानदारी को उस हद तक जगह दे पायेंगे जिस हद को मंजूनाथ ने चुना था. एक ईमानदार को हीरो बनाने से अधिक जरूरी काम पूरे समाज को ईमानदार लोगों के समूह में बदलना है. एक दृश्य में जरूर दिव्या दत्ता ऐसा हल्का सा संकेत देती है. मगर इमानदारी की लड़ाई में मारे गये योद्धा की लड़ाई उसे न्याय दिलाने की कोशिश तक में ही सिमट जाती है.
इसके बावजूद यह एक जरूरी फिल्म है. इसका बनना ही बड़ी बात थी, मगर यह बनी ही नहीं काफी खूबसूरत बनी है. पहले हाफ में आइआइएम कैंपस के दृश्य दिल को छू जाते हैं और पेट्रोल पंप मालिकों के साथ मंजूनाथ के उलझते रहने की कथा बहुत सजीव लगते हैं. एक दृश्य में अपनी मारुति कार से मंजूनाथ कहीं से लौट रहा है, रास्ते में लड़की का गट्ठर लेकर गांव जा रही बूढ़ी औरत को वह लिफ्ट देता है. कार में मंजूनाथ के साथ अपनी पोती को गोद में लिये वह बूढ़ी महिला और पीछे की सीट पर पड़ा लकड़ी का गट्ठर. इस दृश्य को कभी भुलाया नहीं जा सकता.
(प्रभात खबर के सिटी पुलआउट लाइफ @ पटना में प्रकाशित)

Comments

Ankur Jain said…
समीक्षा पढ़कर फिल्म के प्रति दिलचस्पी बढ़ गयी।।।