तो नीतीश अब बिहारियों से बदला लेना चाहते हैं


शनिवार की शाम बिहार के लोगों ने यह खबर किसी कहर की तरह आयी कि नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. शाम पांच बजे अपने प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि वे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे रहे हैं, क्योंकि लोकसभा चुनाव की अगुआई वही कर रहे थे लिहाजा इस हार की जिम्मेदारी भी उनकी ही बनती है. इस खबर को जिसने सुना वही परेशान हो गया. क्योंकि भले गिरिराज सिंह टाइप भाजपा नेता कह दें कि लगे हाथ बिहार में भी सरकार बना लेते हैं, मगर 2005 से पहले के बिहार में जिसने दिन गुजारे हैं उन्हें एक पल के लिए यही लगा कि कहीं फिर से वह दौर लौटकर न आ जाये.
यह निर्विवाद सत्य है कि 15 साल तक डिरेल रहने वाले राज्य बिहार को नीतीश कुमार ने ही पटरी पर लाया और आगे बढ़ाया है. उनके शासन ने ही बिहार को जजर्र सड़कों और अपराधियों के तांडव से मुक्ति दिलायी है. सरकारी संस्थाएं फिर से काम करने लगीं और बाद के दिनों में बिजली संकट में भी अपेक्षाकृत सुधार हुआ. गांवों में लड़कियों का बेहिचक साइकिल पर स्कूल जाना और पटना में महिलाओं का सिनेमा हॉल के नाइट शो में पहुंचना एक सिंबल बना. हालांकि यह सब सिंबलिज्म ही था, क्योंकि सब कुछ अभी भी ठीक नहीं हुआ था, इसके उदाहरण थे कोसी में भीषण बाढ़ के बाद बिहार सरकार का असहाय नजर आना, छपरा के एक स्कूल में मिड-डे मील खाकर दर्जनों बच्चों का मारा जाना और धमहरा स्टेशन के पास सड़क के अभाव में रेल की पटरियों से गुजर रहे श्रद्धालुओं के जत्थे का ट्रेन से कटकर मारा जाना. ये बिना शक प्रशासनिक विफलता के ही उदाहरण हैं.
नीतीश राज में स्कूलों की तसवीर बदली मगर पढ़ाई ठप हो गयी, अस्पतालों के भवन बने मगर स्वास्थ्य सुविधाओं को लौटाया नहीं जा सका. यहां हर पांच में से चार बच्च आज भी कुपोषित है, राइट टू सर्विस जरूर है मगर सरकारी दफ्तरों में बिना पैसा दिये आज भी कोई काम नहीं होता. कोसी के पुनर्निमाण के लिए 9 हजार करोड़ रुपये की सहायता आयी है मगर कोसी जस का तस है. यह सच है कि रातो रात तसवीर बदल नहीं सकती, मगर यह भी है कि दूसरे टर्म में उनकी निगाहें विकास पर और पीएम की कुरसी पर ज्यादा रही है. बिहार की राजनीति को करीब से समझने वाले इस बात से सहमत होंगे कि मोदी विरोध और मोदी की वजह से भाजपा से नाता तोड़ने के नीतीश के कदम की एकमात्र वजह यह है कि वे मोदी को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते रहे हैं. यह जरूर है कि उन्हें उम्मीद रही होगी कि भाजपा से नाता तोड़कर वे नवीन पटनायक की तरह बिहार की राजनीति में स्थायी हो जायेंगे और बिहार के मुसलमान लालू को छोड़कर उनके समर्थन में आ जायेंगे. इस बात पर पर्याप्त बहस हो चुकी है कि वे अगर इतने ही धर्मनिरपेक्ष मिजाज थे तो उन्होंने गुजरात दंगों के बाद एनडीए सरकार से इस्तीफा क्यों नहीं दिया. बहरहाल यह राजनीति है और एक राजनीतिक दल को राजनीतिक तरीकों से खुद को स्थापित करने का पूरा हक है.
मगर यह बात भी पूरी तरह सच है कि नीतीश सौ टका राजनेता नहीं हैं. राजनेता न जिद्दी होता है और न ही इगोइस्ट. राजनेता जनादेश को सर्वोपरि मानता है और खुद को जनमत के हिसाब से ढालता है. वह जनता को ही अंतिम सत्य मानता है और जनता से कभी बदला नहीं लेता. वह जब देखता है कि जनता ने उसके खिलाफ मत दिया है तो उसे वह सिर झुकाकर कबूल करता है और कहता है कि वह आगे जन अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा. मगर कुछ नेताओं से यह मुमकिन नहीं है, जैसे ममता बनर्जी. नीतीश भी उसी धारा के हैं, वे हार के बाद भी मानते हैं कि सही वही हैं अगर वे नहीं जीते तो इसमें दोष जनता का है.
नीतीश को बहुत पहले से इस बात का अंदाजा था कि बिहार में मोदी की लहर है और इस लहर में खुद बिहार के लोग उनके बदले मोदी को ही चुनेंगे. मगर फिर भी उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ा. यह एक जिद थी. उन्हें शायद लगता होगा कि अपनी जिद से वह तसवीर बदल सकते हैं. जबकि उनके ही दौर में मुलायम सिंह जैसे राजनेता भी थे जो बाहर कांग्रेस को गालियां देते थे और संसद में धर्मनिरपेक्षता को ढाल बनाकर कांग्रेस के समर्थन में खड़े हो जाते थे. उन्होंने इस लोकसभा चुनाव में अपने कामकाज के आधार पर बिहारियों से वोट मांगा. मगर बिहार के लोग इस बार आमदा थे कि दिल्ली की कुरसी पर हर हाल में मोदी का कब्जा हो. एक अनपढ़ बिहारी भी जो नीतीश के कामकाज का अंध समर्थक हो वह भी कह रहा था कि नीतीश तो दिल्ली में सरकार बना नहीं पायेंगे इसलिए इस बार वोट मोदी जी को दे रहे हैं. नीतीश जी को बिहार वाले चुनाव में वोट देंगे. इस चुनाव में मतदाताओं ने नीतीश को खारिज नहीं किया, बल्कि अपने तरीके से यह सुनिश्चित किया कि दिल्ली में मोदी की कुरसी मजबूत हो. वह दिल्ली में मोदी और पटना में नीतीश को देखना चाहता था और है.
मगर नीतीश जी के सामने और भी कई संकट हैं. सबसे बड़ा संकट यह है कि वे मोदी को देखना ही नहीं चाहते. अब जबकि मोदी का पीएम बनना तय है तो ऐसे में वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि औपचारिक बैठकों में भी मोदी का सामना न हो और प्रोटोकॉल निभाने के लिए भी उन्हें मोदी से हाथ मिलाना न पड़े. लिहाजा यह चुनावी नतीजे उनके लिए एक सेटबैक की तरह आये हैं. और वे इसके लिए पूरी तरह बिहार के मतदाताओं को दोषी मान रहे हैं. वे अंदर से महसूस कर रहे हैं कि जिस बिहार के लिए उन्होंने इतना कुछ किया मगर यहां के लोगों ने उनके साथ गद्दारी की. तो लो भुगतो.. आपको अगर जंगल राज ही पसंद है, तो वहीं चले जाओ.. यह इस्तीफा उनके इसी भाव का प्रदर्शन कर रहा है. बाहर से शरद विरोध और दूसरी चीजें नजर आ रही है. मगर अंदर से यह भाव प्रबल है कि नीतीश हर्ट हैं और वे प्रतिकार स्वरूप बिहारी मतदाताओं को हर्ट करना चाह रहे हैं.
अब तकरीबन यह तय है कि नीतीश मुख्यमंत्री के पद पर लौटने वाले नहीं हैं. वे अपने लिए एक मनमोहन सिंह चुनने जा रहे हैं और खुद सोनिया की तरह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहे हैं. मगर ऐसा नहीं है कि वे रिमोट कंट्रोल से सीएम को चलायेंगे. एक जिद्दी और इगोइस्ट इंसान जब हारता है तो वह सिर्फ अपना नुकसान करता है. वह पलटकर अगली लड़ाई के लिए तैयार नहीं होता, वह धीरे-धीरे अकेला और निर्विकार होता चला जाता है और खुद को सबसे अलग कर लेता है. उसकी एक ही तमन्ना होती है कि जिसने उसे दुखी किया है वह किसी कोने में बैठकर उसकी दुर्गति का नजारा देखे. इन पंक्तियों को लिखते हुए मैं यही सोच रहा हूं कि काश मेरा यह आकलन झूठ साबित हो जाये.

Comments