आदरणीय श्री जीतनराम मांझी, मुख्यमंत्री, बिहार सरकार


सबसे पहले तो अपने राज्य के एक नागरिक से शुभकामनाएं स्वीकार कीजिये. यह अलग बात है कि हमने आप को नहीं चुना है और न ही हमने जिन विधायकों को चुना था उन्होंने आपको चुना है. आप अपने पार्टी के सर्वोच्च नेता द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए अधिकृत हुए हैं. फिर भी आप हमारे मुख्यमंत्री हैं, राज्य को आगे बढ़ाने का दायित्व अब आपके ही कंधे पर है. आपसे आशाएं भी बहुत हैं.
यह अलग बात है कि आपको काम करने के लिए महज 14 महीने मिले हैं और आपके पास टीम भी अपनी नहीं है. मगर जनता को हर नये शासक से बहुत सारी उम्मीदें हैं. खास तौर पर जब से आपको महादलित सीएम कहकर बुलाने का रिवाज शुरू हुआ है, महादलितों को तो लगता है कि आपकी सरकार उनका कायाकल्प कर देगी. मगर इधर आपने शपथ ली और उधर कल एक महादलित परिवार को गांव की पंचायत ने गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया, यह खबर भी अखबारों में है.
मुझे याद है कि एक बार आपने कहा था कि मुशहरों का चूहा खाना कोई गलत बात नहीं, क्योंकि चूहा मुरगे से अधिक पौष्टिक होता है. और मुशहरों के चूहा खाने की प्रवृत्ति से फसल का नुकसान भी कम होता है. मगर यह भी सच है कि आपके राज्य का हर पांच में से चार बच्चा कुपोषित है और आपकी जाति मुशहर के बच्चों में कुपोषण का हाल बहुत बुरा है. राज्य में नौ साल से सुशासन की सरकार है और जहां तक मेरी जानकारी है आप भी लंबे समय से कल्याण मंत्री का दायित्व संभाल रहे हैं. इसके बावजूद यह शर्मनाक आंकड़ा बिहार अस्मिता की पोल खोल देता है. मुझे उम्मीद है कि आप अपने छोटे से कार्यकाल में इस आंकड़े को थोड़ा बहुत बेहतर करने की कोशिश जरूर करेंगे. आपको तो मालूम ही होगा कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है. बस आंगनवाड़ी के डिलिवरी मैकेनिज्म को बेहतर बना देने से बड़ा बदलाव आ सकता है. कमी फंड की नहीं बल्कि इसके बेहतर यूटिलाइजेशन की है. अगर आपके शासन की इस छोटी सी अवधि में अगर यह आंकड़ा बेहतर हो जाये तो इसे आपके शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जायेगी.
दूसरी बड़ी चुनौती जो मेरे हिसाब से आपके सरकार की है वह स्कूली शिक्षा की है. बिहार शायद देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां आधे शिक्षक अनुबंध पर नियुक्त हैं और इनमें बड़ी संख्या ऐसे शिक्षकों की है जो प्रशिक्षित भी नहीं हैं. इसका नतीजा यह है कि बच्चे स्कूल तो जाते हैं पर वहां से ज्ञान लेकर नहीं लौटते. स्कूलों की पढ़ाई का स्तर बहुत बेकार है और शिक्षकों व अन्य स्टाफ की कमी की वजह से स्कूल बदहाल हैं. इसी का नतीजा है छपरा में मिड डे मील में जहर होने की वजह से दर्जनों बच्चों की मौत. इसका एक ही इलाज है योग्य एवं पूर्णकालिक शिक्षकों की नियुक्ति. क्या हम आपकी अल्पकालिक सरकार से उम्मीद रख सकते हैं कि वह इस मसले पर कोई बड़ा कदम उठा पायेगी?
मुख्यमंत्री जी पिछले लंबे समय से बिहार राज्य चुनाव और दूसरे मसायलों में व्यस्त रहा है. इस बीच मई का महीना आ गया है. चुकि आप बिहार सरकार से लंबे समय से जुड़े हैं, इसलिए आपको मालूम होगा कि बिहार राज्य में मई के महीने का मतलब क्या है. पश्चिमी चंपारण से लेकर किशनगंज तक आपके राज्य के उत्तरी जिले जो नेपाल की सीमा से जुड़े हैं उनमें मई के आखिर से ही पानी उतरना शुरू हो जाता है और मानसून आने से पहले इन जिलों के कई गांवों में बाढ़ का पानी घुस जाता है. हालांकि यह सालाना आपदा है और रूटीन है फिर भी आपदा में फंसे लोगों को बचाना भी तो आपके सरकार की ही जिम्मेदारी है.
यूं तो बिहार की सरकार ने भ्रष्टाचार के मसले पर काम करके दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा है. निगरानी विभाग की सक्रियता बढ़ी है और भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्ति जब्त की गयी है. मगर बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि राजधानी पटना में गांधी मैदान से सटे समाहरणालय तक में सरकार के इस कड़े कदम का न्यूनतम असर नजर आता है. आप कभी एक सामान्य इंसान बनकर कारगिल चौक से उस ओर घुसेंगे तो पायेंगे कि कदम-कदम पर दलाल आपको टोक रहे हैं प्रमाणपत्र बनवाना है या एफिडेविट करवाना है. हर काम के लिए राजधानी से लेकर पंचायत स्तर तक दलाल तैनात हैं, रेट तय है और बिना पैसे के एक काम नहीं होता. इस मसले पर आपकी पुरानी सरकार का राइट टू सर्विस कानून भी फेल हो चुका है. यह कैसे दूर होगा इस बारे में आप कोई कदम उठायें. आपसे जनता को इस मसले पर बड़ी उम्मीदें हैं. इस अफवाह के बावजूद कि भ्रष्टाचार के खिलाफ खुद आपका ट्रैक रिकार्ड बेहतर नहीं है...
किसानों को खेत तक पानी, समय पर और उचित मूल्य पर खाद-बीज की उपलब्धता और फसल का वाजिब दाम. यह तो बड़ी मांग है. यह मांग किसान आजादी के बाद से ही हर सरकार से करते आये हैं. मगर आजतक कोई सरकार उनकी इस इकलौती मांग को पूरा नहीं कर पायी है. इसलिए आपसे इस छोटी सी अवधि में ऐसी उम्मीद रखना भी बेकार है. मगर हमें याद है कि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कई दफा कहा था कि अगर 2015 तक राज्य का बिजली संकट दूर नहीं हुआ तो वे वोट मांगने नहीं जायेंगे. मगर जहां तक मेरी जानकारी है भागलपुर जैसे बड़े शहर में आज भी 12-14 घंटे बिजली एक सपना है. राजधानी पटना तक में बिजली नियमित नहीं है, हां बिजली की दर 5 रुपये से अधिक जरूर हो गयी है. यह कैसे दूर होगा इस मसले पर आपको सोचना है.
राजधानी पटना में लाखों छात्र हजारों रुपये प्रतिमाह खर्च कर नरक जैसे हालात में जीते हैं. वे पटना पढ़ने नहीं कोचिंग करने आते हैं. राज्य में शिक्षण संस्थाएं अब छात्रों के भरोसे के लायक नहीं बचीं. आज भी बिहार के युवाओं को बेहतर शिक्षा के लिए दिल्ली और दूसरे राज्यों की ओर निकलना पड़ता है. जो हाल कुशासन के वक्त था वही सुशासन की सरकार के नौ साल होने के बावजूद है. मैं जानता हूं आपको यह जानकारी देना आपका सरदर्द बढ़ाना ही है. जो काम बड़े-बड़े नहीं कर पाये उसकी उम्मीद आपसे महज 14 महीने में करना आप पर जुल्म है. मगर आप शासक हैं तो कम से कम हालात का पता तो आपको होना चाहिये.
आपको पता होना चाहिये कि आपकी जाति की अधिकांश आबादी आज भी भूमिहीन है और आपकी सरकार ने भूमिसुधार के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. मालूम यह भी होना चाहिये कि दलितों-महादलितों की आबादी जो महज एक दशक पहले जनसंहारों की बलि चढ़ गयी थी, उनके परिजनों को न्याय नहीं मिल पाया है. मालूम आपको यह भी होना चाहिये कि आपके ही जिले के जिस दशरथ मांझी का नाम लेकर आपकी सरकार ने अपनी ब्रांडिंग की है, उनकी पतोहू की मौत पिछले दिनों इलाज न करा पाने की वजह से हो गयी. उनके गांव में तमाशा तो बहुत होता है मगर वहां भी महादलितों की हालत वैसी ही है, जैसी दशकों पहले थी. लोग उसी गंदगी में जी रहे हैं और वैसा ही दूषित जीवन. फिर भी, सिंबलिज्म ही सही, आपको सीएम बनाया तो गया है. आप अगर इनमें से कोई काम न कर सकें तो भी आपसे एक उम्मीद है. आप दलित समुदाय के अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री की मिसाल जरूर याद रखेंगे. जो तीन दफा बिहार से मुख्यमंत्री बने, केंद्र में भी लंबे समय तक मंत्री रहे. मगर जब उनकी मौत हुई तो उनके खाते में अंतिम संस्कार के पैसे तक नहीं थे. आज उनका परिवार पूर्णिया जिले के एक गांव में मेहनत मजदूरी करके जी रहा है. मैं यह नहीं कहूंगा कि आप उस परिवार की स्थिति में बदलाव लायें. आपसे इतनी ही उम्मीद करता हूं कि अगर 14 महीने में आप कोई खास काम न कर सकें तो कम से कम भोला पासवान शास्त्री की तरह इमानदार भर रहें. राज्य की तसवीर खुद ब खुद बदल जायेगी.

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