आपबीती- गैस और बैंक अकाउंट ट्रांसफर के तकनीकी झमेले


रांची से पटना आये तीन महीने गुजर चुके हैं. इस बीच मैं अपना दो काम नहीं करवा पाया हूं. ये दो काम हैं बैंक खाते और गैस कनेक्शन का ट्रांसफर. मैं पिछले चार साल से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ऑयल का उपभोक्ता हूं. इन चार सालों में मेरा रिकार्ड बेहतर और बेदाग माना जा सकता है. इसके बावजूद ये दोनों कंपनियां मेरे ऊपर इतना भी भरोसा नहीं कर रही कि तबादले के बाद मैं अपना पता जो इन्हें बता रहा हूं वह सच हो सकता है. इन्हें मेरे पटना के आवास के पते का प्रमाण पत्र चाहिये. सबसे रोचक तो यह है कि बिहार सरकार की ओर से जो स्थायी आवास प्रमाणपत्र मैंने पिछले दिनों बनवाया है, वह भी इनके लिए दो कौड़ी का है. अगर मेरा मकान मालिक मेरे साथ रेंट एग्रीमेंट करे और उसकी कॉपी मैं इन दोनों कंपनियों को उपलब्ध कराऊं तभी वे मानेंगे कि मैं पटना में फलां पते पर रह रहा हूं.
अच्छा, यह भी दिलचस्प है कि मैं जिनका किरायेदार हूं, न उन्हें रेंट एग्रीमेंट कराने में दिलचस्पी है और न मुङो. मगर हो सकता है कि लाचार होकर मुङो उनसे रेंट एग्रीमेंट कराना पड़े. क्योंकि इन दोनों कंपनियों की मुङो कदम-कदम पर जरूरत है.
मैं पिछले तीन महीने से तकरीबन हर हफ्ते अपने ऑफिस जाने के वक्त में से वक्त चुराकर इनके दफ्तरों में दो या तीन दिन हाजिरी लगाता हूं. मगर काम आगे नहीं बढ़ पा रहा. पहले गैस एजेंसी की कथा सुनिये. पहली विजिट में मुङो एक फार्मेट थमाया गया और कहा गया कि इसका एफिडेविट बनवा लूं. साथ में रेसिडेंशियल प्रूफ मांगा गया. लगभग दो सौ रुपये खर्च कर मैंने एफिडेविट बनवा लिया और पहले बेटी की एडमिशन के लिए फार्म भरने के सिलसिले में एक आवासीय प्रमाणपत्र बनवाया था उसकी प्रति ली और गैस एजेंसी पहुंचा. मैं निश्चिंत था कि अब मेरे पास एफिडेविट भी है और रेसिडेंशियल प्रूफ भी. उस बार एजेंसी वाले ने रांची से मिले ट्रांसफर के पेपर पर गौर किया और कहा कि इसमें कुछ गड़बड़ी है, आप इंडियन ऑयल के सेल्स ऑफिसर से मिल लीजिये. वहां गया तो पता चला कि सेल्स ऑफिसर महीने की एक और 15 तारीख को ही मिलते हैं. एक तारीख को गया तो उन्हें एजेंसी वाले को फोन पर समझा दिया कि गड़बड़ी कुछ नहीं है. आप इस तरह करें तो सब ठीक हो जायेगा. मैं खुशी-खुशी अगले दिन एजेंसी पहुंचा.
मगर इस बार एजेंसी वाले ने मेरे पेपर पर गौर किया और कहा आपका रेसिडेंशियल प्रूफ नहीं चलेगा. मैं चकित रह गया, राज्य सरकार का आवासीय प्रमाणपत्र रेसिडेंशियल प्रूफ नहीं माना जा रहा है. उन्होंने कहा वे कुछ नहीं कर सकते. वोटर आइडी, ड्राविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, जमीन या मकान के कागजात वगैरह कुछ भी जिस पर आपका पटना का पता हो ले आइये, काम चल जायेगा. मगर मैं जब पटना का निवासी ही नहीं हूं, तबादले के बाद यहां आया हूं तो भाई मेरे पास इन कागजात पर पटना का पता कैसे हो सकता है. फिर उन्होंने कहा, रेंट एग्रीमेंट करवाइये या बैंक खाते पर पटना का पता हो तो वही ले आइये.
साथ-साथ मेरे बैंक खाते के ट्रांसफर का भी मसला चल रहा था. मैंने सोचा यही करवा लूं. वहां खाता तो ट्रांसफर हो गया था, अब मुझसे फिर से केवाइसी मांगा जा रहा था. जैसे पिछले पांच साल से वे मेरे बारे में कुछ नहीं जानते थे और अब नो योर कस्टमर वाला फार्म भरवा रहे थे. खैर. मैंने उसे भी भर दिया. आइडेंटिटी प्रूफ के लिए पैन कार्ड की कॉपी लगायी और एड्रेस प्रूफ के लिए बैंक के स्टॉफ की सलाह पर मकान मालिक का बिजली बिल उनके हस्ताक्षर के साथ पेश कर दिया. पांच दिन बात पहुंचा तो पता चला कि मेरा केवाइसी फार्म ही खो गया है. खैर दो दिन बाद फाम्र मिल गया. अब मुङो लगा कि काम हो जायेगा. मगर तीन दिन बाद भी काम नहीं हुआ तो पूछने गया. इस पर मुङो बताया गया कि वे कैसे मान सकते हैं कि बिजली बिल पर जो मकान मालिक के हस्ताक्षर हैं वे असली हैं. इसके लिए अगर मकान मालिक का एसबीआई का अकाउंट है तो नंबर लाइये, हम सिग्नेचर वेरिफाइ कर लेंगे. मकान मालिक का अकाउंट किसी और बैंक में है, लिहाजा मामला वहीं फंस गया. कहा गया अब एक ही रास्ता है रेंट एग्रीमेंट कराइये.
यानी रेंट एग्रीमेंट के बिना कोई राह नहीं है. मगर इस रेंट एग्रीमेंट की कीमत संभवत: ग्यारह-बारह सौ है. क्योंकि जैसी जानकारी है कि पटना में कोई भी एग्रीमेंट हजार रुपये के स्टांप पेपर पर ही होता है.
यह मेरी आपबीती है, इसलिए मैं इस परेशानी को समझ पा रहा हूं कि सरकारी व्यवस्था कैसे लोगों को तकनीकी बहानों में उलझाकर परेशान कर देती हैं. इन हालात में सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि इस देश के गरीब और कम पढ़े लिखे लोगों से यह व्यवस्था कैसे पेश आती होगी. मेरे गांव की एक महिला जो महादलित समुदाय से आती है का कभी बीपीएल कार्ड नहीं बन पाया. वे मनरेगा का जॉब कार्ड बनवाने के लिए पांच साल से परेशान हैं. उसे विधवा पेंशन नहीं मिलता. इंदिरा आवास के बारे में तो उसने सोचना ही छोड़ दिया है. गांव से लेकर शहर तक यह सामान्य सिद्धांत बन गया है कि सरकारी काम कराना है तो किसी दलाल को पकड़ना होगा. ये दलाल हर दफ्तर के बाहर दर्जनों की संख्या में हाजिर हैं सौ, दो सौ पांच सौ लेकर आपका काम करने के लिए. आप सीधे जाकर किसी दफ्तर से बिना घूस दिये कोई प्रमाणपत्र नहीं बनवा सकते.
यह लाल फीताशाही हाल के वर्षों में विकसित हुई है. वोटर कार्ड वोट डालने से अधिक दूसरे दस तरह के काम में इस्तेमाल होने लगा है. कल को अगर एटीएम से पैसे निकालने से पहले वोटर कार्ड की फोटोकॉपी गार्ड को देने का नियम बना दिया जाये तो कोई आश्चर्य नहीं. इन सबकी वजह यह है कि कुछ लोग आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हैं और इन सेवाओं का उपयोग करते हैं. मगर इसके लिए पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों को सजग करने की जरूरत है, न कि पूरे देश को शक और शुब्हे की निगाह से देखने की.
अगर मैं स्टेट बैंक और इंडियन ऑयल का चार साल से ग्राहक हूं तो तबादले के बाद मैं जो पता उन्हें दे रहा हूं उस पर उन्हें क्यों भरोसा नहीं होना चाहिये. जिस बैंक में हर महीने मेरी तनख्वाह आती है, जिस कंपनी से मैं हर साल छह-सात सिलिंडर खरीदता हूं. उसे अपने पांच साल पुराने ग्राहक पर इतना भी भरोसा क्यों नहीं. जहां वोटर आइडी, राशन कार्ड और दूसरी सेवाओं की पोर्टिबिलिटि की बात चल रही है, वहां गैस या बैंक अकाउंट ट्रांसफर करने में इतने झमेले क्यों?

Comments

Anonymous said…
आइए मिल कर रोते हैं,मेरा तो वॉटर आई डी ही खो गया था ,डेढ़ साल बाद मिला इस बीच में ने क्या क्या न झेला
topper said…
आइए मिल कर रोते हैं,मेरा तो वॉटर आई डी ही खो गया था ,डेढ़ साल बाद मिला इस बीच में ने क्या क्या न झेला -----होना कुछ नहीं है