Wednesday, May 28, 2014

बहाने स्मृति ईरानी याद बाबू लंगट सिंह की


उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर में एक कॉलेज है लंगट सिंह महाविद्यालय. इस कॉलेज की स्थापना 1899 में लंगट सिंह ने की थी. तकरीबन निरक्षर लंगट सिंह रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते थे. कहते हैं एक अंग्रेज अधिकारी की जान बचाने के चक्कर में उनके पांव कट गये थे, इसी वजह से उन्हें लोग लंगट सिंह कह कर पुकारते थे. बाद में उस अधिकारी की कृपा से उन्हें रेलवे के ठेके मिलने लगे और उन्होंने जब ठीक-ठाक पैसा कमा लिया तो पहला काम यह किया कि अपनी तमाम जमा पूंजी से अपने इलाके में ऑक्सफोर्ड की तर्ज पर इस भव्य कॉलेज का निर्माण करवाया. उस वक्त आसपास के कई जिलों में कोई कॉलेज नहीं था. उस अनपढ़ व्यक्ति ने कॉलेज क्यों खुलवाया, कहते हैं कि उसे मालूम पड़ गया था कि आने वाले जमाने में पढे-लिखे ही आगे बढ़ पायेंगे. उनके इलाके के नौजवान पिछड़ न जायें, उनकी फिक्र इसी बात को लेकर थी. बाद में इसी कॉलेज ने हमें हमारा पहला राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद दिया, जिनकी मेधा के चर्चे वैसे ही मशहूर हैं. उस दौरान मिथिला के महाराजा ने बीएचयू के निर्माण के लिए लाखों रुपये दान दिये थे, मगर पता नहीं उनके दिमाग में यह क्यों नहीं आया कि उत्तरी बिहार में भी एक बढ़िया कॉलेज की जरूरत है. जबकि महाराज शिक्षित लोगों के बड़े कद्रदान माने जाते थे. यह प्रसंग हमें बताता है कि शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए हमेशा बहुत अधिक पढ़ा लिखा व्यक्ति ही कारगर नहीं होता है, कई दफा अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोग शिक्षा की अहमियत को ज्यादा समझते हैं. यह कहानी खास तौर पर स्मृति ईरानी को लेकर चल रही बहस के दौरान याद आ रही है.
झारखंड में खलारी पंचायत की मुखिया हैं तेजी किस्पोट्टा. वे भी बहुत पढ़ी-लिखी नहीं हैं, बहुत साधारण महिला हैं. मगर अपने पंचायत में शिक्षा के विकास के लिए उन्होंने असाधारण सूझ-बूझ का परिचय दिया है. उन्होंने अपने पंचायत के पांचों स्कूल में मिड-डे मील बनाने वाले कुक की भरती करते वक्त ध्यान रखा कि वे कम से कम इंटरमीडियेट पास हों. ताकि अगर स्कूल में शिक्षक न हों तो वे खाना पकाने के साथ-साथ बच्चों को पढ़ा भी सकें. इसके बहुत शानदार नतीजे सामने आये.
अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी महिलाएं शिक्षा को महत्व को पुरुषों के मुकाबले बेहतर समझती हैं. आपने अपने आसपास कई ऐसी औरतों को देखा होगा जो बरतन मांजकर, सिलाई करके और दूसरे काम करके अपने बच्चों को पढ़ाती हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि अगर हालात बदलने हैं तो उसका सबसे बेहतर जरिया शिक्षा ही है. पिछले साल झारखंड के बोर्ड में एक दर्जी के बेटे ने टॉप किया था, इस बार बिहार इंटरमीडियेट की परीक्षा में एक गैस वेंडर के बेटे ने बाजी मारी है. दोनों बच्चों के अभिभावक बहुत कम पढ़े-लिखे थे, मगर वे समझते थे कि अगर उनका बच्च पढ़ लिख जायेगा तो उसे सिलाई के काम या गैस की ढुलाई जैसा काम नहीं करना पड़ेगा.
इन दिनों हर जगह स्मृति ईरानी की डिग्री और उसे मिली जिम्मेदारी पर तीखी बहस चल रही है. इस बहस में मोदी की सबसे बड़ी प्रशंसक मधु किश्वर जैसी महिलाएं भी शामिल हैं. पता नहीं मोदी ने स्मृति ईरानी में क्या खूबियां देखीं कि उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रलय जैसा महत्वपूर्ण विभाग थमा दिया. अगर सिर्फ पद देखकर खुश करने की बात होती तो वे उन्हें सूचना प्रसारण मंत्रलय भी दे सकते थे और इस पर किसी को आपत्ति भी नहीं होती. मगर नहीं, उन्होंने स्मृति को शिक्षा के प्रसार का दायित्व दिया है, यह जानते हुए कि स्मृति महज इंटर पास है. यह अनजाने में हुई कोई गलती हो ऐसा नहीं लगता, क्योंकि मंत्रलय की सूची फाइनल करने के दौरान काफी विचार-विमर्श हुआ है. इसलिए लगता यही है कि मोदी और मंत्रलय फाइनल करने वाले लोगों ने जरूर स्मृति में कोई ऐसी संभावना देखी है कि उन्हें इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है.
स्मृति के बारे में जानकारी जुटाते हुए पता चलता है कि उनकी पढ़ाई लिखाई ठीक से नहीं हो पायी. संभवत: उनके परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से. दसवीं की पढ़ाई करते वक्त स्मृति खुद नौकरी भी करने लगी थी ताकि फीस और दूसरे खर्चो का जुगाड़ कर सके. बहरहाल बारहवीं के बाद उनके कैरियर की दिशा बदल गयी और वे सौंदर्य प्रतियोगिताओं के जरिये एक्टिंग के फील्ड में किस्मत आजमाने लगीं. हालांकि जानकारी यह भी मिलती है कि राजनीति में आने के बाद स्मृति ने एक संस्था की शुरुआत की है, जो छोटे बच्चों की पढ़ाई लिखाई के लिए काम करती है. अमेठी में स्मृति ईरानी के लिए प्रचार करते हुए भी मोदी ने कहा था कि उन्होंने स्मृति को गुजरात में शिक्षा के क्षेत्र में कोई बड़ी जिम्मेदारी दी थी, जिसे स्मृति ने बेहरतीन तरीके से अंजाम दिया.
2004 में स्मृति ने मोदी को हटाने के लिए आमरण अनशन किया था, मगर बाद के दिनों में मोदी और स्मृति काफी करीब आते गये. स्मृति आज गुजरात से ही राज्य सभा की सदस्य हैं. ऐसा लगता है कि मोदी स्मृति के किसी खास गुण से प्रभावित हैं. इसलिए वे स्मृति को यह जिम्मेदारी दे रहे हैं.
स्मृति भले ही कम पढ़ी लिखी हों मगर टीवी बहसों में उन्होंने यह साबित किया है कि वे तार्किक भी हैं और जिम्मेदारी पूर्वक अपनी बातें रखती हैं. वैसे भी शिक्षा मंत्री का काम कहीं से भी छात्रों को पढ़ना नहीं है, उसका काम शिक्षा के बेहतर प्रसार के लिए अपने मंत्रलय को दिशा देना है. काम कैसे होगा यह अफसरों को तय करना होता है, मंत्री का काम सिर्फ यह करना होता है कि काम की दिशा क्या हो, नीतियां कैसी हों, योजनाएं किस तर्ज पर बनें. लिहाजा उनकी योग्यता को लेकर जो सवाल उठाये जा रहे हैं, उसे सौ दिन के लिए ही सही टाला जाना चाहिये था. एक बार उनका काम देख लें, फिर तय करें कि वे सक्षम हैं या नहीं. अगर आप अब तक के मानव संसाधन विकास मंत्रियों की सूची देखेंगे तो पायेंगे कि वे इस विभाग की जिम्मेदारी पाने वाली पहली महिला कैबिनेट मंत्री हैं. इससे पहले शीला कौल को राज्य मंत्री के रूप में यह विभाग मिला था. ऐसा भी हो सकता है कि महिला होने की वजह से वे ज्यादा बेहतर तरीके से इस विभाग को संभाल सकें. क्योंकि यह लगभग साबित हो चुका है कि सेहत और शिक्षा की जिम्मेदारियां महिलाएं ही बेहतर तरीके से संभाल सकती हैं.

2 comments:

Milan K Sinha said...

बहुत सटीक विश्लेषण किया है। हार्दिक बधाई व असीम शुभकामनायें।

Anonymous said...

Raajneetik pad-- Anharaa baNte rewRi gharai gharaanaa khaaye