Thursday, May 29, 2014

क्या सस्ते दिन भी आयेंगे..?


इस चुनाव को प्रभावित करने वाले मुद्दों में से महंगाई एक बड़ा मसला है. पिछले तीन-चार सालों से लगातार आम जनता किसी न किसी वजह से महंगाई की मार ङोलती रही. कभी चीनी, तो कभी प्याज, कभी आलू तो कभी पेट्रोल-डीजल. सब्सिडी वाले गैस सिलिंडर का कोटा तय करने के फैसले ने भी पहले से परेशान लोगो को और त्रस्त कर दिया. दूध की कीमतें लगातार बढ़कर लगभग दोगुनी हो गयी. राशन की दुकान का बजट भी दोगुना पहुंच ही गया और इस बढ़ती महंगाई ने अंतत: दूसरी सेवाओं पर भी असर डाला और अंत में हाल ऐसे हो गये कि कुछ भी सस्ता नहीं बचा, सिवा मोबाइल के टैरिफ प्लान के. अब जबकि मोदी जी के वादे के मुताबिक अच्छे दिन आ रहे हैं, क्या इन अच्छे दिनों के साथ-साथ सस्ते दिन भी आयेंगे. या जनता को थक हार कर महंगाई के साथ जीने की आदत डाल लेना पड़ेगा.
आम तौर पर देश में मौजूद महंगाई के तीन प्रमुख कारण माने जाते हैं. पहला बिचौलिया तंत्र, जो किसानों से कम कीमत में उत्पाद खरीदा है और थोड़े से प्रसंस्करण के बाद उसी उत्पाद को दोगुनी-तीन गुनी कीमत में बेचता है. दूसरा, माल भाड़ा. प्याज, चीनी, चावल, गेंहू और दूसरे पदार्थो को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक ले जाने की कोशिश में भाड़े के एवज में जितना पैसा खर्च होता है वह उस उत्पाद की लागत को उतना ही बढ़ा देता है. तीसरा, वायदा कारोबार, जिसमें मुनाफावसूली के लिए अक्सर जरूरी उपभोक्ता सामग्रियों की कीमत रातोरात बढ़ जाती है. सरकार चाहे तो योजनाबद्ध तरीके से प्रयास कर इन तीनों कारणों का समाधान तलाश सकती है और इन उपायों से महंगाई पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण कर सकती है.
जहां तक बिचौलिया तंत्र का सवाल है, इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि सरकार धान का मिनिमम सपोर्ट प्राइस 13 रुपये प्रति किलो तय करती है. मगर आज की तारीख में किसी भी किस्म का चावल 25 रुपये प्रति किलो से कम में बाजार में उपलब्ध नहीं है. उसी तरह गेहूं का एमएसपी 14 रुपये किलो है, मगर बाजार में आटा सामान्यत: 25 रुपये किलो की दर से बिक रहा है. दोनों उत्पादों में थोड़े से प्रसंस्करण के बाद कीमत 11-12 रुपये प्रति किलो बढ़ जा रही है. इसकी वजह सिर्फ इतनी है कि जो सहकारी संस्थाएं किसानों से धान और गेहूं खरीदती है वह फिर इन्हें प्रसंस्करण के लिए व्यापारियों को बेच देती हैं. और व्यापारी प्रसंस्करण के बाद इनसे मनमाना मुनाफा कमाते हैं. यही सरकारी संस्थाएं राशन दुकान में सप्लाई के लिए महंगी कीमत पर इन व्यापारियों से चावल खरीदती है और नुकसान सहती है. अगर सरकार किसानों से उनकी पैदावार खरीदने वाली सहकारी संस्थाओं को आर्थिक मदद कर उनके पास मिनी राइस मिल और आटा की चक्की लगवा दे तो ये संस्थाएं कम मुनाफे में चावल और आटा तैयार कर सकती हैं. इन्हें न्यूनतम परिवहन लागत से स्थानीय राशन की दुकानों में उपलब्ध भी कराया जा सकता है और स्थानीय व्यापारियों को भी बेचा जा सकता है. खुद कोऑपरेटिव वाले अपने गांव के लोगों को 20 रुपये किलो चावल और आटा बेचकर मुनाफा कमा सकते हैं. इस तरह एक छोटे से कदम से महंगाई की दर नीचे आ सकती है. अभी पंजाब और एमपी के गेहूं का तैयार आटा बिहार और यूपी में बिकता है. इससे लागत का बढ़ना स्वभाविक है.
किसी भी उत्पाद की लागत रोकने के लिए जरूरी है कि उसे स्थानीय स्तर पर ही खपाया जाये. जैसे ही वह देश के एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा करेगा उसकी लागत बढ़ जायेगी और मुनाफाखोरी भी. इस लिहाज से चीनी और प्याज ऐसी दो चीजें हैं जो महाराष्ट्र से देश के कोने-कोने तक जाती हैं. प्याज की पैदावार देश के अधिकांश इलाकों में हो सकती है, मगर किसान इसे उगाते नहीं हैं. इसके अलावा सरकार इस बात की भी कोई योजना नहीं बनाती कि किसी सीजन में किसानों को कितने खेत में क्या-क्या फसल उगाना चाहिये. अगर सरकार इसकी बेहतर योजना बनाये तो कई राज्यों में प्याज, दहलन और तिलहन की पैदावार हो सकती है और खपत के मुताबिक फसल उपजाया जा सकता है. यह महंगाई के लिए बड़ा चेक होगा.
महंगाई की दूसरी बड़ी वजह सरकार की पेट्रोलियम पॉलिसी है. तमाम तरह के नियंत्रण के बावजूद उपभोक्ता वस्तुओं का एक जगह से दूसरी जगह जाना लाजिमी है और इसमें डीजल से चलने वाले ट्रकों की बड़ी भूमिका है. मगर सरकार डीजल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए कोई कोशिश नहीं करती. ऐसी खबर है कि डीजल की कीमतों को डिरेगुलाइज करने के लिए भी सरकार पर दबाव दिया जाने लगा है. अगर ऐसा हुआ तो महंगाई नियंत्रण की सारी कोशिशें बेकार चली जायेंगी. इसलिए जरूरी है कि सब्सिडी देकर भी डीजल की कीमतें नियंत्रित रखी जायें और तेल खनन से जुड़ी कंपनियों को बेवजह मुनाफावसूली करने से रोका जाये. रिलांयस की ओर से नेचुरल गैस की कीमतें बढ़ाने की मांग पर नयी सरकार क्या फैसले लेती है यह भी देखने का विषय होगा.
ऐसा नहीं है कि सरकार के पास डीजल पर सब्सिडी देने के लिए पैसा नहीं है. मगर पिछली सरकार ने उस पैसे को अपने फ्लैगशिप स्कीमों पर बेवजह खर्च किया और उसका नतीजा भ्रष्टाचार के सिवा कुछ और नहीं निकला. अब खाद्य सुरक्षा कानून पर काफी राशि खर्च की जानी है. मगर यह सवाल लाजिमी है कि क्या देश के 70 फीसदी लोगों को हर महीने सस्ते दर में अनाज उपलब्ध कराना जरूरी है. इसका ठीक से आकलन होना चाहिये. सस्ते अनाज की योजना सिर्फ उनके लिए होनी चाहिये जो अत्यंत गरीब हों और उनके पास रोजी-रोटी के लाले हों. यह नहीं कि जिनकी मासिक आय 25 हजार रुपये हो और वह भी 2 रुपये किलो का चावल खरीद रहा हो. जहां तक पेट्रोल की कीमतों के बढ़ने का सवाल है उससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. लोग कार और मोटरसाइकिल पर घूमें इससे बेहतर है शहरों में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था चाक चौबंद की जाये. वायदा कारोबार पर तो तत्काल प्रभाव से रोक लगा देनी चाहिये. इसका देश के विकास से कोई लेना-देना नहीं है. यह सिर्फ महंगाई बढ़ाता है.
मुद्रास्फीति का हमारा मापक भी बहुत वैज्ञानिक नहीं है. इसमें सिर्फ उपभोक्ता वस्तुओं की महंगाई की गणना की जाती है, सेवाओं की नहीं. अगर बस या रेल का किराया बढ़ता है, स्कूल की फीस बढ़ती है, बिजली की दरें बढ़ती हैं इन सबका असर भी सीधे हमारी जेब पर पड़ता है. सरकार इन मामलों में भी कई दफा उदासीन रवैया अपनाती है. बिजली के प्राइवेटाइजेशन की वजह से बिल में बढ़ोतरी पर सरकार लगाम नहीं लगाती. उसी तरह स्कूलों की फीस, डॉक्टरों की फीस, स्वास्थ्य जांच की फीस और बस का किराया भी व्यावहारिक रूप से सरकार के नियंत्रण से बाहर है. आवश्यक सेवाओं का शुल्क सरकारी इजाजत के बिना नहीं बढ़े यह सुनिश्चित करना जरूरी है. इस संबंध में एक मैकेनिज्म बनाना आवश्यक है.
इसके अलावा सरकारी शिक्षण संस्थाओं और अस्पतालों की हालत बेहतर न होने से भी हमारा खर्च बढ़ता है. इस वजह से अधिकतर लोगों को निजी स्कूलों-कॉलेजों और अस्पतालों की शरण में जाना पड़ता है. अगर सरकार इन दोनों क्षेत्रों में गुणवत्ता लाने में सफल रहती है तो जाहिर है लोगों का बजट खुद-ब-खुद संतुलित हो जायेगा. और लोगों के सस्ते दिन अपने आप आ जायेंगे.

No comments: