Saturday, May 31, 2014

कहानियां स्लमडॉग(?) टापर्स की


इन दिनों धड़ा-धड़ दसवीं और बारहवीं के रिजल्ट आ रहे हैं. रोज अखबारों में टॉपरों से मुलाकात हो रही है. एक ओर सीबीएसई बोर्ड के टॉपर हैं तो दूसरी तरफ राज्यों के बोर्ड के. दोनों जगह के टॉपरों की अलग-अलग कहानियां हैं. एक ओर जहां सीबीएसई बोर्ड के टॉपर बता रहे हैं कि कैसे उन्होंने सोशल मीडिया से दूरी रखकर सफलता पायी, उनके माता-पिता ने कैसे उन्हें किसी भी तरह की फिक्र और परेशानी से बचा कर रखा वहीं दूसरी तरफ राज्यों की बोर्ड के टॉपर की कहानियां हैं, किसी के पिता गैस वेंडर हैं तो कोई खुद पढ़ाई के साथ मजदूरी या कुछ और काम कर रहा है. पिछले साल झारखंड बोर्ड की एक टॉपर तो ड्रॉप आउट थी, पिता की बीमारी की वजह से उसे दो साल पढ़ाई छोड़ना पड़ा, फिर उसे कस्तूरबा विद्यालय में एडमिशन मिला. उसी विद्यालय में रखकर उसने पढाई की और पूरे कोल्हान जोन की टॉपर बनी. आज भी झारखंड की एक बच्ची की कहानी मीडिया में है जो ईंट ढोने का काम करती रही है. इसी तरह बिहार इंटरमीडियेट कॉउंसिल के कला संकाय की टॉपर पूर्णिया के एक गांव की बच्ची हुमा खातून है जो रोज सुबह खाना पकाकर स्कूल जाती थी, साइकिल से. स्कूल घर से काफी दूर है. दूसरा स्थान पाने वाली प्रियंका यादव शादीशुदा हैं. मुङो इन टॉपरों की कहानियां ज्यादा आकर्षित करती हैं.
अब यह लगभग साफ है कि इस देश में एजुकेशन बोर्डो को लेकर भी वर्ग विभेद पैदा हो गया है. राज्य के बोर्डो से परीक्षा देने वाले छात्र अमूमन गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय ही होता है. मध्यम वर्गीय छात्र हमेशा सीबीएसई या आईसीएसई बोर्ड का ही छात्र होता है. दोनों वर्गों में पढ़ाई का माहौल और परीक्षाओं में उनकी सफलता की कहानियां अलग-अलग होती हैं. जहां सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के बच्चे सफल इस वजह से होते हैं कि उनकी तैयारी सटीक होती है और परिवार के लोग उनके लिए पढ़ाई का बेहतरीन माहौल तैयार करते हैं, वहीं राज्य के बोर्ड में सफलता हासिल करने वाले बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ जीवन की दूसरी परेशानियों से जूझते हुए आगे बढ़ते हैं. कभी उनके पास किताबें नहीं होती, कभी रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ना पड़ता है, कभी लंबी दूरी तय कर स्कूल जाना पड़ता है. इन बच्चों को टय़ूशन अमूमन उपलब्ध नहीं होता. टेक्स्टबुकों के सहारे ही पढ़ाई करते हैं. फिर भी अव्वल आते हैं.
इनका अव्वल आना भी सीबीएसई के बच्चों से कमतर नहीं है. इनके परसेंटेज भी अच्छे होते हैं और राज्यों के बोर्ड की मार्किग प्रणाली व सीबीएसई की मार्किग प्रणाली में कुछ तो फर्क होता ही है. हमारे पास इस बात का कोई अध्ययन नहीं है कि जीवन में आगे बढ़ने वालों में सीबीएसई के टॉपर अधिक होते हैं या राज्यों के बोर्ड के. अगर ये आंकड़े होते तो हमें समझ में आता कि सरकारी स्कूलों और निजी स्कूलों की पढ़ाई का अमूमन गुणात्मक फर्क क्या है. महज दो दशक पहले तक गांवों के ये बच्चे ही हमेशा अव्वल हुआ करते थे, वही आगे बढ़कर सिविल सर्विसेज की परीक्षा में सफल होते.
बात को इस दिशा में ले जाने का मकसद इन दिनों हमारी सोच में स्कूली व्यवस्था को लेकर आये फरक को रेखांकित करना है. आज की तारीख में हममें से 99 फीसदी लोग व्यावहारिक तौर पर इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि निजी स्कूलों में पढ़ाई की व्यवस्था बेहतर है. सरकारी स्कूलों का जिक्र आते ही हमारे घरों में नाक-भौं सिकोड़ा जाने लगता है. यह सच है कि सरकारी स्कूलों में अव्यवस्था का जो आलम है उसे देखकर कोई भी अपने बच्चों को उस स्कूल में डालना नहीं चाहेगा. मगर उन स्कूलों के बच्चे भी आखिरकार दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में 80 से 90 फीसदी अंक लाते हैं. तमाम तरह की मुसीबतों को ङोलते हुए. ये वो बच्चे हैं जो छट जा रहे हैं और इनके पास सरकारी स्कूलों में पढ़ने के सिवा कोई और विकल्प नहीं. फिर भी यह सफलता वे हासिल कर रहे हैं. यह चमत्कार कैसे हो रहा है.
सरकारी स्कूलों और निजी स्कूलों को लेकर जो एक मिथ समाज में मौजूद है वह कितना सच है इसका आकलन होना चाहिये. खर्च सरकारी स्कूलों में भी कम नहीं होता, कई दफा प्राइवेट स्कूलों से भी बेहतर. वह भी हमारा ही पैसा है. मगर हम कोशिश नहीं करते कि इन सरकारी स्कूलों में भी बेहतर पढ़ाई हो, जिससे हमें अपने बच्चों को मोटी फीस देकर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के लिए विवश न होना पड़े.

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