Tuesday, June 17, 2014

जैसे कोई सितारा, बादल के गांव में


पिछले दिनों सपरिवार दार्जिलिंग-गंगटोक घूम आया. वहां का यात्रा वृत्तांत लिखने की योजना थी. काम शुरू हो गया है, पहली कड़ी आज आपके सामने है...
सुबह सवेरे जब हम पूर्णिया बस स्टैंड पर उतरे तो हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गयी थी. किशनगंज पहुंचते-पहुंचते बारिश की रफ्तार इतनी तेज हो गयी कि खेतों में एक ईंच पानी जमा हो गया था. लगने लगा कहीं पूरी ट्रिप बारिश की भेंट न चढ़ जाये. पिछली शाम जब पटना से हम चले थे तो रात नौ बजे भी कुरता पसीने से भींगा हुआ था. गांधी सेतु पुल पर जब खिड़कियों से हवा का झोंका आना शुरू हुआ तब जाकर थोड़ी राहत मिली थी. ऐसे में इस तरह के हालात की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी. फेसबुक चेक किया तो सारे दोस्त अब भी गरमी, पावर कट और उमस का रोना रो रहे थे.
इस यात्रा की योजना अचानक बनी. पत्रकार साथी हेमंत जी दफ्तर आये हुए थे और अपनी नेपाल यात्रा की कहानी सुना रहे थे. मैं उस कहानी के लपेटे में ऐसा आया कि आइआरसीटीसी पर टिकट चेक करने लगा. योजना जोगबनी के रास्ते नेपाल जाने की थी. टिकट भी ले लिया था. मगर उपमा ने भेटाटांड का नाम सुनकर कुछ यूं मुंह बनाया कि वह जैसे वह कोसी दियारे का कोई गांव हो. ऐसे में हारकर दार्जिलिंग-गंगटोक यात्रा की अरसे से बनती-बिगड़ती योजना पर ही दांव लगाना पड़ा. जोगबनी का टिकट कैंसिल कराकर हम बस से वाया पूर्णिया-सिलिगुड़ी इस सफर पर निकल पड़े.
दार्जिलिंग जाने की हमारी योजना बहुत पुरानी थी. कितनी यह याद नहीं. दरअसल दिल्ली वालों की नजर जो जगह शिमला के लिए है, वही जगह पूरब के वासियों के मन में दार्जिलिंग के लिए है. दरअसल ठंडे मुल्क से आये अंग्रेजों को इस गरम मुल्क में एक अदद लंदन की जरूरत हमेशा महसूस होती थी, इसलिए छुट्टियां मनाने के लिए उन्होंने शिमला औऱ दार्जिलिंग जैसे शहरों को आकार दिया. जब वे कोलकाता से राज करते थे तो दार्जिलिंग का जलवा हुआ करता था, मगर जब राजधानी कोलकाता से दिल्ली शिफ्ट हो गयी तो शिमला को पटरानियों वाला दर्जा मिल गया. मगर हम पूरब के लोगों के मन पर हमेशा दार्जिलिंग ही राज करता रहा. शादी के बाद हनीमून का जिक्र जब भी आता तो यार दोस्त कहते दार्जिलिंग घूम आओ. घर के अलबम में बड़े पापा और बड़ी मां की दार्जिलिंग की तसवीर हमेशा से देखता आया हूं, जिसमें वे दोनों चाय बगान में पारंपरिक वेश-भूषा में नजर आ रहे हैं. बाद में छोटे भाई को हम सब लोगों ने हनीमून के लिए शिमला भेजा. मगर अपनी बारी में मौका नहीं बन पाया.
वैसे, दार्जिलिंग से हमारा रिश्ता कुछ अलग है. मेरे अपने जिले पूर्णिया का गजेटियर बताता है कि कभी दार्जिलिंग पूर्णिया जिले का हिस्सा था. (हालांकि यह कैसे रहा होगा यह सोचकर थोड़ी हैरत होती है, क्योंकि पूर्णिया शहर से दार्जिलिंग शहर की दूरी लगभग 300 किमी है.) इस लिहाज से यह पहाड़ी शहर हमें हमेशा से अपना लगता रहा है. मगर अफसोस आधी जिंदगी गुजर जाने के बाद भी मैं दार्जिलिंग नहीं जा पाया था, जबकि 2004 में एक साल पंचकूला में रहने के दौरान दसियों बार शिमला घूम चुका हूं. अक्सर वीकली ऑफ के रोज कालका से ट्वाइ ट्रेन पर चढ़ता और 13 रुपये के टिकट पर शिमला पहुंच जाता. वहां मेरा जूनियर नौशाद आलम सीएजी ऑफिस में काम करता था, लिहाजा अगर रुकने की नौबत आती तो उसी के घर ठहरता, वरना शाम को बस से लौट आता. जब बिहार लौट आया तो हर साल प्लानिंग करता कि इस बार दार्जिलिंग घूम आना है, मगर हर बार कोई न कोई प्रेत बाधा इस योजना को चौपट कर देती. बाद में इस योजना में गंगटोक का नाम भी जुड़ गया जो सिक्किम की राजधानी और दार्जिलिंग का पड़ोसी शहर है. और पता नहीं क्यों धीरे-धीरे दार्जिलिंग गौण होता गया और गंगटोक अहम.
मलाइ सिक्किम
जब इस सफर की योजना बना रहा था तो मेरे सामने यह बड़ा सवाल था कि पहले दार्जिलिंग जाऊं या गंगटोक. मेरे पास चार दिन और चार रातें थीं. पहला दिन तो पहले डेस्टिनेशन तक पहुंचने में ही खत्म होने वाला था. एक टूरिस्ट साइट ने सलाह दी कि गंगटोक से सिलिगुड़ी लौटना कहीं कठिन है, बनिस्पत दार्जिलिंग के. 11 तारीख को शाम पौने पांच बने सिलिगुड़ी से वापसी की ट्रेन थी. ऐसे में मैंने तय किया कि पहले गंगटोक ही जाऊंगा.
बारिश की बौछारें सिलिगुड़ी तक जारी थीं. बस से उतरकर हम स्टैंड पर पहुंचे तो पता चला कि सिक्किम की बस में टिकट नहीं है. विकिट्रेवल्स वालों की सलाह थी कि पहली प्राथमिकता बस को दें, बस नहीं मिले तो बाहर शेयरिंग वाली टैक्सियां मिल जायेंगी. उनके मुताबिक शेयरिंग टैक्सी का किराया 200 रुपये प्रति व्यक्ति होगा. मगर टैक्सी वाले 250 रुपये प्रति व्यक्ति मांग रहे थे. मैं सोच रहा था कि उन्हें विकिट्रेवल्स का रेफरेंस दूं या न दूं. बहरहाल आगे की पूरी सीट उन्होंने हमें छह सौ रुपये में दे दी, मैं, उपमा और तिया वहां बैठ गये. बाद में यह समझ आया कि जिसे हम फायदे का सौदा समझ रहे थे, वह उतना फायदेमंद नहीं था. मेरे दोनों पैर गियर के दोनों ओर फंसे थे. तिया आधे वक्त सीट पर बैठी औऱ आधे वक्त मेरी या उपमा की गोद में.
ड्राइवर, जो गंगटोक का ही रहने वाला था, उपमा के हिसाब से वह एक नंबर का लफंगा था. पूरे रास्ते में उसने ऐसे तमाम काम किये जो एक ड्राइवर को नहीं करने चाहिये थे. कई दफा उसने सिगरेट पीयी. फोन पर लंबी-लंबी बातें करता रहा. जब फोन बंद होता तो पीछे की सीट पर बैठी उसकी परिचित महिला चालू हो जाती... नेपाली भाषा में... जबकि सिलिगुड़ी से गंगटोक का पूरा रास्ता खतरों से भरा था. पूरे रास्ते में कहीं खाई वाले छोर की तरफ डिवाइडर नहीं था. उपमा सोच रही थी कि रास्ता रामगढ़-रांची टाइप का होगा, फोर लेन और खाई की तरफ बैरियर वाला. मगर यह रास्ता बमुश्किल टू-लेन था. सड़क कई जगह जर्जर थी. खाई की तरफ लगातार तीस्ता नदी बह रही थी. और हमारा ड्राइवर ओवरटेक करने में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लेता था. एक बार तो उससे ऐसी चूक हुई कि गाड़ी गिरते-गिरते बची. मैंने उसे खुद देखा अपनी ही ऊंगली को अपने दांत से कांटते हुए... राम-राम करते-करते सफर पूरा हुआ और हम गंगटोक शहर पहुंचे.
ड्राइवर की बदतमीजियों और सीने की तेज धड़कनों के बावजूद यह सफर काफी दिलचस्प था. तकरीबन पूरा सफर तीस्ता नदी के साथ गुजरा. नदी में भरपूर पानी था, मगर पानी का रंग मटमैला था, संभवतः बारिश की वजह से ऐसा रहा होगा. पहाड़ों पर जब तेज बारिश होती है तो मिट्टी बहकर नदी के पानी में घुलने लगती है, इसी वजह से बारिश के दिनों में पहाड़ी नदियों के पानी का रंग मटमैला हो जाता है. यही पानी जब बह कर मैदानी इलाकों में पहुंचता है तो गांव के लोगों के लिए यह आसन्न बाढ़ का संकेत होता है. हमारी तरफ इसे गेरुआ पानी कहते हैं. रास्ते में तीस्ता नाम का एक कस्बा भी पड़ता है. सिलिगुड़ी से गंगटोक औऱ दार्जिलिंग की राह इस कस्बे तक एक ही है. तीस्ता से दोनों शहरों की राह अलग हो जाती है. सिक्किम राज्य में प्रवेश से पहले एक कस्बा आता है मेल्ली. यह कस्बा रिवर राफ्टिंग के लिए मशहूर है. हम जब वहां पहुंचे तो रिवर राफ्टिंग के कई बोट ट्रैक्टर की ट्रॉलियों पर पड़े थे. कुछ लड़के-लड़कियां छतरियां लिये पत्थरों पर बैठे थे, शायद बारिश खत्म होने का इंतजार कर रहे थे. हालांकि आगे जाने पर एक दो बोट जरूर पानी में नजर आया. रिवर राफ्टिंग के नाम पर उपमा ने पहले ही ना कह दी थी, मौसम ठीक रहता तो एक बार ट्राइ करने का मेरा इरादा जरूर था.
रेंगपो शहर के पास सिक्किम राज्य के प्रवेश द्वार ने हमारा स्वागत किया. वहां वाहनों की चेकिंग के लिए सिक्किम के सिपाही खड़े थे. दरअसल सिक्किम पूरी तरह हरित राज्य बनने की दिशा में अग्रसर है. पूरे राज्य में रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं होता, धीरे-धीरे इंधन के नाम पर भी हरित होने की तैयारी है. रेंगपो को सिक्किम की व्यावसायिक राजधानी कहा जा सकता है. इस शहर के आसपास हाल के वर्षों में दर्जनों दवा कंपनियों ने आकार लिया है. हाइवे के किनारे आपको कुछ दवा कंपनियां नजर आ जायेंगी. मशहूर सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी भी इसी शहर में है. रास्ते से ही इस विवि की खूबसूरत लोकेशन नजर आती है. तात्पी नदी के किनारे बिल्कुल खाई में. विवि इतना भव्य है और इसकी लोकेशन इतनी शानदार है कि देखकर मन में आया कि नौकरी छोड़कर यहां आ जाऊं और दो साल का पीजी कोर्स कर लूं. सिक्किम में प्रवेश के साथ ही रास्ते की रंगत बदल जाती है. अब जहां-तहां सड़क के किनारे बैरियर नजर आते हैं. सड़क की गुणवत्ता भी बेहतर है. दरअसल सिक्किम पूर्वोत्तर का सबसे शांत राज्य है, लिहाजा पूर्वोत्तर राज्यों को औद्योगिक विकास में मिलने वाली रियायत का सबसे अधिक फायदा इसी राज्य को होता नजर आ रहा है. इस विकास ने सिक्किम की तसवीर बदल दी है. फरक लोगों की आर्थिक स्थिति और वहां के रिहायिशों पर साफ नजर आता है.
शाम पांच बजे जब गंगटोक पहुंचा तो बारिश थम गयी थी, मगर पूरे शहर में बादल रुई के फाहे की तरह टहल रहे थे. मैं तो एक दफा शिमला में ऐसा नजारा देख चुका था, मगर उपमा के लिए यह अविस्मरणीय अनुभव था. कार की खिड़की के बगल से बादल के फाहे निकल रहे थे, वह हाथ निकालकर बार-बार बादलों को छूने की कोशिश कर रही थी. हालांकि तिया को इन बातों में कोई मजा नहीं आ रहा था. वह हर पांच मिनट पर पूछ रही थी कि सात बजने में कितना समय बांकी है. क्योंकि इन दिनों उसे स्टार प्लस के धारावाहिक साथ निभाना साथिया देखने का चस्का लगा था. तिया को लग रहा था कि मम्मी-पापा के फालतू के इस चकल्लस में उसका पसंदीदा धारावाहिक मिस न हो जाये. वह इस धारावाहिक को शाम सात बजे भी देखती है और अगले दिन सुबह दस बजे उसका रिपीट शो भी देखती है. पूरे ट्रिप में वह प्राकृतिक नजारों को लेकर कमोबेस उदासीन ही रही, चुकि उसे वक्त का अंदाजा लगाना नहीं आता था सो बारह बजे दिन में भी पूछ बैठती, सात बजने में कितना टाइम बांकी है और इसके बाद पूछती दस बजने में कितना टाइम लगेगा.
होटल रेड रोज पहुंचकर मैंने महसूस किया कि ऑनलाइन टिकट बुक कराना तो ठीक है, मगर ऑनलाइन होटल बुक कराना फायदे का सौदा नहीं. एक तो होटल बस स्टैंड से दूर था, दूसरा अत्यंत साधारण किस्म का. जबकि किराया ठीक-ठाक वसूल कर लिया था क्लियर ट्रिप वालों ने. साथ ही कंडीशन यह भी थी कि अगर कैंसिल कराना हो तो एक महीने पहले करायें, वरना आधा पैसा काट लिया जायेगा वह भी महज सात दिन पहले तक. हमारे पास अब उसी घटिया होटल के तीसरे माले पर बने कमरे में रहने के सिवा कोई चारा नहीं था. एक ही खासियत थी कि कमरे की खिड़की से बाहर अच्छा व्यू नजर आता था. अगले दिन सुबह-सुबह उसी खिड़की से कुछ ऐसे नजारे दिखे कि लगा, पैसा वसूल हो गया.
होटल के मैनेजर ने पिछवाड़े का एक रास्ता दिखा दिया औऱ कहा कि इस गली की सीढियों से लगातार चढ़ने पर पहले लाल मार्केट और फिर एमजी रोड आ जायेगा. एमजी रोड गंगटोक का मॉल रोड है. शाम को वहां पर्यटक बैठकर बतियाते हैं औऱ आसपास के रेस्तरां में खाकर लौट जाते हैं. फ्रेश होकर औऱ हमने थोड़ा आराम किया औऱ चाय पी. पिछले लगभग 22 घंटे से हम सफर कर रहे थे. थोड़ा आराम तो चाहिये था. शाम सात बजे हम होटल मैनेजर के बताये रास्ते से एमजी रोड की तरफ चल पड़े. सीढियां चढ़ते-चढ़ते ऐसा लगा कि हम एमजी रोड नहीं बल्कि पारसनाथ मंदिर की सीढियां चढ़ रहे हैं. बारिश की वजह से सीढियां फिसलन भरी हो गयी थीं. संभल-संभल कर चलना पड़ रहा था. ये तो अच्छा था कि सीढियों के बगल से वाटर सप्लाई की पाइपें भी थीं. जिन्हें पकड़-पकड़ कर हम चढ़ रहे थे. लाल मार्केट पहुंचते-पहुंचते उपमा की सांसें उखड़ गयीं. उसने एमजी रोड जाने से साफ इनकार कर दिया. ये तो अच्छा था कि लाल मार्केट में जहां हम अपने आइडी का फोटो कॉपी करा रहे थे, उसके दुकानदार ने कहा कि अब रास्ता ज्यादा कठिन नहीं है. इसके अलावा लाल मार्केट से एमजी रोड जाने वाले रास्ते में सीढियों के किनारे-किनारे काफी दुकान थे. उपमा का फैसला बदलने के लिए यह तथ्य कारगर साबित हुआ. ये अलग बात है कि लाल मार्केट से एमजी रोड पहुंचते-पहुंचते मुझे पांच सौ रुपये का चूना लग चुका था. मैं पछता रहा था कि इससे बेहतर होटल से टैक्सी कर लेना ही सस्ता रहता...
गंगटोक का एमजी रोड किसी सूरत में शिमला के मॉल रोड जैसा नहीं है. यह एक आधा किमी लंबी सड़क है, जिस पर गाड़ियां बैन हैं. सड़क के बीचोबीच पर्यटकों के बैठने के लिए कुरसियां लगी हैं और दोनों किनारे में रेस्तरां, गिफ्ट इम्पोरियम और ट्रेवल एजेंट के शॉप हैं. अगला दिन हमने शोम्गो लेक और बाबा मंदिर के लिए तय कर रखा था, दोनों नाथुला दर्रे की राह में थे. इन दिनों नाथुला दर्रा बंद था, लिहाजा हमें शोम्गो लेक और बाबा मंदिर घूमकर लौट आना था. वहां जाने के लिए भी शेयर टैक्सियों का ऑप्शन है ऐसा विकी ट्रेवल्स ने जानकारी दी थी. हालांकि पहले दो-तीन ट्रेवल एजेंसियों ने साफ मना कर दिया और कहा कि खुद की टैक्सी लेना होगा और उसका किराया 36 सौ रुपये था. बहरहाल बाद में दो-तीन एजेंसियां ऐसी मिल गयीं जो शेयरिंग ऑप्सन की सुविधा दे रही थीं. एक हजार रुपये की हमें तीन सीटें मिलीं. यह टैक्सी सुबह नौ बजे खुलने वाली थीं, सो हमने एक और टैक्सी सुबह शहर के आसपास घूमने के लिए कर ली. 5 सौ रुपये में वह हमें गणेश टोक और ताशी व्यू प्वाइंट घुमाकर वापस नाथुला वाले टैक्सी स्टैंड पर छोड़ देने वाला था. एमजी रोड का खाना महंगा था, सो हमने तय किया कि अपने होटल में ही खा लेंगे. लिहाजा टूर की बुकिंग करके हम लौट गये, इस बार हमनें लाल मार्केट से सड़क रास्ता चुना. (दूसरी किस्त में शोम्गो लेक और बाबा मंदिर के यात्रा की कहानी)
पहली तसवीर में तीस्ता नदी के किनारे सिक्किम मणिपाल विश्वविद्यालय. दूसरी, तीसरी और चौथी तसवीर में सिक्किम जाने के पूरे रास्ते में सड़क किनारे बहती तीस्ता नदी है.
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