पुण्य और पाप अपनी जगह, पोर्क और बीफ अपनी जगह...


अपनी यात्रा के दूसरे दिन हम गंगटोक शहर घूमने निकले, पढिये इस वृत्तांत की दूसरी किस्त...
लोकल प्वाइंट घुमाने वाला टैक्सी ड्राइवर सुबह साढ़े पांच बजे पहुंच गया. हालांकि दो दिन की थकावट के बाद इतने सवेरे उठने का हमारा इरादा कतई नहीं था, मगर हम उठे और छह बजे तक उसकी शरण में पहुंच गये. गीजर के पानी ने तैयार होने में काफी मदद की, हमने इतनी ठंड में भी नहाने का रिस्क उठा लिया. गणेश टोक औऱ बाबा मंदिर का नाम सुनकर उपमा को लगा कि अगर बिना नहाये पहुंच गये तो भगवान क्लास ले सकते हैं. मैं भी अपने शरीर से पसीने के आखिरी निशान को मिटा देना चाहता था ताकि यहां के ठंडे मौसम का ठीक से लुत्फ ले सकूं.
ड्राइवर का नाम निर्मल था. वे तकरीबन 45 साल के व्यक्ति थे. उन्होंने साढ़े आठ बजे से किसी और पर्यटक को समय दे रखा था लिहाजा वे चाहते थे कि हम उन्हें सवा आठ बजे तक छोड़ दें. मैंने कहा ठीक है, आठ बजे तक हम जितना घूम पायेंगे वे घुमा दें, फिर हमें छांगुलेक टैक्सी स्टैंड के पास छोड़ दें, जहां से हमें शोम्गो(छांगु) लेक औऱ बाबा मंदिर के लिए टैक्सी मिलने वाली थी. निर्मल बड़े मिलनसार व्यक्ति थे, उनसे जल्द ही आत्मीय बातचीत शुरू हो गयी. वे कहने लगे, गंगटोक शहर में टाटा सुमो या बोलेरो जैसी गाड़ियों का चलना मना है, यहां छोटी कार ही चला सकते हैं. हालांकि इन छोटी कारों को लेकर आप शहर से बाहर नहीं जा सकते. वहां जाने के लिए आपको टाटा सुमो या बोलेरो जैसी गाड़ियों का सहारा ही लेना होगा. उनके कहने का मतलब था कि शहर में डीजल गाड़ियों का प्रवेश वर्जित है, जबकि पहाड़ी रास्तों पर छोटी कारें नहीं जा सकतीं. तापमान 13-14 डिग्री के आसपास था. उपमा ने पिछली शाम को एक उलेन ड्रेस ले लिया था और तिया का जैकेट हम साथ में ही लाये थे. मगर मेरे पास सिर्फ हाफ शर्ट और टीशर्ट थे. इन दिनों पहाड़ी शहरों में भी गरमी पड़ने लगी है, ऐसी खबरें मैंने लगातार पढ़ी थी, इस लिहाज से लगता था कि ठंड कितना भी पड़े मगर स्वेटर की जरूरत शायद ही होगी. मगर गंगटोक ने हमारे आकलन को गलत साबित कर दिया था. मैंने एहतियातन शर्ट के नीचे एक टीशर्ट पहना हुआ था, मगर ऐसा लगता था कि शोम्गो लेक के पास जहां गर्मियों में भी बर्फीले पहाड़ नजर आते हैं, मुझे कुछ और कपड़ों की जरूरत होगी.
निर्मल ने यह कह कर हमें आश्वस्त किया कि शोम्गो लेक के पास किराये पर भी गर्म कपड़े मिल जाते हैं, अगर हम चाहें तो उन्हें खरीद भी सकते हैं. उपमा ने सवाल किया कि अगर गर्मियों में यहां का मौसम ऐसा है तो जाड़े के दिनों में क्या हाल होता होगा. इस पर निर्मल ने कहा, जाड़े के मौसम में तो आपलोग यहां रह ही नहीं पायेगा... क्यों नहीं रह पायेगा, हमलोग आदमी नहीं है क्या... मैंने सवाल किया.
अरे नहीं, आप लोग से नहीं होगा. यहां जाड़े में हमलोग रम पीता है, रोज पोर्क या बीफ खाता है. आपलोग खायेगा ? नहीं खायेगा... कहेगा धर्म भ्रष्ट हो जायेगा... हम भी हिंदू है, मगर क्या करेगा जब जान पर आफत आता है तो सब नियम बदलना होता है... लाचारी है, बीफ नहीं खायेगा, पोर्क नहीं खायेगा तो यहां जी नहीं पायेगा... बीफ और पोर्क की चर्चा हो ही रही थी कि हम गणेश टोक पहुंच गये. गंगटोक के सबसे ऊंचे शिखर पर स्थित गणेश जी का मंदिर. निर्मल ने नीचे बने एक पार्किंग जोन में गाड़ी पार्क की, जहां सेना के कुछ जवान जॉगिंग कर रहे थे. हमलोग मंदिर की तरफ बढ़ चले. वह एक छोटा सा मंदिर था, मगर काफी साफ-सुथरा और करीने से बना हुआ. हिंदी बेल्ट के मंदिरों जैसा गंदा और भीड़भाड़ वाला नहीं था. राधाकृष्ण मंदिर जैसा या इस्कॉन के मंदिरों जैसा. हमलोग उस मंदिर में पहुंचने वाले पहले श्रद्धालु थे. वहां की व्यवस्था देखकर उपमा का मन श्रद्धा से भर उठा. जूते खोलकर और हाथ धोकर हम मंदिर पर पहुंचे. हमें देखकर पुजारी अंदर गया और भगवान की पूजा अर्चना करने लगा. हमें तिलक किया और अराची दाने का प्रसाद दिया. वह अपने सामने में दस-दस के कुछ नोट पहले से निकाल कर रखा था. यह इस बात का संकेत था कि यहां तिलक के एवज में पैसा देना पड़ता है और वह भी दस-दस के नोट की शक्ल में. हमने भी बीस रुपये उसके सामने में रख दिये. दो-चार फोटो सेशन के बाद हम नीचे उतर आये. वहां इतनी ठंड थी कि बगैर जूतों के रहना मुश्किल था, तिया तो गोद से उतरने का नाम ही नहीं ले रही थी.
अगला पड़ाव ताशी व्यू प्वाइंट था. गणेश टोक और ताशी व्यू प्वाइंट गंगटोक शहर के दो ऐसे प्वाइंट हैं जहां से कंचनजंघा पर्वत के सुनहले शिखर को देखा जा सकता है. यह पर्वत सिक्किम और नेपाल की सीमा पर स्थित है. मगर जून के महीने में जब हर तरफ बादलों का डेरा हो, दस कदम आगे की चीज देखना मुश्किल हो तो कंचनजंघा के शिखर को देखने की बात सोची भी नहीं जा सकती. निर्मल बता रहे थे कि पिछले दस-बारह दिनों से कंचनजंघा की चोटी साफ नजर नहीं आ रही थी. मगर फिर भी इन जगहों की यात्रा बेकार साबित हुई हो ऐसा नहीं लगा. खास तौर पर ताशी व्यू प्वाइंट जहां उस रोज बादलों के फाहे यहां वहां उड़ रहे थे. वहां पहुंचकर ऐसा लगा कि हम 1942 ए लव स्टोरी के रिम-झिम-रुम-झुम वाले गाने के सेट पर आ गये हों. सामने कंचनजंघा के बदले एक साधारण सा होटल नजर आ रहा था मगर वह बादलों के बीच कुछ इस तरह लिपटा था कि लग रहा था जैसे यह स्वर्ग में भगवान इंद्र का महल हो. हमने उस होटल को बैकग्राउंड में रखकर कुछ तसवीरें लीं जो इस पोस्ट के साथ संलग्न हैं.
ऊपर ड्रेगेन की दो मूर्तियां थीं, एक गुंबदनुमा बैठक जहां से खुले दिनों में लोग कंचनजंघा की चोटियों को निहारतो होंगे. सामने एक बड़ी बिल्डिंग थी जिसमें सिक्किम के स्मृतिचिंह्नों की एक दुकान और छोटा सा कैफेटेरिया था. उपमा सीधे उस दुकान में जा घुसी और हमदोनों बाप-बेटी उस छतनुमा जगह पर यहां वहां भटकते हुए फोटोशूट करते रहे. वहां भी हमारे अलावा कोई और पर्यटक नहीं था. पर्यटकों के लिहाज से शायद यह काफी सुबह थी. लोग नौ-दस बजे आना शुरू करते हैं. वे एक दिन छांगुलेक, नाथुला और बाबा मंदिर के लिए रखते हैं औऱ एक दिन लोकल साइटसीइंग के लिए, जिसमें टैक्सी वाले उन्हें आठ-नौ जगह ले जाते हैं. तीसरा दिन रूमटेक मोनेस्ट्री के लिए होता है जो शहर से 24 किमी दूर है. मगर हमारे पास एक ही दिन था जिसमें नाथुला पास की तरफ भी जाना था और लोकल साइटसीइंग भी करना था. रूमटेक का इरादा तो हमने पहले ही छोड़ दिया था. इसलिए सुबह-सवेरे भूखे-प्यासे गणेश टोक और ताशी व्यूप्वाइंट का चक्कर लगा रहे थे.
ताशी व्यू प्वाइंट से उतरे तो मुश्किल से सात ही बजा था. हमने निर्मल जी से अनुरोध किया कि बचे वक्त का इस्तेमाल करते हुए हमें दो-तीन जगह औऱ घुमा दें. निर्मल जी ने कहा कि वे हमें बाख्तांग वाटर फॉल और छोड़देन गुम्बा मोनेस्ट्री घुमा सकते हैं. मगर उसके एवज में हमें तीन सौ रुपये और देने होंगे. सौदा बुरा नहीं था, हम राजी हो गये. बाख्तांग वाटर फॉल तो सड़क के किनारे ही एक मझोले आकार का वाटर फॉल था जो फोटोग्राफिक प्वाइंट से अधिक कुछ नहीं था. मगर छोड़देन गुम्बा एक मझोले आकार का बौद्ध मठ था. चुकि हम रूमटेक नहीं जा रहे थे, इस लिहाज से छोड़देन जाना फायदे का सौदा रहा. वरना सिक्किम घूमने के बावजूद बौद्ध मठ का दर्शन न हो तो यह तो दुर्भाग्य ही कहा जायेगा.
शहर के निचले हिस्से में यह मोनेस्ट्री है. जब हम पहुंचे तो वहां भिक्षुक कैंपस में झाड़ू लगा रहे थे. पता चला कि भिक्षु अपना सारा काम खुद करते हैं. एक कमरे में हमने देखा कि दो भिक्षु मिलकर सौ से अधिक दीयों की सफाई कर रहे हैं. कहीं भिक्षु पानी से कैंपस धो रहे थे. हमने उन गोल बेलनों को घुमाने का आनंद लिया जो हिमालय के बौद्ध मंदिरों में अक्सर नजर आते हैं, तसवीर संलग्न है. फिर कैंपस का जायजा लेने लगे. हमने देखा वहां कई बिल्लियां शांत बैठी हुई हैं. तवांग और लद्दाख के उन बौद्ध मठों की याद आय़ी जहां शेर भी रहते हैं. बौद्ध भिक्षु अपने वातावरण के जरिये अपने आस पास रहने वाले पशुओं को भी अहिंसक बना लेते हैं. तभी याद आया कि ये बौद्ध भिक्षु तो मांसाहर और मदिरा सेवन नहीं करते होंगे. चाहे कितनी भी ठंड पड़े. मगर इनकी सेहत पर तो कोई नकारात्मक असर नहीं दिखा. बजाय इसके निर्मल की सेहत ही ढलती नजर आती है. जी में आया कि लौटते वक्त निर्मल से पूछूंगा, मगर पूछा नहीं... पूछने से भी क्या हासिल होता... अपने-अपने तर्क हैं, अपना-अपना नजरिया...
चित्र परिचय- पहली तसवीर बाख्तांग वाटर फॉल की है, दूसरी-तीसरी छोड़देन गुम्बा मोनेस्ट्री की, चौथी-पांचवी गणेश टोक की और सातवीं-आठवीं ताशी व्यू प्वाइंट की...

Comments

Amit Jha said…
bahoot khoob
Mukendra Sonker said…
बेमिसाल
Mukendra Sonker said…
बेमिसाल
Mukendra Sonker said…
बेमिसाल