नाथुला दर्रा - आठ घंटे की ट्रिप में सात सफर में ही गुजरे


गंगटोक-दार्जिलिंग यात्रा के वृत्तांत की तीसरी किस्त. इस यात्रा वृत्तांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
निर्मल ने हमें सवा आठ बजे के करीब छांगुलेक टैक्सी स्टैंड के पास छोड़ दिया. हमारा अगला सफर नौ बजे शुरू होने वाला था. इस बीच में हम नास्ता कर लेना चाहते थे. जिस बेसमेंट में टैक्सी स्टैंड है वहीं एक छोटा सा रेस्तरां भी है. नाम अभी याद नहीं आ रहा. हम तीनों वहीं पहुंचे और एक टेबुल पर कब्जा जमाकर बैठ गये. काउंटर पर रेस्तरां के मालिक बैठे थे, जनाब बिहार के रहने वाले थे मगर 30-35 साल से गंगटोक में ही रह रहे थे. हमने नास्ते के लिए पूछा तो उन्होंने पूरी सब्जी और मोमोज का नाम लिया. मोमोज मिलना सिलीगुड़ी से ही शुरू हो गया था. सिलीगुड़ी से गंगटोक की राह में एक जगह जहां टैक्सी रुकी थी वहां भी हमने वेज मोमोज खाये थे. हमारा इरादा मोमोज ही खाने का था, यहां रहते हुए बढिया मोमोज खा लेना चाह रहे थे. मगर उन्होंने कहा, अरे मोमोज क्या खाइयेगा, पूरी सब्जी खाइये... मैं समझ सकता था कि अगर बिहार का कोई आदमी 35 साल से गंगटोक में रह रहा हो तो उसे मोमोज से ऊब हो गयी होगी और पूरी सब्जी उसके लिए किसी नौस्टैल्जिया की तरह रहा होगा. उनकी बात भी रह जाये यह सोचकर मैंने बीच का रास्ता निकाला और कहा कि एक प्लेट पूरी सब्जी और एक प्लेट मोमोज दे दीजिये और बाद में दो कप चाय.
एक और जरूरी काम बचा हुआ था... शौचालय जाने का. दरअसल हमारे होटल के कमरे में शौचालय पश्चिमी तरीके का था. जहां भी कमरे में पश्चिमी बनावट के शौचालय मिलते हैं मेरा सर भारी होने लगता है. लोग देखा-देखी में पश्चिमी बनावट वाले शौचालय बना तो लेते हैं, मगर बनाते आधा-अधूरा हैं. अमूमन 90 फीसदी ऐसे शौचालयों में धोने वाली पाइप नहीं होती है. इसके अलावा मुझे कमोड की सीट पर बैठने से नफरत है, क्योंकि हमेशा ख्याल आता है कि उस सीट पर न जाने कितने लोग बैठ चुके होंगे. उसकी सफाई का ख्याल तो ठीक से रखा नहीं जाता. यहां भी वही कहानी थी इसलिए मैंने प्लान किया था कि टैक्सी स्टैंड पर सुलभ शौचालय की शरण में जाऊंगा. रेस्तरां के मालिक ने बताया कि सुलभ शौचालय तो नहीं मगर पब्लिक टॉयलेट है जो पीछे हैं. उपमा और तिया को वहां छोड़कर मैं पीछे चला गया. निवृत्त होकर आया, फिर नास्ता किया, चाय पी, रास्ते के लिए बिस्कुट, वेफर्स और पानी की बोतलें ली और टैक्सी स्टैंड के पास पहुंच गया. हमारी टैक्सी को आने में वक्त लग रहा था, इस बीच हमारे पास काफी वक्त था औऱ हम वहीं बैठकर गंगटोक शहर के लोगों की गतिविधियों को देखने-परखने लगे.
हमारी टैक्सी में बैठने वाला एक और परिवार दिल्ली से आया था. हालांकि वे रहने वाले रांची के थे. वह परिवार भी हमारे जैसा ही था. माता-पिता औऱ एक बेटी. हालांकि हमलोगों में उम्र का ठीक-ठाक फासला था. उनकी बेटी 20-25 साल की होगी. बाद में एक और परिवार चढ़ा. दो पुरुष थे और एक किशोरी. वे लोग स्थानीय दुकानदार थे, मगर रहने वाले बिहार के बक्सर जिले के थे और वे भी यहां 30-35 साल से रह रहे थे. जल्द ही हमलोग आपस में घुलमिल गये. रांची वाली फैमिली दार्जिलिंग से होकर यहां आयी थी, और लगता था कि आने से पहले इस इलाके के बारे में उन्होंने खूब रिर्सच किया था. उनसे हमें कई जानकारियां मिलीं. वे यहां से फिर पेलिंग जाने वाले जो एक छोटा सा कस्बा था. बक्सर वाले सज्जन जो यहां दुकान चलाते थे वे तो खैर लोकल एक्सपर्ट थे ही. वे ड्राइवर के बगल में बैठे थे और कभी हमसे हिंदी में बतियाने लगते तो कभी ड्राइवर के साथ लेप्चा में शुरू हो जाते.
शहर से बाहर निकलकर जैसे ही हाइवे पर पहुंचे हमें समझ में आ गया कि तीन घंटे की हमारी यह यात्रा भीषण खतरनाक रहने वाली है. सिलीगुड़ी से गंगटोक तक की यात्रा उसके सामने कुछ नहीं थी. सड़क बमुश्किल डेढ़ लेन की थी और सड़क की हालत काफी जर्जर थी. एक तरफ तो भीषण खाई थी ही दूसरी तरफ जो पहाड़ थे वहां भी जगह-जगह से पानी गिर रहा था और भू-स्खलन के निशान थे. बारिश तो नहीं हो रही थी मगर बादलों ने विजिवलिटी को शून्य के करीब पहुंचा दिया था. हालात ये थे कि दस मीटर आगे क्या हो रहा है यह नजर नहीं आ रहा था. गंगटोक शहर खुद ही चार हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर है, वहां से हमें तकरीबन चार सौ मीटर की चढ़ाई और चढ़नी थी. खाई वाले किनारे में तो बैरियर का कहीं नामोनिशान तक नहीं था. मगर हमारी गाड़ी इन सब बातों से बेखौफ उछलती-कूदती चली जा रही थी. काफी देर तक हम सहमे सिकुड़े से बैठे रहे कि क्या पता सही सलामत जाकर लौट पायेंगे या नहीं. मगर जब बक्सर वाले सज्जन को निश्चिंत भाव में ड्राइवर से बतियाते देखा तो लगा कि सब ठीक है. डरने का कोई मतलब नहीं है. लाना ले जाना ड्राइवर का काम है, सबकुछ उसके हाथ में है.
आगे पता चला कि सीमा सड़क संगठन इस सड़क का निर्माण करा रही है. जगह-जगह मजदूर काम करते नजर आ रहे थे. कई जगह सड़क पर बड़े-बड़े पत्थर गिरे हुए थे. बारिश की वजह से कई जगह सड़क फिसलन भरी हो गयी थी. एक घंटे लगातार चलने के बाते ड्राइवर ने एक सोते के पास गाड़ी रोक दी और सोते से पानी भरकर गाड़ी पर डालने लगा. पता चला कि लगातार चढ़ाई की वजह से गाड़ी गरम हो जाती है और इन्हें रास्ते में दो तीन जगह ऐसा करना पड़ता है. बाद में दार्जिलिंग के रास्ते में भी हमनें देखा एक बच्चा पाइप से पानी देकर गाड़ियों को ठंडा करता है और बदले में गाड़ी वाले उसे कुछ पैसे देते हैं.
रास्ते में काफी दूर-दूर पर छोटे-छोटे बाजार या कस्बे नजर आते थे. अब ज्यादातर मकान लकड़ी या टिन के बने नजर आते थे. सीमेंट के मकान बहुत कम दिखते थे. ऐसे ही एक बाजार पर हमने टिन का बना पब्लिक टॉयलेट भी देखा गाड़ी की महिलाओं ने उस शौचालय का इस्तेमाल कर लिया. ठंड काफी बढ़ गयी थी. अब मुझे लग रहा था कि अगर किराये वाला जैकेट नहीं मिला तो हालत खराब हो जायेगी. उपमा तो उलेन कपड़ों में भी सिहर रही थी. आगे चलकर ड्राइवर ने हमें एक जैकेट किराये पर दिलाया, सौ रुपये में. क्या करता कोई विकल्प नहीं था. हालांकि थोड़ी चढ़ाई के बाद हमने देखा कि धूप निकल आयी है. मुझे लगा कि अब मुझे जैकेट की जरूरत नहीं पड़ेगी, बाद में नाथुला के पास पहुंचने के बावजूद मैं हाफ शर्ट में ही रहा.
अचानक धूप निकलने के बारे में बक्सर वाले सज्जन ने बताया कि चुकि इतनी ऊंचाई तक बादल नहीं आते इसलिए आसमान यहां साफ है और धूप खिली है. यानी बादल हम से नीचे की ऊंचाई पर थे. यह भी हमारे लिए अनूठा अनुभव था. देर काफी हो चुकी थी इसलिए तय हुआ कि पहले नाथुला के पास वाले हरभजन बाबा के मंदिर ही घूम आया जाये, नाथुला बार्डर बंद है इसलिए वहां जाने का कोई मतलब नहीं है. लौटते वक्त छांगु लेक के पास ठहरेंगे. हालांकि हम छांगु लेक के सामने से ही गुजर रहे थे मगर वहां रुके नहीं सीधे आगे बढ़ते चले. छांगु लेक से आगे बढ़ते ही हमें कुछ चोटियां ऐसी नजर आयीं जिस पर थोड़ी-थोड़ी बर्फ जमी थी. बक्सर वाले सज्जन ने कहा ठंड के दिनों में ये चोटियां भी बर्फ से ढकी होती हैं और छांगु लेक का पानी भी जम जाता है.
हम अब चीन की सीमा के बिल्कुल करीब थे. शायद आपको यह जानकारी न हो, मगर इस इलाके में यही एकमात्र भूभाग है जहां भारत की सीमा सीधे चीन की सीमा से जुड़ती है. नाथुला बार्डर के जरिये हाल के कुछ वर्षों से दोनों देशों के बीच सीधा व्यापार शुरू हुआ है. बक्सर वाले सज्जन ने बताया कि अक्तूबर-नवंबर के महीने में सामान की आवाजाही शुरू होती है और दोनों मुल्कों के बीच 27 सामानों का लेन-देन होता है. उन्होंने रोष जताते हुए कहा कि चीन अपने घटिया प्लास्टिक और इलेक्टॉनिक के सामान हमारे देश में भेज देता है जबकि यहां से चावल, दाल, आलू और प्याज जैसी चीजें भेजी जाती हैं. जिससे इस इलाके में खाने-पीने की चीजें महंगी हो जाती हैं.
रास्ते में कई जगह ऐसे साइनबोर्ड लगे थे जिसपर लिखा था यह इलाके चीन की सर्विजिलांस में है. पहाड़ों पर एक जगह बहुत बड़े आकार में लिखा था मेरा भारत महान. पढ़कर खुशी हुई. जल्द ही हम बाबा मंदिर पहुंच गये. बाबा मंदिर के नाम से ऐसा लगता है कि यह किसी संन्यासी का मंदिर है, जबकि असलियत में यह एक फौजी की याद में बना मंदिर है.फौजी हरभजन सिंह जिसके नाम पर यह मंदिर बना है उसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है. हरभजन सिंह की मौत 1967 में सीमा पर पेट्रोलिंग करते वक्त बर्फ में दबकर हो गयी थी. मगर आने वाले वक्त में वहां के सिपाहियों ने महसूस किया कि हरभजन सिंह जिंदा है और अकेले सीमा पर पहरा देता है. अगर पहरे के दौरान कोई सिपाही सोने लगता है तो वह उसे थप्पड़ मारकर जगाता है. उसके रहते किसी सिपाही को कोई नुकसान नहीं हो सकता. हरभजन सिंह के जीवित होने की कहानी इतनी दमदार निकली की आखिरकार भारतीय फौज के अधिकारियों को भी उस पर भरोसा हो गया. सरकारी दस्तावेजों में अभी भी वह एक फौजी के तौर पर नौकरी कर रहा है. शायद प्रोमोशन के बाद उसे कोई पद भी मिल गया है. उसे बकायदा वेतन मिलता है, वरदी औऱ जूते मिलते हैं. उसके रहने की जगह है, बिस्तर है, बैठने की जगह है. सब हम देखकर आय़े हैं और तसवीरें भी हैं. साल में एक बार उसकी छुट्टी होती है और उसके साथ एक अर्दली उसे लेकर उसके पंजाब स्थित पैतृक गांव लेकर जाता है और बाद में वहां से लेकर आता है.
बाबा हरभजन सिंह का मंदिर काफी भव्य था औऱ उसकी देखरेख फौजी ही करते थे. बगल में फौजियों ने एक स्मृतिचिह्नों की दुकान और चाय-नास्ते की एक कैंटीन भी खोल रखी थी. मंदिर के पास आक्सीजन की मात्रा कम हो गयी थी जिस वजह से सांस लेने में थोड़ी परेशानी हो रही थी. फिर भी वहां सैकड़ों की भीड़ थी. मंदिर में अरदास बज रहा था और श्रद्धालु पूरी श्रद्धा से वहां शीश नवा रहे थे और मिनरल वाटर की बोतलें चढ़ा रहे थे. एक कमरे में रिवाल्विंग चेयर रखा था, बताया गया कि बाबा उस वक्त वहां बैठे थे. हमने उनके सोने का कमरा भी देखा. डिस्कवरी ने भी उनकी कहानी पर फिल्म बनायी है, कहते हैं उस फिल्म में सोते वक्त बाबा के बिस्तर के दबने तक को दिखाया गया है. कैंटीन में हमने दो मसाला पाव खाया और वहां से चल पड़े.
लौटते वक्त जब हम छांगु लेक के पास पहुंचे तो पानी बरसने लगा. यह बहुत बुरा हुआ. क्योंकि हम झील के किनारे कुछ पल बैठना चाहते थे. खैर, हम फिर भी उतरे. वहां पारंपरिक भूटानी वेशभूषा किराये पर मिल रही थी लोग जिन्हें पहनकर और याक पर बैठकर फोटो खिचा रहे थे. ड्रेस के लिए 80 रुपये मांगते हैं मगर बारगेनिंग करने पर 30 रुपये में एक जोड़ी ड्रेस मिल जाती है. याक पर बैठने का किराया 50 रुपये है. हम तीनों ने ड्रेस पहनकर फोटो खिंचवाया पर याक पर नहीं बैठे. बारिश की वजह से हम वहां ज्यादा देर रुक नहीं पाये. भूख भी लग गयी थी. बगल में एक छोटा सा मार्केट है, बक्सर वाले सज्जन हमें यह कहते हुए वहां लेकर चले गये कि वहां खाने को कुछ मिल जायेगा. वेज मोमोज और मैगी. यही मिला. फिर वापसी.
लौटते वक्त रास्ता और खराब हो गया था, बारिश की वजह से. ढलान के कारण गाड़ी ज्यादा उछलकूद मचा रही थी. मगर हम थक इतने गये थे कि सोने लगे. शाम पांच बजे गंगटोक पहुंचे तो अंधेरा हो गया था. गाड़ी वाले ने हमें फिर छांगुलेक के पास उतार दिया. लौटते वक्त हमने कैलकुलेट किया तो पता चला कि आठ घंटे के इस ट्रिप में तकरीबन सात घंटे हमने यात्रा करते हुए गुजारे हैं. आधा धंटे से कुछ कम बाबा मंदिर पर ठहरे और आधे धंटे से कुछ अधिक छांगु लेक में जहां हमने झील कम देखा और मोमोज खाने में ज्यादा वक्त बरबाद किया. शरीर थकान की वजह से टूट रहा था. अगले दिन फिर हमें दार्जिलिंग की तरफ निकलना था. हमने टैक्सी स्टैंड से एक टैक्सी ली और एमजी रोड की तरफ निकल पड़े ताकि कुछ निशानियां खरीद सकें.

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