आस्था नहीं, विज्ञान की भेट चढीं हैं नदियां


पर्यावरण दिवस के मौके पर
पिछले दिनों जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जी ने फेसबुक पर गंगा की सफाई को लेकर एक अलग किस्म की बहस की शुरुआत की थी. उनका कहना था कि गंगा में जिस तरह श्रद्धालु नैवेद्य चढ़ाते हैं और हिंदू जिस तरह उसके किनारे शवधान करते हैं यह भी गंगा के प्रदूषण का बड़ा कारण है. इससे पहले भी इस तरह की बहसें होती रही हैं और हमारे एक साथी ने आस्था के कारण प्रदूषित होती नदियों को लेकर एक अभियान ही शुरू किया था. पिछले साल मैंने फेसबुक पर एक तसवीर देखी थी कि एक जगह मूर्तियों को दफन करने की परंपरा शुरू की गयी है, ताकि नदियों को प्रदूषण से बचाया जा सके. आम बौद्धिकों को भी यह सहज स्वाभाविक लगता है कि नदियों इन्हीं धार्मिक और लोक परंपराओं की वजह से लगातार मरणासन्न हो रही हैं. अगर नदियों को बचाना है तो इन परंपराओं को रोकना होगा. मगर ऐसे लोग यह सवाल खुद से नहीं पूछते कि ये परंपराएं तो हजारों सालों से चली आ रही हैं, हजारो सालों से हिंदुओं के लिए अंतिम संस्कार का सबसे प्रिय स्थल नदियों का तट ही रहा है और मूर्तियों व निर्माल्य का विसजर्न भी नदियों में ही किया जाता रहा है. मगर नदियां तब तो नहीं मरीं. वे पिछली शताब्दि के दौरान मरणासन्न होने लगीं जब इन नदियों के तट पर बसे शहरों ने औद्योगिक और घरेलू कचरा इन नदियों को समर्पण करना शुरू किया. इससे भी अधिक तब जब हमारे विज्ञान ने इन नदियों पर बड़े बांधों और तटबंधों का निर्माण शुरू किया. दरअसल हमारी नदियां हमारी आस्था की भेट नहीं चढ़ी हैं, उन्हें आधुनिक विज्ञान ने सूली पर चढ़ाया है. इसके बावजूद अगर हम इलजाम आस्था को ही देते रहेंगे तो यह सिर्फ मुद्दों को भटकाना होगा.
अगर सच पूछा जाये तो नदियों को सबसे अधिक नुकसान किसी चीज से हुआ है तो वे हैं बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और विद्युत परियोजनाएं. इन परियोजनाओं की शुरुआत आजादी के बाद हुईं. देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू का प्रिय वाक्य था, बड़े बांध देश के मंदिर हैं. उस वक्त भाखड़ा नांगल परियोजना का जलवा था, जिसने पंजाब में नहरों का जाल बिछाकर उस राज्य को खेती में शीर्ष पर पहुंचा दिया था और उससे उत्पादित बिजली से देश के शहर रोशन हो रहे थे. नेहरू उस मॉडल को पूरे देश में लागू करना चाहते थे. आज जब हम उस मॉडल का नतीजा देखते हैं तो पाते हैं कि भाखड़ा नांगल और इंदिरा सरोवर परियोजना को छोड़ दिया तो देश में शायद ही कोई ऐसी सिंचाई परियोजना हो जिसका लाभ किसानों को ठीक से मिल पाया हो. कई परियोजनाएं जो उस दौर में शुरू हुई थीं, वे आज तक पूरी नहीं हो पा रही हैं. उन परियोजनाओं में हर साल हजारो करोड़ झोंके जा रहे हैं, बेवजह. फरक्का परियोजना उनमें से ही एक परियोजना है, जिसने बिहार-झारखंड और बंगाल को सस्ती बिजली को उपलब्ध करा दी, मगर उससे सिंचाई का लाभ नहीं के बराबर मिला, साइड इफेक्ट के तौर पर गंगा कब्जियत का शिकार हो गयी. विशेषज्ञ बताते हैं कि उस परियोजना का गुप्त मकसद हुगली नदी के सिल्ट की सफाई थी, ताकि डायमंड हार्बर पोर्ट से आने वाले जहाज हुगली में फंसे नहीं और सीधे कोलकाता पहुंच सकें. वह मकसद कमोबेस आज भी पूरा हो रहा है. मगर उस परियोजना का असर गंगा पर बहुत ज्यादा हुआ. गंगा पहाड़ों से जो सिल्ट अपने साथ लेकर बहती थी वह उस परियोजना की वजह से चलायमान नहीं रह सका. जो सिल्ट कभी सुंदरवन डेल्टा के किनारे जमा होता था, वह अब गंगा के बेड में ही जमा होने लगा और इसकी वजह से गंगा का बेड उथला हो गया और नदी की चाल अस्वभाविक होकर रह गयी. मगर अभियंताओं का मन इस प्रयोग से नहीं भरा. उन्होंने एक और बांध टिहरी पर बना दिया. यह कुछ ऐसा ही था कि किसी व्यक्ति का पहले मलद्वार बंद कर दिया जाये फिर गले को जाम कर दिया जाये. इससे बावजूद अगर गंगा में पानी है तो बस अपनी सहायक नदियों की वजह से जो पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार के हर कोने में गंगा में अपनी जलराशि समर्पित करती रही हैं.
यही हाल देश की दूसरी नदियों के साथ हो रहा है. नर्मदा और महानदी में तो पग-पग पर बांध बनाये जा रहे हैं. उत्तर बिहार की नदियों, कोसी, बागमती, गंडक, कमला आदि को बराज और तटबंधों के जरिये खत्म किया जा रहा है. अब नदी जोड़ो परियोजना का एक नया शिगूफा है. दरअसल सच्चई यह है कि नदियों को अगर जिंदा रखना है तो उसकी पहली शर्त है उसके धारा से छेड़छाड़ कम से कम किया जाये. न बांध बनें, न बैराज, न तटबंध. उन्हें स्वभाविक रूप से बहने दिया जाये. मगर हमारे देश और राज्यों में बने जल संसाधन विभाग का एकमात्र मकसद इन नदियों के बहाव के साथ तरह-तरह के प्रयोग करना है. सच्चई यह है कि कम से कम पूर्वी भारत में जितनी नहरें बनी हैं वे सब अपेक्षा का दस फीसदी सिंचाई भी उपलब्ध नहीं करा पातीं और अब यह स्वीकृत तथ्य है कि तालाब और कुओं से बेहतर सिंचाई के साधन दूसरे नहीं हैं. इसलिए कम से कम सिंचाई के नाम पर नदियों से छेड़छाड़ न हो और जलविद्युत का लालच भी न रखा जाये. बिजली उत्पादन के दूसरे कई साधन हैं उनका सहारा लिया जाये. नदी जोड़ो परियोजना से भी कुछ हासिल नहीं होने वाला है, सिवा ठेकेदारों और अभियंताओं के आर्थिक हित सधने के. बरसात को छोड़ दिया जाये तो दूसरे किसी मौसम में देश के किसी नदी के पास इतना पानी नहीं है कि वह दूसरी नदी को उधार दे सके और बरसात में हर नदी के पास पर्याप्त जलराशि होती है.
हां, बरसात में नदियों में आने वाले अतिरिक्त जलराशि को अगर संग्रहित करने का कोई उपाय हो तो वह बेहतर नतीजा दे सकता है.
नदियों को दूसरा सबसे अधिक नुकसान औद्योगिक और घरेलू कचरे से हो रहा है. सबसे पहले तो यह सोच ही गलत है कि कचरा नदी में डाला जाये. आज तक इस सोच पर लगाम नहीं लगी है. नदियों के किनारे बने जलशोधन संयंत्र इसके उदाहरण हैं, जो यह मानते हैं कि शहरों का गंदा पानी साफ कर नदी में डाला जा सकता है. आखिर क्यों, नदियों को किसी तरह के कचरे या पानी की कतई जरूरत नहीं है. नदियों को ग्लैसियर और उसकी सहायक नदियों से खूब जलराशि मिलती हैं और बरसात में वैसे भी पानी बहकर नदियों में पहुंचता ही है. इसलिए नदियों के किनारे बसे तमाम औद्योगिक इकाइयों को जगह खाली कर कहीं और चले जाने कहा जाये और शहर की सीवेज नालियों की दिशा किसी और तरफ मोड़ दी जाये, तभी नदियां बच सकती हैं. मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति के बगैर यह मुमकिन नहीं. इतने दिनों से गंगा को लेकर हाय-तौबा मचने के बावजूद कानपुर का औद्योगिक कचरा गंगा में मिलने से नहीं रोका जा सका है. कहते हैं इसकी वजह वोट बैंक पॉलिटिक्स है. झारखंड की तमाम नदियां औद्योगिक प्रदूषण की शिकार हैं. देश के तमाम ताप और विद्युत संयंत्र नदियों के किनारे ठिकाना ढूंढते हैं. उन्हें इससे रोकना होगा और उन्हें पहले झील बनाकर उसमें बरसाती पानी इकट्ठा करना चाहिये तब विद्युत संयंत्र स्थापित करना चाहिये. सरकार को भी इस संबंध में कड़ाई से काम लेना होगा.
शहर का गंदा पानी क्यों नदी में डाला जाये. मैंने कई शहरों में देखा है कि गंदे पानी को जमाकर झीलनुमा शक्ल दिया गया है और उन्हें पर्यटन का केंद्र बना दिया गया है. नदियों के किनारे बसे शहरों को भी इस मॉडल को अपनाना चाहिये, इसके बदले जल शोधन संयंत्रों में करोड़ों का खर्च करना बेकार है.
ऊपर जिन मसलों को उठाया गया है, उससे यह स्पष्ट है कि नदियों को दूषित और मृतप्राय बनाने में हमारे विज्ञान और विकासवादी सोच का बड़ा हाथ है. हां, आस्थावान लोगों से भी चूक होती है, जैसे वे निर्माल्य पॉलिथीन में फेंकते हैं, नदियों में साबुन लगाकर नहाते हैं, कैमिकल रंगों के बनी मूर्तियों का विसजर्न करते हैं. इन तमाम वजहों से नदियां प्रदूषित तो होती हैं, भले ही वह औद्योगिक प्रदूषण के मुकाबले नगण्य हो फिर भी, इन पर रोक लगनी चाहिये. इस संबंध में संत समुदाय को भी जागृति फैलानी चाहिये. इस देश में नदी को स्वच्छ बनाने का एक अनूठा प्रयोग संत सीचेवाल ने किया है. वह प्रयोग साबित करता है कि नदियों को आस्थावान लोग ही बचा सकते हैं, खास तौर पर वैसा समुदाय जो सदियों से नदियों के साथ स्नेहपूर्ण संबंध निभा रहा है.

Comments

shweta said…
very nice post ..especially about Tiheri dam.