Tuesday, July 22, 2014

धरनई गांव का अपना माइक्रो ग्रिड- यानी बिजली पर अपनी मरजी


इस रविवार की दोपहर जहानाबाद के धरनई गांव में बने स्टेज पर पंचायत प्रतिनिधि लोगों को एक ऐसी सेवा उपलब्ध करा रहे थे जो उनके लिए दो दशकों तक 24 घंटे रोजाना बिजली की गारंटी बनने वाली थी. उधर गांव में एक पक्के मकान में अपने कमरे के अंदर एक बुजुर्ग खाट पर लेटकर पंखे की हवा का आनंद ले रहे थे. गांव की औरतें बता रही थीं कि अब उनके घरों में बल्व जलते हैं और मोबाइल भी चार्ज होता है. किसान बता रहे थे कि अगले साल धान के मौसम में खेत में पानी की भी किल्लत नहीं होगी. बारिश हो न हो उनके खेतों को सोलर पंप से भरपूर पानी मिलेगा. ये घटनाएं धनरई के लोगों के लिए इसलिए बड़ी थीं क्योंकि उन्होंने बिजली के लिए तीन दशकों का इंतजार किया था. गांव में बिजली के पोल गड़े हैं मगर 30 साल से कभी बिजली आयी ही नहीं.
धनरई गांव में रविवार को हुए इस प्रयोग के जरिये देश में संभवत: पहली बार एक पंचायत ने माइक्रो ग्रिड बिठाकर खुद को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर घोषित कर दिया. दिलचस्प यह है कि गांव की रातों का अंधेरा दूर करने के लिए न किसी को एक इंच विस्थापित होना पड़ा, न पर्यावरण हो रहा है, न वे किसी कोल ब्लॉक की सप्लाई पर आश्रित हैं और न ही उन्हें निरंतर सप्लाई के लिए किसी एजेंसी का मुंह जोहना पड़ेगा. यहां के रातों का अंधेरा गांव के आकाश में जगमगाने वाले सूरज ने ही मिटाया है. वैकल्पिक स्रोतों के जरिये देश और दुनिया का ऊर्जा दारिद्र्य मिटाने का सपना देखने वालों के लिए यह बड़ी जीत है.
धनरुआ के सोलर माइक्रो ग्रिड के निर्माण में कुल 3 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. अब इन तीन करोड़ रुपये के निवेश के बाद गांव तकरीबन दो दशक तक चौबीसो घंटे निर्बाध बिजली का इस्तेमाल कर सकता है. बिना टैरिफ में वृद्धि किये. इस योजना के क्रियान्वयन से जुड़ी संस्था ग्रीनपीस के प्रतिनिधि बताते हैं कि 3 करोड़ की राशि तो इतनी छोटी है कि इतना तो किसी गांव तक पोल, बिजली के तार और ट्रांसफार्मर लाने में खर्च हो जाते हैं. फिर उस गांव में बिजली उपलब्ध होगी या नहीं यह कहना मुश्किल होता है. जैसे धरनई गांव का सालों पहले विद्युतीकरण हो चुका था. मगर तीस साल से गांव में बिजली कभी आयी ही नहीं. इस लिहाज से यह मॉडल 24 घंटे निर्बाध बिजली की गारंटी देता है.
यह सर्वज्ञात तथ्य है कि हमारा देश आज भी ऊर्जा संकट का कोई स्थायी समाधान नहीं तलाश पाया है. बिजली के नाम पर पहले बड़े बांध और अब थर्मल पावर स्टेशन ही विकल्प माने जाते हैं. यह ठीक है कि इन साधनों से सस्ती और बड़े पैमाने पर बिजली पैदा की जा सकती है. मगर परियोजनाओं का दुष्प्रभाव जानने के बाद वह सस्ती बिजली काफी महंगी मालूम पड़ती है. इन परियोजनाओं की वजह से लाखों परिवार विस्थापित होते हैं और बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैलता है. इसी वजह से दुनिया भर में धीरे-धीरे सहमति बन रही है कि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों को इन विनाशकारी परियोजनाओं से गैरपारंपरिक ऊर्जा उपायों की तरफ शिफ्ट करें. जिसमें न विस्थापन का खतरा है, न प्रदूषण का. इसके अलावा ऊर्जा के साधनों पर स्थानीय लोगों का अपना स्वामित्व हो ताकि वह अपनी जरूरतों के हिसाब से ऊर्जा का ससमय उपयोग कर सकें. जबकि बड़े पावर ग्रिड के जरिये हमेशा गांव और हाशिये के लोगों की जरूरतों को महत्व नहीं दिया जाता. ऐसे में माइक्रो पावर ग्रिड की परिकल्पना ने आकार लिया है. मगर हर बार यह सवाल भी उठता है कि ये परियोजनाएं क्या वास्तव में धरती पर आकार ले सकती हैं. क्या इसे वास्तव में जमीन पर सुगमता पूर्वक संचालित किया जा सकता है.
ऐसे ही विचार पर लगातार काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस ने पिछले दिनों बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस तरह के परियोजनाओं के बारे में प्रेजेंटेशन दिखाकर उनसे बिहार में इसे लागू करने की अपील की थी. संस्था के प्रतिनिधियों के मुताबिक तब नीतीश कुमार ने कहा था कि यह योजना आकर्षक तो लगती है मगर इसे क्या जमीन पर उतारा जा सकता है. तब संस्था के लोगों ने कहा था कि वे इसे एक गांव में लागू करके दिखायेंगे ताकि इस मॉडल को बिहार के बिजली विहीन दूसरे हजारों गांवों में लागू किया जा सके. उसके बाद ही 2012 में संस्था के लोगों ने जहानाबाद के इस धनरु आ गांव का चयन किया ताकि इस योजना को वहां लागू किया जा सके. दो साल की अनवरत कोशिशों के बाद आखिरकार धरनई में यह प्रयोग सफल हुआ है. अब सरकार को तय करना है कि क्या वह इस मॉडल को अपनाने जा रही है.

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