Thursday, July 24, 2014

भारतीय भाषाओं को हक दिलाने की एक कारगर लड़ाई


सोलहवीं लोकसभा में शपथ ग्रहण के दौरान आपने महसूस किया होगा कि कई सांसदों ने हिंदी, संस्कृत और अपनी मातृभाषा में शपथ ली. आंकड़ों के मुताबिक यह पहला मौका था जब संसद में 17 अलग-अलग भारतीय भाषाओं में शपथ लिये गये थे. इनमें हिंदी और अपनी मातृभाषा में शपथ लेने वालों की संख्या तो काफी थी, सबसे रोचक यह तथ्य है कि सभी भारतीय भाषाओं की जननी कही जाने वाली संस्कृत भाषा में भी 42 सांसदों ने शपथ ग्रहण किया. मगर क्या आप जानते हैं कि यह मुमकिन कैसे हुआ. इसे मुमकिन किया कुछ ऐसे लोगों के समूह ने जो देश में भारतीय भाषाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए लंबे समय से सक्रिय हैं. इस अभियान का नेतृत्व करने वाले प्रवीण कुमार जैन ने तो पिछले तीन-चार सालों में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए इतने अभियानों का संचालन किया है कि वे वन मैन आर्मी की तरह माने-जाने लगे हैं.
हिंदी में शपथ ग्रहण के अलावा सरकार द्वारा सोशल मीडिया में हिंदी को प्राथमिकता दिये जाने के फैसले के पीछे भी उनका दबाव ही कारगर साबित हुआ है. प्रवीण बताते हैं कि वे पिछले दो-ढाई साल से इस अभियान में जुटे थे और अपने मित्र समूह की मदद से सभी मंत्रालयों को पत्र लिख रहे थे कि वे सोशल मीडिया के संदेशों में हिंदी को प्राथमिकता दें. उनका तर्क यह था कि इस देश की 97 फीसदी आबादी अंग्रेजी भाषा का प्रयोग नहीं करती तो फिर हर मामले में अंग्रेजी को क्यों थोपा जाता है. प्रवीण बताते हैं कि यह आदेश बेवजह राजनीतिक विवाद में पड़ गया. दरअसल, इस आदेश की मंशा कतई दूसरी भारतीय भाषाओं को कमतर साबित करना नहीं था. इसका उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं को गौरव दिलाना था.
मध्यप्रदेश के सागर जिले के रहने वाले प्रवीण कुमार जैन मुम्बई में कंपनी सचिव(सीएस) हैं. वे साल 2011 से ही हिंदी और दूसरी भाषाओं को सम्मान दिलाने के अभियान में जुटे हैं. इस अभियान के तहत उन्होंने सिर्फ सरकारी विभागों को ही फोकस नहीं किया है, वे सरकारी और निजी सभी बैंकों और उपभोक्ता सामग्री निर्माण करने वाली कंपनियों को भी हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया और कई दफा मजबूर भी. वे कहते हैं कि हमें उपभोक्ता वस्तु और सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी बनती है कि हमें उपलब्ध होने वाली सेवा या वस्तु के बारे में वे हमारी भाषा में जानकारी दे. जैसे, पारले का बिस्कुट गांव-गांव में इस्तेमाल किया जाता है, मगर इसके रैपर पर जितनी जानकारियां होती हैं, सब अंग्रेजी में लिखी होती हैं. नाम से लेकर मूल्य तक और इस बिस्कुट के निर्माण में जो सामग्री इस्तेमाल की गयी है उसका विवरण भी अंग्रेजी में ही होता है. क्या एक उपभोक्ता का यह अधिकार नहीं कि उसे यह जानकारियां उसकी भाषा में दी जाये. वे बैंकिग सेवाओं में भारतीय भाषाओं के प्रयोग के लिए भी लगातार संघर्ष करते रहे हैं.
पासबुक की प्रिंटिंग, एटीएम की स्लिप और एसएमएस अलर्ट तक में भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल हो इसके लिए उन्होंने देश की तमाम बैंकों को लगातार पत्र लिखा और उनके शीर्ष अधिकारियों पर दबाव बनाया. आरबीआइ और सेबी को भी शिकायतें कीं. इस संघर्ष का सकारात्मक नतीजा भी आया. वे बताते हैं कि एचडीएफ जैसे बैंक ने उनके सुझाव को सकारात्मक रूप में लिया और मोबाइल बैंकिग और एसएमएस अलर्ट की सुविधा हिंदी में मुहैया कराने वाला वह पहला भारतीय बैंक बन गया. अब केनरा बैंक भी ऐसी सुविधा देने लगा है. उनकी एक सहयोगी विजयलक्ष्मी द्वारा लगातार दबाव बनाने की वजह से देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने ग्राहकों के कहने पर पासबुक हिंदी में प्रिंट कर देने की व्यवस्था की है. अब वे दबाव बना रहे हैं कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में पासबुक बाइ डिफॉल्ट हिंदी में प्रिंट हों और अगर कोई अंग्रेजी में मांग करे तो उन्हें यह सुविधा दी जाये. इसके लिए वे आरबीआइ पर भी दबाव बना रहे हैं. उनके प्रयासों की वजह से ही यूनियन बैंक एटीएम की पर्चियां नौ भारतीय भाषाओं में देने लगा है. उनका कहना है कि बैंकों की ऑनलाइन सेवाओं में अंग्रेजी का एकाधिकार शर्मनाक है. क्या अंग्रेजी नहीं जानने वालों का संचार क्रांति पर कोई हक नहीं है?
उपभोक्ता वस्तुओं के मसले पर उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली है. कोलगेट के कुछ पेस्ट और कुछ साबुन के नाम हिंदी में जरूर आने लगे हैं. वे कहते हैं कि आकाश नमकीन और हल्दीराम जैसी कंपनियों पर भी उन्होंने दबाव बनाया है, यह कहते हुए कि वे भारतीय स्वाद का प्रचार करती हैं मगर भारतीय भाषा का इस्तेमाल क्यों नहीं करतीं. वे बताते हैं कि यह हैरत की बात है कि हल्दीराम के पैकेट पर फ्रेंच, रशियन जैसी भाषाओं में तो लिखा होता है, मगर हिंदी में नहीं. जिस हिंदी इलाके में उसके सबसे अधिक उपभोक्ता हैं. वे कहते हैं कि जब तक इन वस्तुओं के निर्माण सामग्री का ब्योरा जब तक भारतीय भाषाओं में नहीं आयेंगे तब तक इस मसले पर उनकी लड़ाई अधूरी रहेगी. जहां निजी कंपनियों से लड़ाई में उपभोक्ता अधिकार को वे अपना हथियार बनाते हैं, वहीं सरकारी विभागों में हिंदी और दूसरी भाषाओं को अधिकार दिलाने के लिए प्रवीण ने राजभाषा अधिनियम और राजभाषा नियमावली को आधार बनाया है. उन्होंने इसके आधार पर भारत सरकार के तमाम मंत्रलयों, सूचना प्रसारण विभाग के प्रतिष्ठानों व अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों को पत्र लिखे, आरटीआइ दायर किया और सामूहिक संदेश भेजे. प्रवीण कहते हैं कि सबसे पहले उन्होंने प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर हिंदी के इस्तेमाल का अनुरोध करते हुए पत्र लिखा. लगातार पत्राचार करने के बावजूद जब कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी तो उन्होंने सूचना का अधिकार कानून के तहत सूचना मांगी कि वहां राजभाषा अधिनियम के प्रावधानों का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा. छह-सात महीने तक लगातार सूचना मांगने बाद वहां हिंदी का प्रयोग होता नजर आने लगा. फिर उन्होंने राष्ट्रपति भवन के वेबसाइट पर हिंदी का प्रयोग सुनिश्चित करने का अभियान शुरू किया. वे बताते हैं कि राष्ट्रपति भवन के ज्यादातर अधिकारी दक्षिण भारतीय थे, इसलिए वे इस मसले में बहुत रुचि नहीं ले रहे थे. फिर उन्होंने उन्हें याद दिलाया कि राजभाषा अधिनियम और नियमावली के साथ-साथ केंद्रीय हिंदी समिति के कई प्रस्ताव राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से ही लागू हुए हैं. 1 अप्रैल 2014 से वहां भी हिंदी सम्मानित रूप में नजर आने लगी.
इस बीच उनकी निगाह दलाई लामा के वेबसाइट पर गयी. वहां उन्होंने देखा कि अंग्रेजी के साथ-साथ मंगोल, जर्मन, फ्रेंच और कई पश्चिमी भाषाएं मौजूद हैं मगर वे जिस देश में रहते हैं उसकी कोई भाषा वे इस्तेमाल नहीं कर रहे. उन्होंने इस पर दलाई लामा को पत्र लिखा और आग्रह किया. प्रवीण बताते हैं कि दलाई लामा ने उनके इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और जून, 2013 में गुरु पूर्णिमा के दिन से ही यह वेबसाइट हिंदी में भी नजर आने लगी. प्रवीण कुमार जैन बताते हैं कि बचपन से ही उनके मन में यह बात रहती थी कि देश में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं को समुचित सम्मान नहीं मिला है. अंग्रेजी की तुलना में उनकी हैसियत कमतर रहती है. वे बताते हैं कि एक दिन तीन मित्रों ने मिलकर शपथ लिया कि वे चाहे बड़े पद पर क्यों न चले जायें मगर वे हिंदी का ही इस्तेमाल करेंगे.देवनागरी में ही हस्ताक्षर करेंगे और देवनागरी अंकों का ही इस्तेमाल करेंगे. मगर बचपन में ली गयी शपथ की बात आयी गयी हो गयी. 2011 में अचानक उनकी नजर राजभाषा अधिनियम और नियमावली पर पड़ी तो उन्हें लगा कि देश में भारतीय भाषाओं का सम्मान तो इस कानून के जरिये ही वापस लाया जा सकता है. इसके बाद उन्होंने अपना अभियान शुरू कर दिया.
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के वेबसाइट के बाद उन्होंने प्रसार भारती के संस्थानों में भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने की मुहिम शुरू की. उन्होंने कहा कि दूरदर्शन के सारे चिह्न यूपीए शासन में अंग्रेजी में हो गये थे. उन्होंने अभियान चलाकर प्रसार भारती पर दबाव बनाया कि दूरदर्शन का लोगो और दूसरे चिह्न हिंदी में लायें. इस मुहिम का नतीजा यह निकला कि डेढ़ साल के अभियान के बाद पिछले साल जून में दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल में पहले हिंदी और फिर अंग्रेजी वाला लोगो दिखना शुरू हो गया. जबकि क्षेत्रीय भाषाओं के चैनल में पहले उस भाषा का लोगो आता है फिर अंग्रेजी का. प्रवीण बताते हैं कि अब वे इस बात की मांग कर रहे हैं कि त्रिभाषा फार्मूले के तहत क्षेत्रीय भाषा के चैनल में उस भाषा और अंग्रेजी के साथ हिंदी का लोगो भी दिखाया जाये. अगर दो भाषाओं में ही दिखाना है तो अंग्रेजी के बदले हिंदी का लोगो दिखायें. प्रवीण बताते हैं कि इसी तरह सूचना का अधिकार की वेबसाइट भी हिंदी में नहीं थी, सिर्फ अंग्रेजी में थी. उनलोगों के दबाव के बाद यह हिंदी में हुई. हालांकि अभी भी इस साइट के जरिये हिंदी में आवेदन नहीं किया जा सकता. हिंदी में आवेदन करने के लिए अभी पीडीएफ फाइल अपलोड करना पड़ता है.
मगर वे लगातार जोर डाल रहे हैं कि इस साइट पर हिंदी समेत दूसरी भारतीय भाषाओं में आवेदन की सुविधा उपलब्ध हो सके. उसी तरह टीवी चैनलों पर आने वाले धारावाहिक में भी क्रेडिट लाइन अंग्रेजी में होते रहे हैं. प्रवीण जैन ने इसके खिलाफ मुहिम में जीटीवी में कार्यरत अपने मित्र चंद्रकांत जोशी का सहयोग लिया और उसी का नतीजा है कि आज कई धारावाहिकों के नाम और क्रेडिटलाइन में हिंदी और देवनागरी नजर आने लगे हैं. अब वे लोग मिलकर हिंदी फिल्मों में हिंदी और देवनागरी के प्रयोग के लिए अभियान चला रहे हैं. वे कहते हैं कि जब हिंदी फिल्में हिंदी के नाम पर व्यापार कर रही हैं तो फिर वे फिल्मों के नाम में भी हिंदी या देवनागरी का इस्तेमाल क्यों नहीं करतीं. प्रवीण जैन यह अभियान अकेले नहीं चलाते. उनके कई साथी हो गये हैं. वे आवेदन का परफार्मा तैयार कर मेल और सोशल मीडिया के जरिये उसे सर्कुलेट कर देते हैं. फिर कई लोग एक साथ पत्र लिखते हैं या आरटीआइ का आवेदन करते हैं. इस तरह से संबंधित संस्था पर दबाव बनता है और वे माकूल फैसले लेने को प्रेरित या बाध्य होती है. इस तरह से एक अकेले व्यक्ति के जरिये शुरू हुआ भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने का यह अनूठा अभियान आज लगातार नये-नये लक्ष्य हासिल कर रहा है.

3 comments:

saralhindi said...

We all know that India is divided by complex scripts but not by phonetic sounds,needs simple script at national level such as India's simplest nukta and shirorekha free Gujanagari script in writing Hindi.

If Hindi can be written in Urdu or Roman script then why it can be done in easy regional script?

क ख ग घ च छ ज झ ट ठ ड ढ ण
ક ખ ગ ઘ ચ છ જ ઝ ટ ઠ ડ ઢ ણ

त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व
ત થ દ ધ ન પ ફ બ ભ મ ય ર લ વ

श स ष ह ळ क्ष ज्ञ रू ऋ श्र त्र कृ ऊँ ॐ
શ સ ષ હ ળ ક્ષ જ્ઞ રૂ ઋ શ્ર ત્ર કૃ ઊઁ ૐ

क का कि की कु कू कॅ के कै कॉ को कौ कं कः कँ कृ
ક કા કિ કી કુ કૂ કૅ કે કૈ કૉ કો કૌ કં કઃ કઁ કૃ

अ आ इ ई उ ऊ ऍ ए ऐ ऑ ओ औ अं अः
અ આ ઇ ઈ ઉ ઊ અૅ એ ઐ ઑ ઓ ઔ અં અઃ

આઓ મિલકર સંકલ્પ કરે,
જન-જન તક ગુજનાગરી લિપિ પહુચાએંગે,
સીખ, બોલ, લિખ કર કે,
હિન્દી કા માન બઢાએંગે.
ઔર ભાષા કી સરલતા દિખાયેંગે .
બોલો હિન્દી લેકિન લિખો સર્વ શ્રેષ્ટ નુક્તા/શિરોરેખા મુક્ત ગુજનાગરી લિપિમેં !

Dr. Dhanakar Thakur said...

Nagri itnee kathin nahe ehai ki use aur saral banawe. vaise apaka prayas achchaa hai.

Dr. Dhanakar Thakur said...

achha laga jankar kiजब संसद में 17 अलग-अलग भारतीय भाषाओं में शपथ लिये गये थे. इनमें हिंदी और अपनी मातृभाषा में शपथ लेने वालों की संख्या तो काफी थी, सबसे रोचक यह तथ्य है कि सभी भारतीय भाषाओं की जननी कही जाने वाली संस्कृत भाषा में भी 42 सांसदों ने शपथ ग्रहण किया"" Har bharteey bhashaa aaur usme shapath lenewalon ki sankhyaa likhen to achha lagega.