कहां है पानी, पानी तो खाली टीवी और पेपर में है...


पिछले दिनों कोसी के इलाके में बाढ़ की संभावना ने लोगों को हलकान कर दिया था. बाढ़ तो आयी नहीं मगर तीन दिन नौ जिलों के लोग तबाह रहे. उन दिनों मैं उसी इलाके में था. यह रिपोर्ताज लिखी, जो प्रभात खबर में प्रकाशित भी हुआ...
वीरपुर बाजार के एक नेट कैफे में जब यह खबर टाइप की जा रही है, बाजार के तीन चौथाई दुकान बंद हैं और सड़कें सूनी हैं. लोग बताते हैं कि सोमवार को तो और भी सूना-सपाटा माहौल था. वीरपुर और आसपास के कई गांवों के लोग दो अगस्त की शाम से ही घर छोड़कर सुरक्षित स्थान की ओर जाने लगे थे. तीन अगस्त औऱ चार अगस्त के दिन यहां एक इंसान नजर नहीं आता था. आसपास के गांव ललितग्राम, बलुआ बाजार, लछमिनियां, भीमनगर, ठुठ्ठी, चापीन, हृदयनगर, सीतापुर आदि गांवों के तकरीबन 90 फीसदी लोगों ने अपने रिश्तेदारों के घरों में शरण ले ली थी. मंगलवार को खतरा टलने की खबर सुनकर पास पड़ोस में रहने वाले इक्का-दुक्का परिवार रहे हैं.
नेट कैफे संचालक संजय कुमार राय बताते हैं कि तीन अगस्त को तो सड़कों पर एक आदमी नजर नहीं आता था. आसपास के दर्जनों गांवों के लोग पलायन कर गये थे. ऐसा इस वजह से हुआ कि 2008 की भीषण बाढ़ में सबसे अधिक तबाही हमारे इलाके के लोगों ने ही झेली थी. यह इलाका कुसहा के मुहाने पर पड़ गया था. इसलिए बाढ़ की बात सुनकर ही लोग घबरा गये और कोई रिस्क लेने के बदले घर छोड़ कर सुरक्षित इलाकों में चले गये. एक स्थानीय होटल संचालक भी इस बात की पुष्टि करते हैं और कहते हैं कि आम दिनों में आप आते तो यहां भयंकर शोर-शराबा और भीड़-भाड़ का माहौल देखते. तीन दिन से इतना सन्नाटा है कि लगता है हम किसी और जगह में रह रहे हैं.
वैसे तो इन गांवों के लोग ज्यादातर अपने रिश्तेदारों के घर गये हैं. कुछ गरीब तबके के लोग राघोपुर स्टेशन के पास भी शरण लिये हुए हैं, जहां 2008 में बाढ़ का पानी नहीं आया था. इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग सरायगढ़ स्थित रिलीफ कैंपों में नजर आते हैं. वैसे तो ये कैंप तटबंध के भीतर के लोगों के लिए बने थे. मगर वहां बसंतपुर प्रखंड के दहशतजदां लोगों ने भी बड़ी संख्या में शरण ले रखी हैं. कैंप में उन्हें चार वक्त का भोजन, रहने की सुविधा, स्वास्थ्य सुविधा आदि तो उपलब्ध है ही साथ ही छोटे बच्चों के लिए आंगनबाड़ी केंद्र भी काम कर रहे हैं. इस बार के सरकारी रिलीफ कैंपों की सुविधा से लोग काफी संतुष्ट नजर आते हैं. वे अभी इन कैंपों में चार दिन और रहकर लौटना चाहते हैं. इन्हें अभी भी भरोसा नहीं है कि खतरा टल गया है. एक बुजुर्ग लक्ष्मी राम बताते हैं कि कभी कहा जाता है विस्फोट किया जायेगा, कभी कहा जाता है खतरा टल गया. हम कैसे भरोसा कर लें. एक तरह की बात कही जाये तब तो.
कोसी के तटबंध के भीतर रहने वाले लोग भी बड़ी संख्या में उस रिलीफ कैंप में हैं. इनमें ढोली, कटैया भुलिया, कटैया, बलथरवा, सियानी, बनैनिया, सिरपुर गिरधारी, गौरीपट्टी आदि गांवों के लोग हैं. मगर उन लोगों में दहशत का माहौल कम ही नजर आता है. इनमें से अधिकांश लोग सेना द्वारा दबाव बनाकर यहां लाये गये हैं. पुरुष वर्ग के लोग दिन के वक्त अभी भी कैंप छोड़कर गांवों में चले जाते हैं, जहां उनके मवेशी रह रहे हैं. दरअसल रिलीफ कैंपों का इंतजाम तो बेहतर है, मगर मवेशियों के लिए ठीक इंतजाम हो नहीं पाया है. हालांकि पानी बढ़ने की वजह से उनके गांव पहुंचे का एक मात्र रास्ता नावें ही रह गयी हैं. मगर वे फिर भी गांव आना-जाना छोड़ नहीं रहे हैं. ऐसे ही गांव का एक युवक रवि राम कहता है कि हमलोगों का जीवन तो पानी में ही गुजरा है, हमको क्या भय. कितना भी पानी आ जायेगा. हमलोग अपने बचने का रास्ता निकाल लेंगे. यह तो आप लोगों ने सबको डरा दिया है, हम लोग तो जानते हैं कुछ नहीं होगा. कुछ होगा भी तो बराज के पहले ही तटबंध टूट जायेगा और पानी निकल जायेगा.
वैसे तटबंध के किनारे-किनारे चलने बड़ी संख्या में बांस और बत्ती लगे हुए हैं. पूछने पर लोग बताते हैं कि बांध के अंदर के लोगों ने बांस-बल्ली लगाकर जगह घेर लिया है कि अगर पानी आया तो यहीं आकर रहेंगे. तटबंध की ओर हाथ दिखाकर बताते हैं कि झुट्ठो हल्ला है, बताइये कहां है पानी... तीन दिन से परेशान-परेशान हैं, पानी अब आयेगा, तब आयेगा... खाली फौरकास्टिंग करता है, लगता है हदसा कर जान ले लेगा...
तकरीबन ऐसा ही माहौल सिमराही बाजार के आसपास का है. वहां के लोगों को इस बात का आत्मविश्वास है कि यहां तो 2008 में भी पानी नहीं आया था, अब क्या आयेगा. वीरपुर और आसपास के गांवों से पलायन करने वाले लोग भी इसी उम्मीद पर सिमराही बाजार में जा बसे हैं. वहां भी तीन दिन से लगातार इसी बात पर बहस हो रही है कि पानी आयेगा या नहीं आयेगा. विस्फोट होगा तो पानी कहां तक पहुंचेगा... बाजार पर रहने वाले युवक रोज-सुबह शाम पास के तटबंध के इलाके में झांक कर आ जाते हैं कि पानी बढ़ा तो नहीं. पानी की स्थिति जस की तस देखकर लौट आते हैं औऱ कहते हैं फॉल्स खबर उड़ा दिया है... चौक पर बैठे एक सिपाही जी कहते हैं, खाली माइकिंग है, हमको तो समझे में नहीं आता है पानी कहां है. न नहर में पानी न बैराज में पानी खाली पेपर और टीवी में है...

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