Monday, August 18, 2014

छह साल बीते मगर जख्म हरे के हरे


2008 की कोसी जल प्रलय की छठी बरसी आज
- पीड़ित 2.36 लाख, बने सिर्फ 27 हजार मकान. - 37 में से एक ही ग्रामीण सड़क हुई बनकर तैयार. - अभी भी नहीं बन पाये 70 में से 34 पुल-पुलिया. - विश्व बैंक ने घटाया योजना का लक्ष्य. - हजारों एकड़ खेतों में आज भी जमा है बालू. - नौ हजार करोड़ की है पुनर्वास की योजना.
मधेपुरा के शंकरपुर प्रखंड स्थित मधेली नहर के पास बिरेन यादव का ध्वस्त मकान आज भी उसी हालत में है, जैसा 2008 में कोसी नदी की धारा ने उसे छोड़ा था. वे पिछले छह सालों से प्रखंड मुख्यालय की दौड़ लगा रहे हैं कि उनके ध्वस्त मकान का मुआवजा मिल सके और वे अपने खस्ताहाल मकान को ठीक-ठाक करा सकें. इस बीच 2011 से कोसी के इलाके में विश्व बैंक समर्थित नौ हजार करोड़ वाली पुनर्वास योजना भी शुरू हो चुकी है. मगर बिरेन यादव जैसे हजारों लोग कोसी की उस भीषण आपदा के छह साल बाद भी एक अदद मकान के लिए तरस रहे हैं. इस काम को अंजाम देने में जुटी बिहार आपदा पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण सोसाइटी अब तक कोसी के इलाके में महज 27 हजार लोगों को घर उपलब्ध करा पायी है, जबकि खुद सरकार ने कभी माना था कि 2008 की भीषण बाढ़ में 2,36,632 मकान क्षतिग्रस्त हुए थे. तसवीर बदल देने के वायदों के बावजूद कोसी आज भी उजड़ी की उजड़ी है. खेतों में बालू भरे हैं और लोग पलायन को मजबूर हैं.
2008 के बाढ़ पीड़ित इलाकों में पुनर्वास के तहत बन रहे मकानों की हालत बहुत बुरी है. 2011 में शुरू हुए कई मकान अब तक लिंटर से ऊपर नहीं जा पाये हैं. अधबने मकानों पर झाड़ियां और लताओं ने डेरा बना लिया है. ऐसे ही एक लाभुक रायभीड़ पंचायत के अरताहा गांव के जनार्दन ठाकुर कहते हैं, क्या करें पुनर्वास के तहत जितना पैसा मिला था उससे मकान बना पाना संभव नहीं है. जो पैसा मिला है वह इंदिरा आवास से भी कम है. इसमें मकान, शौचालय और सोलर लाइट तक लगवाना है, सब नक्शा के मुताबिक. इस बीच बालू, सीमेंट और छड़ का दाम दुगुना-तिगुना हो गया है. जिनके पास पैसा है वे लोग अपना पैसा लगाकर किसी तरह मकान पूरा कर रहे हैं, हम गरीब लोग के पास इसमें लगाने के लिए पैसा कहां है.
इधर पुनर्वास सोसाइटी के अधिकारी भी काम की गति कम होने की बात स्वीकार करते हैं. वे बताते हैं कि अब तक सिर्फ 27,203 मकान ही बन पाये हैं. हैरत अंगेज बात तो यह है कि उन्होंने लक्ष्य ही 66,203 लोगों को मकान देने तक सीमित कर लिया है, जो पहले एक लाख का था. संभवतः काम की रफ्तर देखकर विश्व बैंक ने लक्ष्य में संशोधन किया है. विश्व बैंक के पर्यवेक्षक भी कई बार धीमी रफ्तार की शिकायत कर चुके हैं. अधिकारी बताते हैं कि ग्रामीण सड़क निर्माण की 37 योजनाओं में से महज एक ही पूरी हुई है और 70 में से महज 36 पुल ही बनाये जा सके हैं. ऐसी जानकारी है कि स्थानीय स्तर पर ठेकेदार जानबूझकर काम को लटका रहे हैं और सोसाइटी उन पर समुचित दबाव नहीं बना पा रही. विडंबना तो यह है कि खेतों से बालू निकालने के काम को 2016 तक के लिए टाल दिया गया है. अधिकारी कहते हैं यह काम दूसरे फेज में होना है. जबकि सुपौल जिले के कई गांवों में खेतों में बालू भरे हैं. आरटीआई एक्टिविस्ट महेंद्र यादव की आरटीआई के जवाब में सरकार ने स्वीकार किया था कि 14,129.70 एकड़ जमीन पर बालू जमा है. कई खेतों में 2 से 4 फीट बालू है. सरकार ने किसानों को खेतों से बालू हटाने के लिए चार से पांच हजार रुपये प्रति एकड़ की राशि दी थी, मगर किसानों का कहना है कि एक एकड़ जमीन से बालू हटाने का खर्च 50 हजार रुपये प्रति एकड़ से कम नहीं है. और उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि इस बालू को हटाकर रखें कहां. ऐसे में लोगों की खेती ठप पड़ गयी है और लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.
कोसी के पुनर्वास के लिए विश्व बैंक की योजना
विश्व बैंक ने कोसी के पुनर्वास के लिए 1009 मिलियन डॉलर की राशि स्वीकृत की है. इस राशि से 2021 तक कोसी का पुनर्वास करना है. परियोजना तीन चरणों में पूरी होनी है. काम मुख्यतः सहरसा के 5, सुपौल के 5 और मधेपुरा जिले के 11 प्रखंडों में होना है. इसके तहत
1. पहले चरण में एक लाख मकान बनने हैं 2. क्षतिग्रस्त सड़कों और पुल-पुलियों का निर्माण किया जाना है 3. बाढ़ प्रबंधन का काम किया जाना है 4. आजीविका के साधनों का विकास किया जाना है
पहले चरण के तहत 259 मिलियन डॉलर खर्च किये जाने हैं. पहले इसकी समय सीमा सितंबर, 2014 रखी गयी थी, काम के मौजूदा रफ्तार को देखते हुए समय सीमा बढ़ाकर 2016 कर दी गयी है. दूसरे चरण में 2019 तक 375 मिलियन डॉलर और तीसरे चरण में 2021 तक 375 मिलियन डॉलर खर्च किये जाने हैं.
कोसी आपदा- पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण नीति
22 दिसंबर 2008 को राज्य सरकार ने कोसी आपदा- पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण नीति घोषित की थी. इसके तहत घरों का निर्माण, सामुदायिक सुविधाओं की उपलब्धता, इंफ्रास्ट्रक्चर की संपूर्ण स्थापना और आजीविका में मदद की बात की गयी थी. कहा गया था कि
- इस आपदा को हम एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक वातावरण तैयार करने के मौके के रूप में देख रहे हैं. - प्रभावित क्षेत्र में निजी/सार्वजनिक संसाधनों का पुनर्वास और पुनर्निर्माण किया जायेगा. - क्षतिग्रस्त निजी/सार्वजनिक भवनों का समुचित तरीके से मरम्मत और पुनर्निर्माण किया जायेगा. - खेती, मत्स्य उद्योग, डेयरी उद्योग, लघु व्यवसाय और हस्तशिल्प के रूप में स्थानीय समुदाय को आजीविका उपलब्ध करायेंगे. - शिक्षा और स्वास्थ्य के तंत्रों का विकास और महिलाओं व कमजोर वर्गों के सशक्तीकरण पर विशेष ध्यान दिया जायेगा. - पंचायतों को क्रियान्वयन में भागीदारी दी जायेगी.
खबर आज के प्रभात खबर के अंक में प्रकाशित है.

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