Friday, August 22, 2014

इतना पानी है तो बैंक में क्यों नहीं जमा करते


इन दिनों गांव बाढ़ से परेशान हैं और शहर जल जमाव से, महज कुछ महीने पहले तक शहर औऱ गांव के लोग पानी की एक बूंद के लिए तरस रहे थे.
इन दिनों उत्तराखंड से असम तक नेपाल की तराई वाला लगभग पूरा उत्तर भारतीय इलाका बाढ़ के पानी में ऊब-डूब कर रहा है. हिमालय में हुई तेज बारिश की वजह से वहां से निकलने वाली तमाम नदियों में भरपूर पानी है. इस सैलाब ने जगह-जगह नदियों के किनारे बनी मिट्टी की उन दीवारों को तोड़ दिया है जिन्हें राज्यों के जल संसाधन विभाग के अभियंता तटबंध के नाम से पुकारते हैं. और टूटे दरारों से निकले पानी के तेज बहाव से सामने के गांव भंस रहे हैं. तकरीबन वैसी ही हालत उत्तर भारतीय शहरों की है. पटना समेत कई शहरों में नाव चलने की नौबत आ गयी है, निचले इलाकों में पानी बेडरूम तक पहुंच गया है और शहर के बाशिंदे फुलपैंट का पांयचा चढ़ाकर सड़कों पर जिम्नास्टिक का खेल दिखा रहे हैं. इस सामूहिक अव्यवस्था को हमारे टीवी चैनलों ने जल प्रलय का नाम दिया है. यह दीगर बात है कि इस प्रलय में हर पुरुष मनु और हर स्त्री श्रद्धा है.
तसवीरों और विजुअल्स को देखकर हमारा द्रवित होना स्वभाविक है. मगर जब बाढ़ को प्रलय के नाम से पुकारा जाता है तो मन एकबारगी मानने को तैयार नहीं होता. बारिश के मौसम में नदियों में बढ़ आया पानी क्योंकर हमारे लिए दैत्य सरीखा हो गया है, जबकि महज चार माह पहले इन्हीं नदियों में पानी के लिए हम तरसते रहते हैं. महज चार माह बाद जब रबी का मौसम शुरू होगा तो यही किसान पानी के लिए मारे-मारे फिरेंगे जो आज खेतों में लबालब पानी देखकर टसुए बहा रहे हैं. वही शहरी जो पायचें चढ़ाकर सरकार को कोस रहा है, अप्रैल-मई में ट्यूबवेल सूख जाने पर झख मारेगा है और बगैर नहाये दफ्तर जाने के लिए विवश हो जायेगा. वह पानी जो चंद माह पहले आपके लिए अमृत होता है, क्योंकि कम होता है. वह चंद माह बाद जहर क्यों हो जाता है, जब वह अधिक होता है. यह ठीक है कि आप महीने के आखिरी दिनों में पैसों की कमी का रोना रोते हैं, मगर ऐसा तो कभी नहीं सुना कि महीने के शुरुआत में कोई पैसे अधिक होने का रोना रोये. ऐसा क्यों है कि इस दुनिया में पैसों का बैंक है, खून का बैंक है, अनाज का बैंक है, बिजली बैंक करने के तरीके हैं, सूरज की रोशनी की भी बैंकिंग कर सकते हैं, मगर बारिश के दिनों में आये इस सैलाब की बैंकिग नहीं कर सकते.
आखिर यह सैलाब आपके लिए लाता क्या है, पानी और गाद. आपको यह जानकर हैरत होगी कि कोसी तटबंध के बीच बसे लाखों किसान जो इस बार बाढ़ की वजह से तटबंधों पर आ बसे हैं, पिछले तीन साल से बाढ़ नहीं आने की वजह से उदास थे. बाढ़ उनके लिए परेशानी जरूर लाता है, मगर उसके साथ रिटर्न गिफ्ट भी होते हैं. जब पानी उतरता है तो खेतों में उपजाऊ मिट्टी की परत छोड़ जाता है. उस जमीन पर खेती करने के लिए भी खाद की जरूरत नहीं होती. बीज छीट देने पर भी सोना उगता है. किसान दो सीजन का लाभ एक सीजन में कमा लेते हैं. इसलिए जिस साल पानी नहीं आता तटबंधों के अंगर बसे किसान उदास हो जाते है, कहते हैं इसबार खेती गड़बड़ा जायेगी. यह कोई नयी और अजूबा बात नहीं है. इस देश में जब नदियां मिट्टी की दीवारों में कैद नहीं हुआ करती थीं तो नदी किनारे बसे किसान इसी तरह बाढ़ का इंतजार करते थे. तब एक हफ्ते की बाढ़ आती थी, घरों में भी चार दिन पानी घुसता था. लोग यह समय किसी तरह काट लेते थे, इस उम्मीद में कि खेती बंपर होगी. हालांकि बाढ़ के बाद महामारी का मौसम आता था जो खतरनाक होता था, मगर नये जमाने में डीडीटी ने महामारियों की संभावना पर भी विराम लगा दिया है.
यह सच है कि हाल के वर्षों में बाढ़ विभीषिका का रूप लेने लगी है. अब पानी पहले की तरह किनारों पर पसरता नहीं बल्कि तटबंध तोड़कर वाटर कैनन की तरह तबाही मचाता है. जब तटबंध नहीं थे तो सैलाब का पानी नदियों के किनारों पर धीरे-धीरे पसरता था और आसपास के गांवों में घुसते हुए फैलता था. कभी एक झटके में पानी का फ्लो नहीं आता था. मगर तटबंधों ने सैलाब को वाटर बम बना दिया है. बाढ़ आता है तो पानी तटबंधों के बीच उबलता रहता है औऱ किसी कमजोर बिंदू पर नदी तटबंध को तोड़कर बाहर निकल आती है. नतीजा यह होता है कि तेज बहाव सामने आने वाली हर चीज को तहस-नहस कर जाता है. इस तरह से देखा जाये तो तटबंध जो बाढ़ नियंत्रण के नाम पर बनते हैं, वे बाढ़ की विभीषिका को और बढ़ा देते हैं. हालांकि इनके जरिये बाढ़ का नियंत्रण कितना हो पाता है, यह भी सवालों के घेरे में है.
कोसी औऱ बागमती नदी पर शोधपरक काम करने वाले दिनेश मिश्र मानते हैं कि तटबंधों ने बाढ़ की संभावनाओं को घटाने के बदले बढ़ाया है. वे कोसी तटबंधों का आंकड़ा देते हुए कहते हैं कि तटबंध बनने के बाद बाढ़ पीड़ित इलाकों की संख्या में बढोतरी हुई है. अब यह लगभग मान लिया गया है कि तटबंध प्रणाली बाढ़ से सुरक्षा कर पाने में सक्षम नहीं है. मगर हर राज्य का जलसंसाधन विभाग इन तटबंधों को बचाकर रखना चाहता है, ताकि इन्हें मानसून के मौसम में सुरक्षा देने के नाम पर अरबों का वारा-न्यारा आसानी से होता रहता है. फिर जब तटबंध टूटता है और सैलाब आता है तो रिले बैटल आपदा प्रबंधन विभाग के पास चली जाती है, वह नये सिरे से अरबों का वारा-न्यारा करता है. इस तरह उत्तर भारत के इन इलाकों में बाढ़ एक उद्योग का रूप ले चुकी है. यह राजनेताओं, मंत्रियों, अफसरों, समाज सेवियों और अभियंताओं सब को सूट करती है.
जब भी तटबंध को लेकर सवाल खड़े किये जाते हैं तो इसे अव्यावहारिक करार दिया जाता है. मगर लोग यह भूल जाते हैं कि इन तटबंधों के बीच भी करोड़ों की आबादी गुजर-बसर कर रही है. तटबंध नहीं टूटे तब भी उन्हें हर साल सैलाब झेलना पड़ता है, हां जब तटबंध टूट जाते हैं तो उनको राहत मिल जाती है. प्रेसर तटबंध के बाहर निकल जाता है. तटबंधों और बराजों ने एक और समस्या खड़ी की है. कब्जियत की. इनकी वजह से नदी कब्ज का शिकार हो रही हैं. गाद बाहर नहीं निकल पाता और नदी का पेट फूलता रहता है. यह ठीक उसी तरह है जैसे मनुष्य की शिराओं में वसा की परतें जम जाती हैं और वह ब्लड प्रेसर का शिकार हो जाता है. उसी तरह नदियां भी अलग तरह के प्रेसर का शिकार हैं. तटबंधों में फंसी और गाद से भरी. लिहाजा थोड़ा पानी भी बढ़ता है तो सैलाब का रूप ले लेता है और फिर वह प्रेसर कुछ न कुछ तोड़ फोड़ तो करता ही है. अगर नदियों पर बराज न बने, तटबंध न हों तो यह गाद खुद-ब-खुद खेतों में फैल जाये और नदियां फिर से गहरी हो जायें. फिर न कभी जल सैलाब आयेगा, न तबाही होगी. मगर...
वही कहानी शहरों की है. बारिश के पानी के निकासी के लिए हमने नालियां बनायी हैं, जिन्हें फिर से उन्हीं नदियों में गिरना है जो पहले ही लबालब हैं. हम इतने सुव्यवस्थित नहीं हुए हैं कि हमारी नालियां मानसून से पहले प्रवाहमयी हो जायें. हमारे शहरों में नालियां शायद ही बहती हैं. मैंने आजतक किसी शहरी नालियों को बहते हुए नहीं देखा है. ये आम तौर पर कचरों से भरी होती हैं. छठे-छमाही जब इन्हें साफ किया जाता है तो भी इनमें प्रवाह नहीं दिखता. मेरे मन में दो सवाल आते हैं. पहला नालियों में कचरा कहां से आता है, दूसरा नालियां बहती क्यों नहीं है. हालांकि जब भी शहर में पानी का जमाव हो जाता है तो हम सब लोग नालियों की सफाई का मसला उठाकर नगर निकाय व्यवस्था पर हमलावर हो जाते हैं. जब नालियों का निर्माण जल निकासी के लिए हुआ तो उसमें कचरा कहां से आता है. इसकी वजह है कि हमारे शहरों में कचरा निस्तारण की बेहतर व्यवस्था नहीं है. सवाल यह भी है कि आखिर नालियां नदियों में ही क्यों गिरती है. ड्रेनेज को कितना भी साफ क्यों न कर लिया जाये इसे नदियों में क्यों गिराया जाये. इन तमाम सवालों के जरिये मैं मानता हूं कि हमारे शहर में नालियों की प्रणाली ठीक नहीं है. जो नालियां बहती नहीं है, हमेशा जाम रहती हैं और जिनका काम शहर की गंदगी को नदियों तक ले जाना है उसकी हमें क्या जरूरत है.
मुझे लगता है शहरों में ड्रेनेज के निष्पादन के लिए कोई दूसरी व्यवस्था होनी चाहिये. जिन शहरों के किनारे नदियां नहीं होती वे क्या करते हैं. मैंने कई शहरों में देखा है तालाब बनाकर गंदे पानी को जमा करते हैं फिर उसे खूबसूरत रूप देकर टूरिस्ट प्वाइंट की शक्ल दे देते हैं. हैदराबाद का टैंक बंड और भोपाल का शाहपुरा लेक इसी तरह बना है. अगर हर बड़े मुहल्ले में इस तरह के छोटे-छोटे तालाब हों तो नालियां आसानी से पानी वहां तक पहुंचा पायेंगी. मगर इसके लिए हर मुहल्ले में तालाब होने चाहिये. शहरों में बिल्डरों की गिद्ध दृष्टि हर खाली जमीन पर होती है. जो तालाब थे वे भर डाले गये और उन पर अपार्टमेंट खड़े हो गये, फिर शहरों में तालाब कहां से मिले. मगर अगर शहरों को सर्वाइव करना है तो उन्हें अपार्टमेंट से अधिक तालाबों की जरूरत होगी. वाटर सप्लाई के लिए भी और ड्रेनेज के लिए भी. वरना हमारे शहर महज कुछ सालों में रहने लायक नहीं रहेंगे. गरमियों में पानी बिकेगा और बरसात में नावें चलेंगी. पटना में भवनों का नक्शा पास करने के लिए वाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान अनिवार्य कर दिया गया है. यह अच्छा कदम है. इस तरह के कदम हर शहर में उठाने की जरूरत है.

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