Sunday, October 19, 2014

साइकिल की सवारी


हिंदी की पाठ्यपुस्तकों के लेखकों में सुदर्शन की कहानियां बड़ी रोचक हुआ करती थीं. अखबार में नाम और साइकिल की सवारी जैसी कहानियां मैं आज तक नहीं भूल पाता. इस आत्मस्मरण का शीर्षक मैंने उनकी कहानी से ही उधार लिया है. दरअसल मैं पिछले दस दिनों से साइकिल की सवारी कर रहा हूं. साइकिल से ही रोज दफ्तर आना-जाना कर रहा हूं. उन दस दिनों के अनुभवों से आपको सरा(सर)-बोर करने की नीयत से यह सब लिख रहा हूं.
जी हां, यह सोशल मीडिया के उसी फैशन के अनुरूप है, जिसमें आदमी करता कम है और भजता ज्यादा है. मैंने दस दिन साइकिल चला लिये तो सोचा कि लिखकर आपको इम्प्रैस करूं कि देखिये मैं किस तरह ईको-फ्रैंडली होने की ओर कदम बढ़ा चुका हूं. यह सोचे बगैर कि पटना शहर में दसियों हजार लोग रोज साइकिल से आना-जाना करते हैं. उनमें से कई तो हाजीपुर और दानापुर से आने वाले लोग हैं. मैंने अगर दस दिन साइकिल से राजा बाजार से बोरिंग रोड आना जाना कर लिया तो क्या तीर मार लिया. मगर जनाब, मेरे पास फुरसत है, नेट कनेक्शन है, यूनिकोड इनेबल्ड पीसी है, लिखने का चस्का है, फेसबुक अकाउंट है जिस पर मुझे पढ़ने वाले दो हजार दोस्त हैं, मुझे रोज फेसबुक पर कूड़ा डालने की आदत है, फेसबुक ही रोज मुझसे पूछता है कि व्हाट इज इन योर माइंड तो क्या करूं. कुछ तो माल चाहिये रोज के लिए. मेरा वॉल रोज मुझसे खुराक मांगता है. आज के लिए यही खुराक सही.
जब रांची से पटना आया था (यानी फरवरी, 2014) में तभी तय किया था कि साइकिल से ही आया जाया करूंगा. मगर शिफ्ट और एडजस्ट होते-होते गरमी का मौसम आ गया. भरी दुपहरी में घर से दफ्तर की पांच किमी की दूरी साइकिल से तय कर पाऊंगा यह भरोसा नहीं होता था. लिहाजा तय किया कि जरा सूरज महराज के तेवर ठंडे हो जायें फिर इस प्रयोग को करके देखा जायेगा. और अक्तूबर महीना मुझे इसके लिए सबसे मुफीद महसूस हुआ.
मेरे लिए हर तरह से मुफीद थी साइकिल
दरअसल, निम्न मध्यवर्ग के लोगों की आदत होती है कि वे हर काम करने के पहले उस पर ढेर सारा विमर्श करते हैं. हर एंगल से सोचते हैं कि उक्त कार्य उसके लिए कहीं से हानिकारक तो साबित नहीं हो जायेगा. इस लिहाज से साइकिल की सवारी मेरे लिए हर तरह से लाभप्रद लग रही है. पिछले दिनों डॉक्टर ने कोलेस्ट्रॉल घटाने का फरमान जारी किया था उसके लिए यह रामबाण है. आजकल दफ्तर आने-जाने में रोज औसतन 30 रुपये की बचत हो जा रही है, यह बोनस है. अक्सर लौटते वक्त जब रात को 11 से अधिक बज जाते थे तो घर आने के लिए सवारी नहीं मिलती थी, इस फैसले से उस समस्या का भी समाधान हो गया है. इसके अलावा ईको-फ्रैंडली होने का टैग अलग से है. यह अलग बात है कि दफ्तर के गार्ड और मेरी बिल्डिंग के कुछ अपरिचित लोग मुझे साइकिल पर चढ़ता देख मेरे इकॉनॉमिक स्टेटस के बारे में कुछ अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं और हो सकता है वे मुझे फक्कड़ या कंजूस समझते होंगे. वे न मेरे फेसबुक फ्रेंडलिस्ट में हैं और न ही ईको-फ्रैंडली या हेल्थ कॉंसश होने की बात को समझ पाते होंगे. उन्हें अवाइड करने की कोशिश करता हूं.
दीगर बात यह भी है कि मुझे बाइक चलाना नहीं आता. इस उम्र में बाइक चलाना सीखना मुझे शर्मनाक लगता है, इसलिए भी साइकिल मेरे लिए परफैक्ट ऑप्शन है. मुझे बाइक चलाना क्यों नहीं आता या मैंने बाइक चलाना क्यों नहीं सीखा, इसकी कथा भी दिलचस्प है. दिलचस्प होने का दावा इसलिए कर रहा हूं कि जबानी तौर पर कई मित्रों को यह कथा मैंने सुनाई है और उन लोगों ने इस कथा में भरपूर दिलचस्पी ली है. बाइक चलाना सीखने की उम्र अमूमन किशोरावस्था की होती है, जब बच्चा साइकिल की पैडल मार-मार कर बोर हो चुका होता है. मैं भी तब नौवीं में पढ़ता था, जब महसूस किया कि अब बहुत हो चुका. अब मुझे बाइक चलाना सीख ही लेना चाहिये. उन दिनों राजदूत की गाड़ियां शान की सवारी मानी जाती थीं. संजय दत्त फेम येजडी या पता नहीं शायद एचडी बाइक आउट ऑफ फैशन हो चुकी थी. बुलेट कुछ ही लोग चलाते थे. चचेरे भाई साहब के पास राजदूत थी. वे सहरसा में रहते थे और अक्सर हमसे मिलने हमारे गांव आते थे. मैं भी नवोदय के हॉस्टल में रहा करता था. एक बार छुट्टियों में घर गया तो भाई साहब भी राजदूत से पधारे हुए थे. वे घर में लोगों से बतिया रहे थे और राजदूत बाहर खड़ी मुझे ललचा रही थी.
बाइक सीखने के सिलसिले
इस बीच मैंने जान लिया था कि राजदूत की गाड़ियां बांस की करची से भी स्टार्ट हो जाया करती है. करना सिर्फ इतना है कि करची डालकर किक मारना है. स्टार्ट होने पर क्लच लेकर गाड़ी को गियर में डालना है, फिर क्लच धीरे-धीरे छोड़ना है और एक्सीलेरेटर घुमाते रहना है. तो उस रोज मैंने उस थ्योरी का प्रैक्टिकल कर ही डाला. कुछ ही देर में मैं गाड़ी के साथ सड़क पर था और गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी. यह अनुभव मेरे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं था कि मैंने मोटर साइकिल चला रहा हूं. मैं आगे बढ़ता जा रहा है, मुझे लगा कि मैं हवा में तैर रहा हूं, बाल अजय देवगन की तरह लहरा रहे हैं. मगर थोड़ी ही देर में मुझे अपनी गलती का आभास हुआ, कि मुझे गाड़ी बंद करना नहीं आता. इसे रोकूं कैसे और बंद करके उतरूं कैसे. अब यह गाड़ी मेरे लिए आफत का सबब साबित होने लगी. गांव की अलग-अलग सड़कों पर मैं लगातार गाड़ी चलाता रहा, पास से गुजरने वाले हर परिचित से पूछता रहा कि कोई बताये इसे बंद करके कैसे उतरा जाये. अव्वल तो कोई मेरी बात समझ नहीं रहा था, समझता भी था तो जब तक वह बताता मैं आगे निकल चुका होता. तकरीबन 25 किमी गाड़ी चला चुकने के बाद मैं थक हार कर अपने दरवाजे पर इस इरादे से लौटा कि चाबी खीचकर वहां रखे पुआल पर ही गाड़ी को गिरा दूंगा. तभी कट से आवाज हुई और गाड़ी बंद हो गयी और मैंने पांव रखकर गाड़ी को गिरने से रोक लिया. भाई साहब दरवाजे पर मेरा और गाड़ी का इंतजार कर रहे थे. उन्हें कहीं से खबर मिल गयी थी. मैंने चुपचाप उन्हें गाड़ी थमा दी और तेजी से पड़ोस वाले आंगन में चला गया कि जब उनका गुस्सा शांत होगा फिर उनके सामने जाऊंगा.
भाई साहब मुझे पसंद करते थे, इसलिए उन्होंने मुझे कुछ कहा नहीं. बस मेरी दूसरी बड़ी गलती का अहसास दिलाया कि मुझे गियर चेंज करना नहीं आता था, जिस वजह गाड़ी 25 किमी तक पहले ही गियर में चलती रही. यह शुक्र था कि चेन ने देर तक मेरा साथ निभाया और वह दरवाजे पर पहुंचकर टूटा. वरना सुनसान में कहीं यह घटना होती तो मैं गिर सकता था और मुझे गाड़ी को धक्के देकर घर लाना पड़ता. बहरहाल मिस्त्री बुलाया गया, भाई साहब की जेब लगभग खाली हो गयी. घर में मम्मी-पापा को पता चल गया. और कुल मिलाकर मेरे जैसे सुटेबुल ब्वाय के लिए बड़ी शर्मनाक स्थिति पैदा हो गयी. पता नहीं उस वक्त मां ने समझाया था कि मैंने खुद तय कर लिया कि अब गाड़ी तभी सीखूंगा जब अपने पास अपनी गाड़ी हो. दूसरे की गाड़ी के साथ इस तरह का खतरनाक खेल ठीक नहीं. उस प्रण ने फिर मुझे किसी परिचित को बाइक को हाथ लगाने से हमेशा के लिए रोक दिया और मैं लंबे समय तक बाइक सीखने के प्रयोग को फिर दुहरा नहीं पाया. सीखने के लिए कई दोस्तों ने अपनी बाइक ऑफर की, मगर मैं हर बार उनके प्रस्ताव को ठुकराता रहा.
दूसरी नाकाम कोशिश
तकरीबन दस साल बाद जब मैं सागर में एक बड़ी फंडिंग एजेंसी के प्रोजेक्ट ऑफिस का इंचार्ज बनाया गया तो फील्ड विजिट के लिए मेरे नाम से दो बाइक खरीदी गयी. एक राजदूत और एक यामाहा क्रक्स. हालांकि तब तक मैं 25 साल का हो चुका था, मगर बाइक सीखने के लिए यह उम्र कोई अजीब नहीं थी. मैंने सागर विवि की खुली और खाली सड़कों पर बाइक चलाने का अभ्यास शुरू कर दिया. अब मैंने यह भी सीख लिया था कि गियर कैसे बदलना है और गाड़ी कैसे रोकना है. कुछ दिनों से अभ्यास के बाद मैंने गाड़ी चलाना सीख लिया. अब तक फील्ड विजिट में मैं अपने साथियों के पीछ बैठकर जाया करता था. एक महिला साथी गायत्री जी भी हमारे साथ थीं, वे बाइक चलाने में एक्सपर्ट थीं, मैंने उनकी बाइक के पीछे बैठकर भी यात्रा की है.
जब मैंने बाइक चलाना सीख लिया तो मैंने एक दिन तय किया कि आज खुद गाड़ी चलाकर फील्ड जाऊंगा. ऑफिस से निकलकर मैं आराम से आगे बढ़ा, तीन चार किमी के बाद बस स्टैंड पड़ता था, उसे पार करने के बाद हाइवे शुरू हो जाता था. बस स्टैंड के सामने से गुजर रहा था कि ग्रामीण महिलाओं का एक झुंड सड़क पार कर रहा था, मैं उन्हें सड़क पार करता देख रहा था. मैं दूर था, इस बीच उन्होंने बड़े आराम से सड़क पार कर लिया. अब सड़क खाली थी, मैं आराम से सड़क क्रॉस कर रहा था. तभी एक अनहोनी घट गयी. ग्रामीण महिलाओं के साथ एक बच्चा था जो दूसरी तरफ ही रह गया था. वह रोने लगा, सड़क पार कर चुकी महिलाओं ने उसे देखा तो कहा, आजा बेटा... आजा और वह दौड़ पड़ा. मैंने बाइक रोकने की कोशिश में ब्रेक लिया और हैंडल घुमा लिया. बच्चा बच गया, मगर मैं सड़क किनारे बालू पर गिर गया. फिर उठा, कपड़े झाड़े, बांह में खरोच थी, वहां से मिट्टी साफ की और चल पड़ा. करीब दस किमी गाड़ी चलाने के बाद महसूस हुआ कि बायें हाथ में काफी दर्द है और वह लगातार फूल रहा है. दर्द अहसनीय हो चुका था, यानी कोई फ्रैक्चर हो गया था. संयोग से थोड़ी देर में जैनियों का एक बड़ा अस्पताल दिखा, मैं उसमें घुस गया. थोड़ी ही देर में पता चल गया कि मेरा हाथ टूट गया है और मैं चार हफ्तों के लिए प्लास्टरशुदा होने वाला हूं. इस तरह से दूसरा प्रयास सफल होते हुए भी असफल साबित हो गया. इस बीच नौकरी बदल गयी और अखबारों के डेस्क पर आंखें अंधी करने का शौक पाल लिया.
डेस्क की नौकरी और सवारियां
अखबारों में डेस्क की नौकरी का अपना अंदाज है. जब पूरी दुनिया नौकरी बजाकर घर लौटने की तैयारी कर रही होती है, डेस्क के सिपाही नहा-सुनाकर ऑफिस जाने की तैयारी करते हैं. जब वे रात को अपनी ड्यूटी पूरी करके घर लौटते हैं तो इलाके की अस्सी-नब्बे फीसदी आबादी नींद की आगोश में पहुंच चुकी होती है. सड़क पर पागल, कुत्ते, इक्का-दुक्का गाड़ियां ही नजर आती हैं. ऐसे में डेस्क वाले कोशिश करते हैं कि उनका घर दफ्तर के करीब ही हो ताकि दफ्तर से निकलने के पांच मिनट के अंदर घर पहुंच जायें और फालतू की परेशानियों से बच सकें. लिहाजा मैंने भी अलग-अलग शहरों में डेस्क पर नौकरी बजाते हुए दफ्तर से वाकिंग डिस्टेंस पर हो. यह सिलसिला रांची तक जारी रहा. लिहाजा बाइक खरीदने का मसला कभी इतना महत्वपूर्ण नहीं हुआ कि उस पर गंभीरता से विचार किया जाये, न कभी इतनी सैलरी मिली कि इस गैरजरूरी उपादन पर पैसे खर्च किये जायें. लिहाजा बाइक खरीदना और उसे फिर से चलाना सीखना लगातार टलता रहा. शादी के बाद कई बार यह सोचा कि स्कूटी ले लें जिसे उपमा और मैं दोनों चलाना सीख लें और घर के कुछ काम इस बहाने निबटाये जा सकें. मगर जाहिर है कि जब बजट बनता तो यह खर्च गैरजरूरी लगने लगता और हमने रिक्शा, शेयरिंग ऑटो और दूसरी सवारियों के भरोसा जीना सीख लिया.
ऐसे खरीदी साइकिल
पहले मैंने सोचा था कि नयी साइकिल खरीदूंगा, मगर आखिरी वक्त मैं मैंने फैसला बदल लिया. अपनी बढ़ती उम्र को फूलकर फैल चुके शरीर पर भरोसा नहीं था कि रोज पांच किमी का सफर साइकिल से पूरा कर पाऊंगा या नहीं. अगर यह कार्यक्रम फ्लॉप साबित हुआ तो बेवजह चार हजार का झटका लग जायेगा. लिहाजा तय किया कि ओएलक्स की मदद से सेकेंड हेंड साइकिल खरीदूंगा. ओएलएक्स पर पटना वाले कई साइकिल बेचने के लिए तैयार थे, एक मेरे मोहल्ले के करीब भी था. हजार रुपये में पुरानी साइकिल थी. फोन किया तो किसी महिला ने उठाया. मैं उस जगह को जितना करीब और ओएलएक्स के सौदे को जितना आसान समझ रहा था, वह उतना आसान था नहीं. रिक्शे से वहां पहुंचने में 40 रुपये खर्च हो गये, और साइकिल पंचर पड़ी थी, उसकी रिम जंग खायी हुई थी. कई महीनों से साइकिल चली नहीं थी औऱ उसे चालू हालत में लाने में कितना खर्च होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था. अब दो ही रास्ते थे, एक या तो यहां से फिर 40 रुपये खर्च करके घर लौट जाऊं या फिर इस साइकिल को खरीदकर इसे मिस्त्री से सुधरवाकर उसे चलाकर घर लौटूं. मैंने हिसाब लगाया हजार रुपये इसे देने होंगे, अगर 500 रुपये में साइकिल ठीक हो जाये तो भी सौदा बुरा नहीं है. मगर अगर साइकिल में हजार रुपये और लग गये तो यह घाटे का सौदा होगा. मैंने मोहतरमा से कहा कि मुझे एक बार साइकिल को मिस्त्री को दिखानें दें अगर पांच सौ में ठीक हो गया तो मैं इसे खरीद लूंगा. मगर मोहतरमा को शायद लगा होगा कि मैं साइकिल लेकर चंपत हो जाउंगा. फिर मैंने दूसरा ऑफर प्लेस किया कि मैं उन्हें हजार रुपये दे देता हूं, फिर साइकिल ले जाता हूं. अगर मिस्त्री के पास मेरी बात जम गयी तो ठीक वरना साइकिल वापस कर जाऊंगा और अपने पैसे ले जाऊंगा. मगर इस पर भी मोहतरमा राजी नहीं हुई, इस बार वे शायद कुछ अधिक ही सोच रही थीं कि मैं साइकिल के पार्ट्स बदल डालूंगा. यह एक्सट्रीम था. मैडम ने मुझसे पानी तक के लिए नहीं पूछा, उन्हें लगा होगा कि मैं उनका घर लूट लूंगा. साफ-साफ कहा, साइकिल लेना हो तो हजार रुपये दें या बाद में आयें. फिर मैंने तीसरा ऑफर किया, कहा एक बार पड़ोस की साइकिल दुकान से पूछकर आता हूं कि इस साइकिल को चालू होने में कितना खर्च होगा. मैं दुबारा रिक्शे को तलाशना और उसे 40 रुपये देना नहीं चाहता था. साइकिल की दुकान पर मेरी समस्या का अलग तरीके से समाधान हो गया. उन मोहतरमा की साइकिल के बारे में तो कुछ पता नहीं चल पाया, मगर साइकिल वाले के पास एक सेकेंड हेंड साइकिल बेचने के लिए टू-टंच करके रखी हुई थी, 1500 रुपये में. उसने मुझे टेस्ट ड्राइव का भी ऑफर दिया, जिसे मैंने स्वीकार कर लिया. टेस्ट ड्राइव के बाद मुझे सौदा ठीक ही लगा. फिर उसमें ताला और सीट लगवाकर 1600 रुपये में घर ले आया.
साइकिल के साथ दस दिन
पहले दिन साइकिल लेकर दफ्तर पहुंचा तो काफी थकावट महसूस हुई, फिर मैंने सोचा कि शायद बहुत दिनों बाद चला रहा हूं और दूरी अधिक है इस वजह से ऐसा महसूस हो रहा है. मगर दूसरे दिन समझ आया कि सीट अंदर से टूटी हुई है और सीट की हाइट कम है. इस वजह से ऐसा हो रहा है. फिर डेढ़ सौ रुपये लगाकर सीट बदलवाई. अगले दिन ब्रेक टूट गया तो उसे बदलवाया. खैर दो-तीन के खुदरा खर्च में साइकिल कुछ ऐसी हो गयी कि मैं आराम से चलाकर जाता हूं और रात में खुली हवा का मजा लेते हुए, बड़े गुलाम अली और पंडित छन्नूलाल की ठुमरी सुनते हुए, रास्ते में सस्ती सब्जी खरीदते हुए घर लौटता हूं. कुछ गड़बड़ियां और हैं, मैं यह समझ रहा हूं कि फर्स्ट हैंड साइकिल लेना चाहिये था. मगर अब इसे ले लिया है तो छह महीने चलाकर इसकी कीमत वसूल लेना चाहता हूं.
बहरहाल दस दिनों तक साइकिल से आने-जाने के बाद समझ आया कि कैसे हाल के दिनों में साइकिल भारतीय सड़कों पर महादलित सवारी बनकर रह गयी है. पटना का बेली रोड आम तौर पर ज्यादा भीड़-भाड़ भरा नहीं रहता, फिर भी साइकिल सवारों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. साइकिल की अमूमन कोई लेन नहीं होती और जहां होती भी है तो उस पर कई तरह के कब्जे होते हैं. कई जगह फुटपाथिया दुकानदार इस स्पेस को घेर लेते हैं. कई जगह लोग बालू और गिट्टी गिराकर रखते हैं. स्टैंड के आसपास उस स्पेस पर ऑटोवाले कब्जा जमाये रहते हैं. कई दफा उल्टी साइड से बाइक वाले, रिक्शा वाले और गाड़ी वाले बड़े आराम से चले आते होते हैं. उनके मन में ऐसा करने पर कोई अफसोस नहीं होता. साइकिल सवार को हर बार या तो ब्रेक लेकर खड़ा होना पड़ता है या लेन बदलकर बसों और कारों वाली खतरनाक लेन में घुसना पड़ता है. हर बार पेट्रोल डीजल फूंकने वाली गाड़ियों पर सवार लोग साइकिल वालों को हिकारत की निगाह से देखते हैं. कुछ इस तरह कि अलकतरे पर क्यों चल रहे हो, शर्म नहीं आती. अलकतरे वाली सड़क से नीचे उतरो मलेच्छ.
इसके बावजूद पटना में सड़कों पर साइकिल वाले खूब मिलते हैं. इस वजह से मुझे अपने रास्ते में कई साइकिल मिस्त्री भी नजर आ जाते है, यह इस बात की गारंटी है कि अगर कहीं आपका साइकिल पंचर हो गया तो उसे ज्यादा देर तक घसीटना नहीं पड़ेगा. खुशकिस्मती है कि अब तक पंचर नहीं हुआ, एक बार हवा कम होने पर हवा भरवाया है. अगर आप पंप से खुद हवा भरते हैं तो आज भी पंचर वाले उसका पैसा नहीं मांगते. 16 साल पहले जब मैं पटना में था तो साइकिल से घूमा करता था. तब भी यही रीत थी. हालांकि तब कोई राजा बाजार नहीं जाता था. पटना महेंद्रू घाट से शुरू होकर चिड़ियाखाने तक पहुंचते-पहुंचते खत्म हो जाया करता था. दूसरी तरफ बोरिंग रोड के पानी टंकी के पास. हमारे दोस्त पानी टंकी, कंकड़बाग, महेंद्रू और बहादुरपुर गुमटी के बीच रहा करते थे और हम साइकिल से एक दूसरे के ठिकाने पर आराम से आया जाया करते थे. तब इतनी भीड़ नहीं होती थी औऱ हम बीच सड़क पर आऱाम से साइकिल चलाते थे.
मगर अब पटना बदल गया है. हर गली में गड्ढे भी हैं और ढेर सारी गाड़ियां भी. रोज रात जब सवा ग्यारह बजे घर लौटता हूं तो अपनी ही गली में कोई न कोई एसयूवी मिल जाती है. रात में कुत्ते को भरोसा दिलाना पड़ता है कि भाई लोकल हूं, आउटसाइडर मत समझना. उम्मीद है कुछ दिनों में पहचान जायेगा. प्लान है, कम से कम मार्च, 2015 तक यह सफर जारी रहेगा. जब तक धूप चमड़ी झुलसाने न लगे. वैसे अगर धूप झेलना मुमकिन होगा तो इस सफर को जारी रखा जायेगा. तो इस सफर के लिए मुझे शुभकामनाएं दें. अगर आपने अंत तक इस बकवास को झेल लिया तो मैं आपको धन्यवाद कहता हूं.

2 comments:

Surender verma, don't hurt me said...

वाह क्या बात है। management कोई आप से सीखे।

अनूप शुक्ल said...

rochak kissaa. :)