Friday, October 31, 2014

इन्हीं से तो है दावत-ए-सियासत का लुत्फ


कल से ही सोशल मीडिया पर शाही इमाम बुखारी साहब को कोसने का ट्रेंड चल रहा है. हर कोई कोस रहा है. चाहे सिकुलर हो या भगत. कोसने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा है. स्टाइल अलग-अलग हैं, मगर हर कोई राष्ट्रवादी हुआ जा रहा है. समझाइशें दे रहा है, सवाल उठा रहा है. मुझे हमेशा से लगता है कि अपने शाही इमाम साहब, भारतीय राजनीति के शाही पनीर हैं. उनके फतवों के बिना राजनीतिक बहसों की दुनिया कितनी बेस्वाद हो जायेगी यह कभी आपने सोचा है. मैं तो ऊपरवाले से दुआ मांगता हूं कि उनके लख्ते-जिगर को ऐसा ही जिगरा दे और भारतीय राजनीति में वे लंबी पारी खेलें.
अपने देश की राजनीति में जो रंग और लुत्फ है वह ऐसी ही हस्तियों की बदौलत है. इमाम साहब हैं, बाबा रामदेव हैं, शंकराचार्य हैं. ये जो गैर सियासी लोग हैं उनका हमारी सियासत पर इतना दबदबा है कि सियासतदां भी फेल लगने लगते हैं. वैसे सियासी पार्टियों में भी ऐसे तजुर्बेकारों की कोई कमी नहीं है. ऐसे ही लोगों से तो अपने देश की राजनीति में रौनक है, वरना चीन टाइप राजनीति में रखा क्या है. न सवाल, न जवाब, न बयान, न स्कैंडल... हमारे देश में देखिये, राजनीति कितनी रंगीन है. कभी अरुण जेटली काला धन पर फिसल जाते हैं, तो कभी गडकरी 'दो काम हमारे' वाला डॉयलॉग ठोक जाते हैं, कभी दिग्विजय पुराण छाया रहता है, तो कभी कपिल सिब्बल जीरो लॉस थ्योरी लेकर हाजिर हो जाते हैं. अगर किसी रोज ऐसी चीजों का अकाल पड़ जाता है तो मन बड़ा उदास-उदास रहता है. तब लाल वाले भगवा वालों के इतिहास से कोई उद्धरण छांटते हैं और भगवा वालों को लाल वालों की हिस्ट्री की तलाशी लेनी पड़ती है. मगर हमारी खुशकिस्मती यह है कि इस विविधता भरे देश में शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता है जब राजनीति कोई रंगीन गुल न खिलाये.
2011 के अन्ना आंदोलन से लेकर आज तक कम से कम मेरी निगाह में कोई दिन ऐसा शायद ही गुजरा है. जब तक मनमोहन सिंह तख्तनसीन थे, उन्होंने हमें कभी ऐसी कमी महसूस होने नहीं दी, मौन रहकर हंगामा खड़ा करवा देने का जो हुनर उनके पास था, उसका आने वाले वक्त में कोई तोड़ शायद ही मिले. अब अपने प्रधान सेवक जी हैं, जनाब रोज एक अभियान चलाते हैं. अभियान शुरू करते हैं, हलचल मचाते हैं और उस अभियान को जनता के लिए छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं. दूसरा अभियान चलाने लगते हैं. कभी स्वच्छ भारत तो कभी मेक इंडिया, कभी आदर्श ग्राम तो कभी रन इंडिया. इसके अलावा पीपीपी, बीबीबी औऱ डीडीडी टाइप के इतने फार्मूले उन्हें बाजार में उतार दिये हैं कि यूपीएससी की तैयारी करने वाले उन्हें रट-रट कर परेशान हैं. इन लोगों के सामने एक परेशानी और है, रोमिला थापर की हिस्ट्री पढ़ें या मोदी जी की किताब छपने का इंतजार करें. मल्लब प्रधान सेवक जी ने निराश किया हो ऐसी बात नहीं.
हां, यह ठीक है कि अपने राहुल बाबा बीच-बीच में गायब हो जाते हैं, मगर समय-समय पर आकर अपनी जिम्मेदारी निभा जाते हैं. माता जी बीमारी की वजह से कटी-कटी रहती हैं, मगर जमाई सा ने पारिवारिक जिम्मेदारी को बखूबी समझा है और पूरी शिद्दत से मैदान में डंटे रहे हैं. इस बीच कयास यह है कि जैसे सर्दियों का मौसम शुरू हुआ और खांसी वाले साहब ने मफलर बांधी कि उनका जलवा फिर से शुरू हो जायेगा. एक वास्तुशास्त्री ने उन्हें पहले ही कह दिया था कि मफलर मत उतारें, मगर उस वक्त उन्हें लगा था कि वास्तुशास्त्री जरूर मोदी से मिले हुए हैं, इसलिए उतार फेंका. वैसे भी गरमी और बरसात धरनों का मौसम होता नहीं है, बड़ी परेशानी होती है. इसलिए क्रांति सर्दी के गुलाबी मौसम में होती हैं, जब धूप पसीने नहीं छुड़ाता.
अपने देश की राजनीतिक विरासत को याद करते हुए सोचता हूं कि ये लोग अगर नहीं होते तो हमारी जिंदगी कितनी वीरान नहीं होती. हार्ट के आपरेशन के बाद से लालू जी जो मौन हैं, इस बीच हमने उनके 'भक-बुरबक' को कितना मिस किया है, वो क्या जानें. वैसे ही हम शरद पवार साहब को मिस कर रहे हैं, नयी सरकार में महंगाई पर टाइट डॉयलॉग मारने वाला अभी कोई नेता डेवलप नहीं हो पाया है. क्या ठसक होती ही उनके बयान में जब वे कहते थे कि मैं कोई ज्योतिषी हूं जो बता पाऊं कि महंगाई कब खतम होगी. अहा, वे दिन भी क्या दिन थे. मैं उतना ही कपिल सिब्बल साहब की जीरो लॉस थ्योरी को मिस करता हूं. ममता बनर्जी की उस अदा को मिस करता हूं जब उन्होंने कहा था कि मनमोहन सिंह हमारा प्रेसिडेंट का कैंडिडेट है. दिग्विजय की कुटिल मुस्कान और बेनी बाबू की मासूमियत का विकल्प हम अब तक खोज नहीं पाये. हां मायावती के कुरसी पर बैठने के अंदाज की छवियां प्रधान सेवक में जरूर नजर आयी है. सुना है अमर सिंह फिर से सपा ज्वाइन कर रहे हैं, इस खबर को सुनकर ही दिल बाग-बाग है. मगर मन इस बीच यह भी सोच रहा हूं कि अपने बाबू गिरिराज सिंह इन दिनों क्यों मौन हैं. इन्हें तो बुखारी का बयान आते ही कह देना चाहिये था कि पाकिस्तान चले जायें. कहां चले गये गिरिराज बाबू. मेरे मन में थोड़ी नाराजगी महाराष्ट्र की जनता के प्रति भी है, बताइये राज ठाकरे जैसे नेता को हरा दिया. अब हम बिहारी किसे कोसेंगे. बाला साहब के गुजरने के बाद जो मायूसी का माहौल बन रहा था उसमें राज साहब से ही उम्मीदें थीं कि वे कुछ खास करेंगे. मगर उन्हें इस तरह डिमोरलाइज किया जाता रहेगा तो बताइये उनकी बातों में वह रौनक कहां से दिखेगा.
मैं इन दिनों लगातार बाबा रामदेव को मिस करता हूं. मनमोहन सिंह की सरकार गिरी कि इनके बुरे दिन आ गये, पहले दिन भर टीवी पर ही बने रहते थे. अब छठे-छमाही ही कोई इन्हें याद करता है. पिछली सरकार के गिरने से तो अन्ना भी दुखी होंगे, पता नहीं कहां. अब तो कोई उनसे पूछने भी नहीं जाता कि थप्पड़ मारा तो सही किया या गलत. कुमार विश्वास साहब भी पराये से लगने लगे हैं और शाजिया भौजी तो दिखती ही नहीं हैं. हां, नीतीश जी ने जरूर एक नयी प्रतिभा को भारतीय राजनीति में पेश किया है, हमारे नये मुख्यमंत्री तकरीबन रोज अपने नये-नये जुमलों से भारतीय राजनीति में नये-नये रंग भर रहे हैं. उधर खट्टर साहब का इतिहास जानकर उनसे भी उम्मीदें जगी हैं. मगर विजय जॉली साहब आपको सचमुच मिस कर रहा हूं और न आप दिख रहे, न शीला आंटी, न विजय गोयल और न अरविंद सिंह लवली. वे भी क्या दिन थे जब दिल्ली की राजनीति ही पूरे देश पर छायी थी. हम रोज सुबह शाम एमएलए गिनते रहते थे. डरते-डरते कि कहीं राजनीति इतनी साफ-सुथरी न हो जाये कि हॉर्स ट्रेडिंग का नामोनिशान खत्म हो जाये... मगर हमारी परिपक्व राजनीति ने केजरीवाल साहब के झटकों को न सिर्फ झेला बल्कि उन्हें भी अपने रंग में थोड़ा रंग ही डाला.
मुझे आजम खां साहब की भैंसें बहुत याद आती हैं और फलां सांसद महोदय के कटहल. उन भैसों और कटहलों का नाम भी भारतीय राजनीति के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगा. मुझे कतई हैरत नहीं होता कि हैदराबाद के ओबैसी साहब और गोरखपुर के योगी आदित्यनाथ एक दूसरे से हजारो किमी दूर रहने के बावजूद कैसे एक जैसी फ्रिक्वेंसी शेयर करते हैं. यह तो इस देश की खूबी है. एक अंडर करंट है, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांधता है. हां, लालू और शिबू जैसे नेता अम्मा जयललिता से रश्क खाकर जल भुन सकते हैं कि उनके जेल जाने पर उनके एक भी समर्थक ने खुदकुशी तो दूर नाखून तक नहीं कटाया. हम भी थोड़े दुखी रहते हैं कि तमिलनाडु में चुनाव के मौके पर हजार-हजार के नोट बंटते हैं और हमें दारू की एक बोतल पर टरकाने की कोशिश की जाती है. उम्मीद है हमारे तरफ भी वह सुबह कभी तो आयेगी. मगर अभी जो है, वह क्या कम है. सियासत रोज एक ऐसी खबर से मिलाती है, जिसे सुनकर मुंह में पानी आ जाये... बहुत शुक्रिया देश के सियासतदानों, आपसे ही तो दावत-ए-सियासत का लुत्फ है.

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