ठठरी सी इस काया में 14 बच्चे आकर लौट गये


पुष्यमित्र और मुन्ना झा
यह कहानी एक ऐसी महिला की है, जिसने 16 बच्चों को जन्म दिया और उनमें से दो बच्चों को ही बचा पायी. 14 बच्चे जन्म के एक हफ्ते के अंदर ही अकाल कलवित हो गये. विडंबना तो यह है कि इस कहानी ने ऐसे दौर में आकार लिया है जब जननी एवं बाल सुरक्षा के लिए सरकार अरबों-खरबों की राशि खर्च कर आंगनबाड़ी से लेकर जेवाइएसएस तक कई योजनाएं संचालित कर रही है. इतना ही नहीं भीषण गरीबी में रहने वाली उस महिला का नाम न बीपीएल सूची में है न एपीएल सूची में.
जनक देवी जहानाबाद जिले के कांको प्रखंड के सुलेमानपुर पंचायत के रानीपुर गांव में रहती हैं. बमुश्किल 37 साल की उम्र में वह सत्तर साल की बुढ़िया नजर आती हैं. उनके बाल सफेद हो चुके हैं, शरीर पर मांस का एक कतरा नजर नहीं आता, पांच मिनट तक खड़ी रहने की ताकत भी शायद ही उनके शरीर में बची हो. अपनी किस्म की सबसे भयावह दुख को देख चुकने के बावजूद वह आगंतुकों के लिए पड़ोस से कुर्सियां मंगवाती हैं और मुस्कुराने की कोशिश करती हैं. सेहत के मामले में थोड़ा सा भी सजग इंसान उन्हें देखकर आसानी से कह सकता है कि उनके शरीर में हिमोग्लोबिन की मात्रा न्यूनतम है.
जनक देवी को ठीक-ठीक याद नहीं है कि वह कब ब्याह कर इस गांव आयीं. मगर तब से अब तक उसने एक ही काम किया है, बच्चों को धरती पर लाने की कोशिश. वह कहती हैं, हर बार सतमस्सू (सात महीने गर्भ में रहने वाला) बच्चा होता था. कोई एक दिन तो कोई दो तीन में चला जाता. एक बच्चा सबसे अधिक धरती पर टिका वह एक हफ्ते में गुजर गया. विडंबना यह थी कि किसी बच्चे का जन्म अस्पताल में नहीं हुआ.
पति गनौरी साह जहानाबाद में किराये पर रिक्शा चलते हैं, किसी दिन पचास तो किसी दिन सौ बचाकर लाते हैं. इन्हीं पैसों से घर चलता है. जनक देवी में इतनी ताकत नहीं है कि कहीं मेहनत मजूरी कर सके. वह मुर्गियां पालती हैं और उनके अंडों को बेचती हैं. घर के नाम पर दो डिसमिल जमीन पर बना फूस औऱ मिट्टी का एक कमरा है, जिसे में रात में सोते वक्त ही घुसा जा सकता है. मगर इसके बावजूद उनका नाम न बीपीएल सूची में है न एपीएल सूची. यानी राशन दुकान से उन्हें न अनाज मिलता है न और कुछ. दो बच्चे नेहा कुमारी (6 साल) औऱ ओमप्रकाश (2 साल) जो गाय का दूध पीने के कारण बच गये हैं, वे आंगनबाड़ी के भरोसे पल रहे हैं.
जनक देवी को संभवतः पति से भी बहुत सहयोग नहीं मिला. क्योंकि अगर पति का नजरिया सकारात्मक होता तो जनक देवी को शायद ही 16 बार गर्भवती होने पर मजबूर होना पड़ता. जनक देवी सीधे-सीधे इस बारे में कुछ नहीं कहती हैं, मगर उनकी बातें यह राज खोल देती हैं. वे कहती हैं, जब आठवां बच्चा नहीं बचा तो उनके पति ने संभवतः बच्चों के लिए दूसरी शादी कर ली. उक्त महिला उनके साथ ही उनके घर में पांच-छह साल रही, फिर वह उन्हें छोड़कर चली गयी.
इन विपरीत परिस्थितियों में उन्हें मदद सिर्फ वार्ड सदस्य और सुलेमानपुर पंचायत की उप मुखिया मैना मंती से मिली है. मैना मंती लगातार प्रयासरत हैं कि उनका नाम बीपीएल सूची में डल जाये. वे मुखिया से लेकर डीएम तक इनकी समस्या को लेकर पहुंच चुकी हैं. डीएम ने भरोसा दिलाया है कि जब नयी सूची बनेगी तो जनक देवी का नाम प्राथमिकता से शामिल किया जायेगा. मैना की वजह से ही उन्हें अब आंगनबाड़ी से बच्चों के लिए टेक होम राशन मिलने लगा है, जिससे उनकी ठीक-ठाक मदद हो जा रही है.
शिशु रोग विशेषज्ञ संदीप जैन कहते हैं कि यह मामला पहली नजर में कुपोषित माता का लगता है. एक बच्चे को जन्म देने के लिए जो पोषण अपेक्षित होता होगा वह उन्हें नहीं मिल पाता होगा और इसी वजह से हर बार प्रिमेच्योर डिलीवरी होती होगी औऱ बच्चे का वजन बहुत कम होता होगा. प्रिमेच्योर डिलीवरी में बच्चे का लालन-पालन सिर्फ मां के दूध के भरोसे नहीं हो सकता, उन्हें खास नर्सिंग केयर की जरूरत थी. चुकि उनके बच्चों का जन्म अस्पताल में नहीं हुआ, लिहाजा वह सुविधा भी नहीं हासिल हो पायी. जनक देवी के हालात डॉक्टर संदीप के बातों की पुष्टि करते हैं.
वैसे उनके बच्चों के न बच पाने की वजह जो भी हो मगर इस उदाहरण ने सरकार की कई योजनाओं पर सवाल खड़े कर दिये हैं. चाहे वह संस्थागत प्रसव का हो, मातृत्व सुरक्षा का हो, जन्मपूर्व टीकाकरण, पोषण औऱ देखभाल का हो, शिशु सुरक्षा का हो और आंगनबाड़ी केंद्रों की उपयोगिता का हो. इसके अलावा बीपीएल चयन में उस परिवार से साथ अनदेखी भी इस महिला के साथ हुई इन भीषण घटनाओं की बड़ी वजह है.

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