किसिंग-विसिंग हमारी परंपरा नहीं है जी..


यह कौन है वान ब्रायंट. जो मान न मान मैं तेरा मेहमान हुआ जा रहा है औऱ कह रहा कि किसिंग यानी चुंबन की शुरुआत भारत में हुई थी और भारत से ही पूरी दुनिया में फैला. बताइये कितना बदतमीज है, जब हमने कहा कि प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत भारत से हुई तो ये वेस्टर्न वर्ल्ड वाले माने नहीं, लगे मजाक उड़ाने. और अब एक नयी थ्योरी लेकर आ गये हैं. अरे ब्रायंट के बच्चे, हमने किसिंग-विसिंग की शुरुआत नहीं की है. कोई भारतीय इतना घिनौना काम कर ही नहीं सकता. और अगर किसी ने गलती से यह काम कर भी दिया होगा तो हमने उसे प्रोमोट नहीं किया. हमारे पूर्वजों ने जरूर उसे देश से निकाल बाहर किया होगा और रोम भेज दिया होगा. जाओ वहीं गुंह गीजो. ऐसे लोगों के लिए इस देश में कोई जगह नहीं.
यह वेस्टर्न प्रोपेगेंडा हैं कि भारत पहले यौन के मामले में काफी उन्मुक्त था. हमने कामसूत्र से लेकर कोकशास्त्र तक इसलिए नहीं रचे थे कि हम रंगरसिया टाइप थे. दरअसल हम इतने भोले-भाले थे कि हमारे लोगों को पता ही नहीं था कि क्या करना है और कैसे करना है. अगर ये किताबें नहीं होतीं, खजुराहो और कोणार्क की मूर्तियां नहीं होतीं तो तीन चौथाई लोग बंद कमरे में होठ के बदले नाक को ही किस करके खुश हो जाते और सेक्स के बदले झूमर खेलते रहते. लोगों के कंफ्यूजन को क्लीयर करने के लिए ये किताबें लिखी गयी हैं जी, इसलिए नहीं कि हमलोग बड़े खुले हुए थे.
इस कंफ्यूजन को क्लीयर करने के लिए ही भगवान कृष्ण ने रासलीला रचाई. हमने तो पहले ही तय कर लिया था कि इस देश में खुले आम रोमांस का हक एक ही इंसान को है. भगवान कृष्ण को. उसने कर लिया, हो गया. इस पूरे मुल्क के लिए एक ही रासलीला काफी है, हमें दूसरी रासलीलाओं की जरूर नहीं. और भगवान कृष्ण ने भी ऐसा इसलिए किया कि जो लोग बंद कमरे में रासलीला करते हैं उन्हें पता रहे कि क्या क्या करना है.
हम सिर्फ सूसू करने के मामले में खुले हुए हैं, वह भी सिर्फ मरद. केवल मर्द का बच्चा है शान से सड़क किनारे पैंट की जिप खोलकर सूसू की धार बहा सकता है. लड़कियों का धर्म है घर से निकलने से पहले तीन बार चुपके से सूसू कर लेना और रास्ते में एक बूंद भी पानी या लिक्विड नहीं लेना. टट्टी करने के मामले में भी हम थोड़े खुले हैं, हमने औरतों को भी खुले में खुलकर शौच करने की आजादी दी है. मगर दिन में नहीं. हां, गालियां देने के मामले में हम तो पूरे खुले हैं और देखिये जो काम हम बंद कमरे में करने के हिमायती हैं, उसे गालियों में खुलेआम उद्धृत कर डालते हैं, बेहिचक. और आपको हमारी गलियों से समझ लेना चाहिये कि हम सेक्स-वेक्स को कितना बुरा काम मानते हैं. हमारी इस तरह की चीजों में रुचि होती तो हमारी गालियां सेक्सुअल इंटरकोर्स पर बेस्ड थोड़े ही होती. हम सेक्स को बुरा मानते हैं इसलिए लोगों को सेक्सुअल गालियां देते हैं. हमारे ऋषि-मुनियों ने औरत को नर्क का द्वार माना है, इसलिए हम औरतों के नाम से गालियां देते हैं. अब इन दिनों नरक टूरिज्म का फैशन चल गया है तो क्या किया जाये.
ब्रायंट साहब, कान खोलकर सुन लो. यह जो केरल में औऱ कोलकाता में लड़के-लड़कियां खुले आम सड़कों पर एक दूसरे को किस कर रहे हैं यह हमारी संस्कृति नहीं, तुम्हारी अपसंस्कृति है. हम भी मुहब्बत करते थे, हमें भी मालूम है मुहब्बत क्या है.
अपने जमाने में हम महबूबाओं के घर बेनामी खत भेजा करते थे और उम्मीद करते थे कि वह इशारों में समझ जाये कि भेजने वाला कौन है. थोड़ा वक्त बदला तो लैंड लाइन पर फोन करने की हिम्मत करने लगे, मगर उस वक्त भी उनकी अम्मा को यह बताया जाता था कि बातें पढ़ाई लिखाई की हो रही है और मामला दोस्ती की हद में ही है. हालांकि उस दौर में भी कुछ लोग अपसंस्कृति के शिकार थे, जिनकी महबूबाएं होस्टल में रहा करती थीं या अलग फ्लैट ले रखा था. मगर कॉलेज में भी बहुत मुश्किल से पता चलता था कि कौन सा रिश्ता दोस्ती की हद में है और कौन सा चौहद्दी पार कर गया है. तब हम जैसे लोग यह मानकर चलते थे कि दुनिया में सबकुछ पवित्र और पाक है. क्योंकि वे लोग क्या गुल खिलाते थे यह कमरे की दीवारों को छोड़कर किसी को पता नहीं चल पाता.
अब देखिये, ये लोग सड़क पर जुम्मा चुम्मा दे दे टाइप हुए जा रहे हैं. इसका सबसे बड़ा नुकसान है कि जिनकी मुहब्बत के पौधे लगने से पहले ही मुरझा गये वे इंसिक्योर हो रहे होंगे. कसम मनोहरलाल खट्टर की यही इंसिक्योर लड़के आगे चलकर रेपिस्ट हो जायेंगे. आप मेरी बात गांठ बांध कर रख लो.

Comments

सच कहूं तो अब ऐसी खबरों को पढने की आदत डालनी होगी या फ़िर सिरे से आज और अभी ही इनसे इंकार करना होगा ........क्रियाओं और सोच का द्वंद प्रारंभ हो चुका है ..जो शक्ति प्रखर होगी वही संचालक शक्ति बनेगी ...ये समय खुद तय कर देगा .सामयिक और सटीक चित्रण ......
रोचक लेख!