ओ माइ गॉड की कहानी और बर्फी का किरदार, कृष वाली हीरोइन, पीके तैयार


डिस्क्लेमर - इस समीक्षा का मकसद उस सवाल का जवाब हासिल करना नहीं है कि इस फिल्म में हिंदुओं का या हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया गया है या नहीं. हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि यह फिल्म कैसी बनी है.
अब इस फिल्म की समीक्षा.
1. राजकुमार हिरानी और आमिर खान. ये दोनों इस समय बालीवुड के सबसे प्रतिभाशाली लोगों में से एक हैं. इसलिए उनसे एक बेहतरीन फिल्म की अपेक्षा दर्शक करता है. संभवतः इसी वजह से इस फिल्म के टिकट की कीमत भी अधिक वसूली जा रही है. दोनों ने अपने काम से उत्कृष्टता के अलग बैरोमीटर निर्धारित किये हैं, इसी लिहाज से उनके काम की परख की जाती है, जानी चाहिये.
2. राजकुमार हिरानी की फिल्मों का अब तक मूल मैसेज रहा है कि पढ़े-लिखे लोग कंफ्यूज करते हैं और कम पढ़े और नातजुर्बेकार लोग कई दफा सीधी सटीक बातें करते हैं और बड़ी समस्याओं का हल चुटकियों में निकाल देते हैं. चाहे मुन्नाभाई एमबीबीस की जादू की छप्पी हो, लगे रहो मुन्ना भाई की गुलाब या थ्री इडियेट्स का स्लोगन ऑल इज वेल. पीके भी इसी कड़ी में रांग नंबर का फार्मूला लेकर आयी है और इस बार उनका प्रहार धर्म के ठेकेदारों पर है.
3. मगर दिक्कत यह हुई कि इसी मसले पर ओ माइ गॉड के नाम से बहुत ही शानदार फिल्म बन चुकी है. जो टू द प्वाइंट प्रहार करती है. ओ माइ गॉड की वजह से पीके का विषय बासी लगने लगा है. खबर आयी है कि आमिर ने ओ माइ गॉड की शूटिंग रुकवाने के लिए आठ करोड़ की पेशकश की थी. मगर फिल्म आकर रही. लिहाजा पीके की टीम को सोचना पड़ा होगा कि ऐसा क्या करे कि उनकी फिल्म ओ माइ गॉड से अलग और बेहतर लगे.
4. जैसा कि हम सब जान चुके हैं कि इस फिल्म में पीके एक एलियन है. कोशिश की गयी है कि एक एलियन की निगाह से हम खुद अपनी धार्मिक व्यवस्था को टटोलें और समझें कि इसे हमने कैसे उलझाकर गड़बड़ा दिया है. हम धर्म के नाम पर क्या-क्या ढकोसले करने लगे हैं. ऐसे प्रयोग भारतीय फिल्मों में कई बार किये गये हैं. एलियन के नाम पर तो कम मगर यमराज को धरती पर बुलाकर स्क्रिप्ट रचा जाता रहा है. अभी सब टीवी पर सीरियल शुरू हुआ है, यम हैं हम. थीम यही है. एक सीरियल चल रहा है, बड़ी दूर से आये हैं. उसमें एक एलियन परिवार है. वह परिवार न सिर्फ धर्म बल्कि इस दुनिया की कई चीजों को नयी निगाह से देखता है और हम भी अपनी परंपराओं को उसकी निगाह से देखते समझते और उसके मूल तक पहुंचने की कोशिश करते हैं.
5. हां, यह फिल्म धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ नहीं है. ओ माइ गॉड ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल खड़े करती है मगर यह फिल्म ऐसा नहीं करती. यह बस समझाने की कोशिश करती है कि हमने ईश्वर से संवाद करने का सहज तरीका खो दिया है. हमारे तरीके बेहद उलझाऊ, नकली और भ्रामक हैं. वह कहता है आप रॉंग नंबर लगायेंगे तो सही व्यक्ति से कैसे बात होगी. फिल्म मानती है कि दोष धर्म के ठेकेदारों औऱ दलालों का है वह हमें गलत तरीका बताते हैं. इस लिहाज से यह फिल्म उतनी बोल्ड नहीं है, जितनी ओ माइ गॉड थी.
6. ओ माइ गॉड एक सटायर थी और पीके फार्स. न जाने क्यों आमिर को एक जोकर जैसी भूमिका दी गयी है. पीके वाले पात्र को हंसी और ठहाकों का पात्र क्यों बनाया गया है, कतई समझ नहीं आता. पीके का किरदार कुछ ऐसा गढ़ा गया है जैसे वह सड़क पर भटकता मानसिक रोगी हो. दरअसल हिरानी साहब एक ऐसा किरदार गढ़ना चाह रहे थे जो अपनी सहज सीधी बातों से लोगों के दिल में उतर जाये. वह मूर्ख लगे, सीधा लगे मगर अपने सीधेपन में बात पते की करे. बिल्कुल दोस्तोएवस्की के नावेल इडियेट के मुख्य किरदार की तरह. मगर पीके का किरदार दिल को छू नहीं पाता, दिल में नहीं उतरता. आप जब पीके के किरदार की तुलना बर्फी के किरदार के करेंगे तो यह फर्क सहज ही महसूस करेंगे.
7. दरअसल पीके का किरदार कई मामले में बर्फी जैसा बनाने की कोशिश ही की गयी है. आमिर खान ने इस फिल्म में बिल्कुल बर्फी जैसी भाव भंगिमाएं अपनाने की नाकाम सी कोशिश की है. मगर यह हो नहीं पाया. बर्फी का किरदार अपने लफंदरपने के बावजूद आपको बहुत प्यारा लगने लगता था. मगर पीके का किरदार जोकरई की अंतिम सीमा तक चला जाता है. आपको पेट पकड़कर हंसाने की कोशिश में वह आपके मन में उतरना भूल जाता है.
8. बर्फी और ओ माइ गॉड के अलावा यह फिल्म कृष फिल्म के प्रभाव में भी नजर आती है. नायिका का पूरा किरदार और उसके टीवी चैनल के प्रसंग कृष वाले ढर्रे पर ही है. उसी तरह पीके नायिका के लिए स्टोरी बनता है.
9. पिछले साल में कई फिल्में ऐसी आयी हैं जिसमें कथाकार और निर्देशक फिल्म को किसी नतीजे पर पहुंचाने के लिए मीडिया का सहारा लेते हैं. पीके भी धर्म का भंडाफोड़ करने के लिए मीडिया की शरण में ही शरणागत है. इसे मैं कल्पनाशीलता की कमी के रूप में देखता हूं.
10. कल्पनाशीलता की कमी तो है ही, तभी तो पीके का किरदार बर्फी जैसा गढ़ा जाता है और थीम ओ माइ गॉड जैसी हो जाती है. नायिका कृष की नायिका जैसी.
11. फिल्म में एक ही धर्मगुरू है, निर्मल बाबा टाइप, हालांकि वह निर्मल बाबा से काफी अधिक शार्प है. पीके का मकसद उसे एक्सपोज करना है और उसके पास से अपना लॉकेट वापस लेना है, ताकि वह वापस अपने ग्रह पर जा सके. अगर कैनवास थोड़ा विस्तार लेता तो बेहतर होता. ओ माइ गॉड का कैनवास काफी बड़ा था.
12. फिल्म में पीके का किरदार भोजपुरी बोलने वाला और पान चबाने वाला क्यों बनाया गया है यह समझ से परे हैं. वह गुजराती, पंजाबी, मद्रासी कुछ भी बोल सकता था. हिंदी भी बोलता तो कोई फर्क नहीं पड़ता. संभवतः ऐसा कैरेक्टर को अलग रंग देने के लिए किया गया होगा. मगर आमिर भोजपुरी बोलते और पान चबाते हुए जमे नहीं. इस मामले में अमिताभ ने ऐसी लकीर खीच दी है कि उसके पास पहुंचना भी आसान नहीं है.
13. मेरे हिसाब से पीके एक कमजोर फिल्म है. पटकथा के हिसाब से, अभिनय के हिसाब से और प्रभावोत्पादकता के हिसाब से भी. संभवतः पीके के सामने निगेटिव किरदार का बहुत मजबूत नहीं होना भी इस फिल्म की एक कमजोरी है. बमन इरानी हैं, मगर एक असरहीन किरदार में. सौरभ शुक्ला को ज्यादा स्पेस ही नहीं मिला है. बस आमिर हैं और अनुष्का जो होठों का आपरेशन करवाने के बाद असामान्य दिखने लगी हैं. हां, सुशांत सिंह छोटी सी भूमिका में असर छोड़ गये हैं.
14. मुझे फिल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा वही लगा है जिसमें सुशांत सिंह और अनुष्का एक दूसरे के करीब आते हैं. वह हिस्सा दिल को छू लेता है.
15. इस फिल्म को देखकर महसूस किया कि अब समीक्षक भी आमिर से डरने लगे हैं. उन्होंने सोचा होगा कि इसे पांच से कम कितने स्टार दिये जायें. मुझसे पूछा जाये तो मैं ढाई स्टार से अधिक कतई नहीं दूंगा.

Comments

पीके की तारीफ तो काफी हो रही है। मैंने फिल्म नहीं देखी, लेकिन ओ माई गॉड से तुलना हर कोई कर रहा है। मैंने ओ माई गॉड भी टुकड़ों में देखी है। दोनों फिल्में देखकर समीक्षा एक बार फिर पढी जाएगी।