Friday, December 26, 2014

फ्लोराइड ने छीन ली कचहरिया डीह की जवानी


कचहरिया डीह बिहार के नवादा जिले का एक बदनसीब टोला है. रजौली प्रखंड के हरदिया पंचायत में स्थित इस गांव को आस-पास के लोग विकलांगों की बस्ती कहते हैं. 71 घरों वाले इस छोटे से टोले के सौ के करीब जवान लड़के-लड़कियां चलने-फिरने से लाचार हैं. उनकी हड्डियां धनुषाकार हो गयी हैं. यह सब तीन दशक पहले शुरू हुआ जब अचानक इस बस्ती के भूजल में फ्लोराइड की मात्रा तय सीमा से काफी अधिक हो गयी और बस्ती स्केलेटल फ्लोरोसिस के भीषण प्रकोप का शिकार हो गया. हालांकि मीडिया में लगातार यहां की परिस्थितियों पर खबरें आने से एक फायदा तो यह हुआ कि सरकार का ध्यान इस और गया और यहां वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित हो गया. मगर देखरेख के अभाव में पिछले दिनों वह चार माह से खराब पड़ा था, महज दस दिन पहले यह ठीक हुआ है.
पूरी एक पीढ़ी बरबाद हो गयी
टोले की शुरुआत में ही संतोष मिलते हैं. उनके दोनों पैर धनुषाकार मुड़े हुए हैं. वे घिसट-घिसटकर चलते हैं. उनकी उम्र 19-20 साल के करीब है. उनके पिता कहते हैं, दस साल की उम्र तक संतोष बड़ा तंदरुस्त बच्चा था. फिर अचानक यह गड़बड़ाने लगा. इसका पांव मुड़ने लगा और फिर इसकी यह हालत हो गयी. आगे बढ़ने पर संतोष की तरह के और भी कई युवा मिलते हैं जिनकी हालत ऐसी ही है. इनमें कारू रजवार के पुत्र शिवबालक, बालो भुइयां के पुत्र ब्रह्मदेव, लालो राजवंशी के पुत्र पंकज आदि हैं. एक स्थानीय ग्रामीण ईश्वरी राजवंशी कहते हैं, इस गांव में आपको 16 से 24 साल का कोई नौजवान ऐसा नहीं मिलेगा जिसकी हड़्डी सही सलामत हो. फ्लोराइड के कारण पूरी एक पीढ़ी बरबाद हो गयी.
ऐसा नहीं है कि फ्लोराइड की फांस ने सिर्फ बच्चों और युवाओं को अपने कब्जे में लिया है. प्रौढ़ों और बुजुर्गों की हालत भी ठीक नहीं है. बिस्तर से उठने में उनका दम निकल जाता है. कोई झुकने कह दे तो जान मुंह को आ जाता है. हां, यह जरूर है कि वे बच्चों और युवाओं की विकलांग नहीं हुए, क्योंकि जब पानी में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ी तो उनका शरीर इतना मजबूत हो चुका था कि वह फ्लोराइड का मुकाबला कर सके. मगर जोड़ों के दर्द और भीषण किस्म के आर्थराइटिस से वे खुद को नहीं बचा पाये. 50 साल की पन्ना देवी बताती हैं कि खाट ही अब उनका जीवन है. वे बताती हैं कि दोनों पैर नाकाम हो चुके हैं. हाथ ऊपर नहीं उठता. गोवर्धन भुइयां, द्वारी राजवंशी और ईश्वरी राजवंशी समेत कई लोगों का यही हाल है.
पानी में अचानक कैसे फ्लोराइड बढ़ गया
टोले के लोग बहुत पढ़े लिखे नहीं हैं, इसलिए उन्हें तारीखें या साल याद नहीं रहता. मगर वे बताते हैं कि पहले इस गांव का पानी ऐसा नहीं था. जबसे हरदिया में फुलवरिया डैम बना है उसके कुछ दिन बाद से यहां के कुओं का पानी तीता लगने लगा. उसके कुछ साल बाद से ही बच्चे विकलांग होते चले गये. जब तक लोग कुछ समझ पाते कि परेशानी की वजह क्या है यहां सौ से अधिक बच्चे विकलांग हो चुके थे. बिहार सरकार के रिकार्ड में बताया जाता है कि फुलवरिया डैम का निर्माण 1988 में पूरा हुआ है. स्थानीय विशेषज्ञ मानते हैं कि डैम के पानी के सिपेज से ही इस टोले के भूमिगत में फ्लोराइड की मात्रा अचानक बढ़ गयी और इसका नतीजा इस रूप में सामने आया. कचहरिया डीह के पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा 8 मिग्रा प्रति लीटर पायी गयी है. जबकि यूनिसेफ ने पेयजल में फ्लोराइड की परमिशेबल लिमिट 1.5 मिग्रा प्रति लीटर तय की है.
मीडिया में छा गया कचहरिया डीह
2002 के बाद के सालों में कचहरिया डीह की खबरें मीडिया में लगातार आने लगी. इससे सरकार पर दबाव बढ़ा और लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के अधिकारी बार-बार यहां आने लगे. स्थानीय अधिकारियों ने भी कचहरिया डीह पर विशेष ध्यान देना शुरू किया. इसके दो फायदे हुए. पहला, यहां एक वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित हो गया और टोले में सार्वजनिक पेयजलापूर्ति के कई नल लग गये. दूसरा तत्कालीन डीएम विजयलक्ष्मी ने यहां कैंप लगाकर कई विकलांगों का निःशक्तता प्रमाणपत्र बनवा दिया. सरकार द्वारा किये गये इन प्रयासों की वजह से एकबारगी लगने लगा कि अब इस गांव की सारी समस्याएं सुलझ जायेंगे. इस वजह से कचहरिया डीह से मीडिया अटेंशन भी कम होने लगा.
नाकाफी साबित हुए ये उपाय
सरकारी संस्थाओं द्वारा किये गये ये दोनों उपाय कुछ ही सालों में नाकाफी साबित होने लगे. वाटर ट्रीटमेंट प्लांग के संचालक दिलीप यादव बताते हैं कि तकरीबन 44 महीने ठीक-ठाक चलने के बाद प्लांट का मोटर बिगड़ गया और इसे सुधरवाने में चार महीने लग गये. इस बीच गांव के लोग दूर-दराज से पानी लाकर काम चलाते रहे. वे कहते हैं कि अब तक इस प्लांट को लगे 49 महीने बीत चुके हैं, मगर उन्हें अब तक सिर्फ 15 महीनों का मेहनताना मिला है. ऐसे में वे अब इस जिम्मेदारी से मुक्त होने की कोशिश कर रहे हैं.
वहीं, निःशक्तता प्रमाण पत्र बनने के बाद से अब तक यहां के विकलांगों को सिर्फ एक बार निःशक्तता पेंशन मिला है. उसके बाद उनका पेंशन कहां गया यह उन्हें पता नहीं. विकलांगता की वजह से यहां के नब्बे फीसदी युवा पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ गये हैं. अब वे अपने परिवारों पर बोझ बनकर रह गये हैं. जबकि उनके लिए एक विशेष पाठशाला खोले जाने की जरूरत थी ताकि वे पढ़ लिखकर मुख्य धारा में आ सकें. कोई नौकरी कर सकें या रोजगार शुरू करके आत्मनिर्भर हो सकें.
निःशक्तों को मिलने वाला सामाजिक पेंशन अब टोले में एक राजनीतिक मसला बन चुका है. टोले के लोग मानते हैं कि उनका पैसा ग्राम सेवक हड़प कर जा रहे हैं. ईश्वरी राजवंशी अपनी बेटी ममता कुमारी का सामाजिक पेंशन का पासबुक दिखाते हुए शिकायत करते हैं कि कैसे ग्राम सेवक ने उस पर दो फरजी एंट्रियां कर दी हैं, जबकि उन्हें पेंशन का एक पैसा नहीं मिला. वार्ड नौ की वार्ड सदस्य सिया देवी भी इस बात की तसदीक करती हैं.
ट्रीटमेंट प्लांट से आया बदलाव
हालांकि यह कहना गलत होगा कि ट्रीटमेंट प्लांट से कचहरिया डीह को कोई खास लाभ नहीं हुआ. यह प्लांट द्वारा मिलने वाले शुद्ध पेयजल का ही लाभ है कि टोले के नये बच्चों में से कोई विकलांग नहीं हुआ. किसी को फ्लोरोसिस की परेशानी नहीं है. मगर जो लोग एक बार इससे प्रभावित हो चुके हैं, उनकी स्थिति जस की तस है. उनके लिए विशेष इलाज की दरकार है.
पड़ोस के गांव में भी पसर रहा संक्रमण
इस बीच कचहरिया डीह के पड़ोस के गांव पुरानी हरदिया के दो-तीन मुसलिम परिवार भी स्केलेटल फ्लोरोसिस की चपेट में आ गये हैं. ऐसा लगता है कि इस बस्ती में भी अब डैम का सिपेज घुसने लगा है. गांव के जसीम अंसारी के पांव भी कचहरिया डीह के बच्चों की तरह मुड़ गये हैं. रहमान अंसारी(62) और असगरी खातून(48) जोड़ों के भीषण दर्द से परेशान रहते हैं और चलने-फिरने से लाचार हो गये हैं. सगीना खातून(10) के पांव टेढ़े होने लगे हैं. इनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है.
कचहरिया एक केस स्टडी है. गया-नवादा में ऐसे कई गांव हैं, जहां ऐसी ही हालत है. दक्षिण बिहार में फ्लोराइड प्रभावित गांवों में कोई पॉलिसी बनाकर ही सरकार को काम करना होगा. ताकि वहां के लोगों को राहत मिल सके. - अशोक घोष, अध्यक्ष, पर्यावरण एवं जल प्रबंधन विभाग, एएन कॉलेज, पटना
कचहरिया डीह में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण इन्वायरोटेक प्रा. लिमिटेड द्वारा कराया गया था और इसके मेंटेनेंस का जिम्मा वाटरलाइफ इंफ्राटेक को दिया गया था. पिछले तीन चार महीने से मेंटेनेंस देखने वाली कंपनी काम ठीक से नहीं कर पा रही. कुछ माह पहले जो मशीन खराब हुई थी उसकी मरम्मत का जिम्मा कंपनी का था. मगर कंपनी ने कोई पहल नहीं की, बाद में विभाग की ओर से ही उसे ठीक कराया गया. - रामजी प्रसाद, एसडीओ, रजौली अनुमंडल, नवादा

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