हमारे राष्ट्रगान को किसने संगीत दिया...


देश के 69वें स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले मैं यह सोच कर खुद पर हैरान हो रहा हूं कि मुझे मालूम नहीं, हमारे राष्ट्रगान जन-गण-मन की संगीत रचना किसने की है. दरअसल मैं पाकिस्तानी अखबार डॉन की साइट पढ़ रहा था, वहां एक ब्लॉग पोस्ट में पाकिस्तान के कौमी तराने के बारे में विस्तार से बताया गया था. उसे पढ़ते हुए मुझे पता चला कि पाकिस्तान में कौमी तराने का पहले म्यूजिक तैयार हुआ, फिर जाकर उसे शब्द दिये गये. यह पढ़ते हुए मेरे मन में भी ख्याल आया कि हमारे राष्ट्रगान का म्यूजिक भी किसी ने तैयार किया होगा. और मैं गूगल पर सर्च करने लगा...
क्या आप जानते हैं कि गन-गण-मन को म्यूजिक किसने दिया? जन-गण-मन महाकवि रवींद्रनाथ ठाकुर की रचना है और उसके पहले पाराग्राफ को हम बतौर राष्ट्रगान इस्तेमाल करते हैं, यह तो मेरे ख्याल से सबको मालूम होगा. इस जानकारी के अलावा हम अक्सरहां इस बात पर भी बहस करते हैं कि शायद यह गीत जार्ज पंचम के स्वागत में लिखा गया था. हालांकि गुरुदेव टैगोर ने अपने जीते-जी इस विवाद का खंडन कर दिया था और कहा था कि जार्ज पंचम कभी भारत भाग्यविधाता नहीं हो सकते. भारत का भाग्यविधाता तो ऊपर वाला है, ईश्वर है. इस पूरे गीत को ब्रह्म समाज ने अपनी प्रार्थना के रूप में अपना लिया, आजादी से काफी पहले. मगर इसका संगीत किसने दिया इस पर बहुत कम बातचीत होती है. हालांकि इसका विवाद भी कम गहरा नहीं है और जब यह सवाल विवादित हुआ तो इसका निबटारा करने के लिए गुरुदेव जिंदा नहीं थे.
विकीपीडिया कहता है और आधिकारिक तौर पर कई जगह कहा गया है कि जन-गण-मन की रचना गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने की है और इसका कंपोजीशन भी उन्होंने ही तैयार किया है. मगर कई लोग मानते हैं कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहयोगी कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने जन-गण-मन को संगीत दिया है. वह ओजस्वी संगीत जिससे इसे सुनने वाला हर इंसान एक झटके में अटेंशन हो जाता है. कैप्टन राम सिंह ने मशहूर गीत कदम-कदम बढ़ाये जा का संगीत भी दिया है और इसमें कहीं से कोई विवाद नहीं है. जब आप कदम-कदम बढ़ाये जा के संगीत को याद करेंगे तो महसूस करेंगे कि जन-गण-मन का संगीत कैसे इसके करीब है. मगर कई लोग राम सिंह ठाकुर के दावे से इत्तेफाक नहीं रखते. खास तौर पर रवींद्र संगीत के पुराने जानकार. यह विवाद आठवें दशक में शुरू हुआ, जब गोरखा हिल काउंसिल ने कोलकाता के एक अखबार में विज्ञापन देकर कैप्टन राम सिंह ठाकुर की नेताजी से निकटता का उल्लेख किया और वहां उनका परिचय देते हुए कहा कि ये वही हैं, जिन्होंने भारत के राष्ट्रगान को संगीत दिया है. मगर इस विज्ञापन पर बंगाल के बुद्धिजीवी वर्ग में उथल-पुथल मच गया. आधे दशक से रबींद्र संगीत की साधना करने वाले सुविनय राय ने कहा कि उन्होंने कभी ऐसी बात नहीं सुनी.
इस बारे में उस वक्त लखनऊ में रह रहे कैप्टन राम सिंह ठाकुर से पूछा गया तो उन्होंने गोरखा काउंसिल के इस दावे का समर्थन किया कि जन-गण-मन की संगीत रचना उन्होंने ही की है. उनके इस दावे पर बंगाली बुद्धिजीवी और भड़क गये. विश्वभारती के एक सदस्य ने तो कैप्टन सिंह पर कार्रवाई करने की भी मांग कर दी. प्रत्युत्तर में कैप्टन सिंह भी आगबबूला हो गये बाद में उन्होंने राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से पत्र लिखकर इस बात के लिए क्षोभ जताया कि चुकि वे गोरखा हैं, इसलिए उनके इस योगदान को नकारा जा रहा है. लोग मानते हैं कि गोरखा सिर्फ जंग लड़ सकता है, संगीत नहीं रच सकता.
इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए सुभाष चंद्र बोस के भतीजे शिशिर बोस ने कहा कि दरअसल कैप्टन सिंह ने जन-गण-मन के हिंदी अनुवाद ... सुख चैन की वर्षा बरसे, भारत भाग्य है जागा... को संगीत दिया है. नेताजी जन-गण-मन को कदम-कदम बढ़ाये जा की तरह का मार्चिंग सांग बनाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने ऐसा करवाया. हालांकि इस तमाम
विवाद के बावजूद कैप्टन राम सिंह के दावे को सरकारी मान्यता नहीं मिली है. 2002 में कैप्टन सिंह खुद इस दुनिया से विदा हो गये.
जन-गण-मन के संगीत का जिक्र आता है तो एक आयरिश महिला मार्ग्रेट कजिन का भी जिक्र आता है, जिन्होंने जन-गण-मन के लिए म्यूजिकल नोट्स तैयार किये थे. 1919 में वे अपने मित्र विवादास्पद आयरिश कवि जेम्स एच. कजिन्स से मिलने आंध्र प्रदेश के चित्तौर जिले के मदनपल्ली में स्थित एनी बेसेंट द्वारा स्थापित थियोसोफिकल कॉलेज में गये थे. वहां कवि महोदय की पत्नी मार्ग्रेट कजिन ने जो पश्चिमी संगीत की जानकार थीं, ने इसका नोटेशन तैयार किया था. कहा जाता है कि इसी नोटेशन को आज तक इस्तेमाल किया जाता है.

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