फरकिया- सदियों से फरक पड़ी एक दुनिया की कहानियां


फरकिया वाली किताब तैयार हो गयी है. फिलहाल यह पोथी.कॉम पर 50 रुपये में मिल रही है.
जो फरकिया के बारे में नहीं जानते उनके लिए
महान मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल टोडरमल जब पूरे भारत का भू-सर्वेक्षण कर रहे थे तो इसी सिलसिले में वे इस इलाके में भी पहुंचे. यहां आकर उन्होंने देखा कि इस इलाके में तो नदियों का ऐसा जाल है कि यहां भू-सर्वेक्षण कर पाना लगभग नामुमकिन है. आज जो नदी किसी एक जगह बह रही होती, वह अगले कुछ सालों में रास्ता बदलकर किसी और इलाके में बहने लगती है. हर दस-बीस साल में इस इलाके का नक्शा बदल जाता है. वे महीनों इस इलाके में बैठे रहे और थक-हार कर उन्हें इस इलाके का नक्शा बनाने का काम छोड़ दिया. अपने नक्शे पर उन्होंने लाल स्याही से इस पूरे इलाके को घेर दिया और लिख दिया फरक-किया. यह फरक-किया शब्द बाद में लोगों की जुबां पर चढ़कर फरकिया हो गया.
इस घटना को बीते सदियां गुजर गयीं. मगर फरकिया की हालत आज भी वैसी ही है. उन इलाकों जायेंगे तो लगेगा कि अठारहवीं सदी के किसी गांव में पहुंच गये हैं. न जाना-आना आसान है, न सरकारी सुविधाएं हैं. बाहुबलियों का राज है, और जीना पहाड़ तोड़ने जैसा है. सरकारों ने भी उस इलाके के बारे में सोचना छोड़ दिया है. आईएम4चेंज मीडिया फेलोशिप के तहत मैं उन इलाकों में शोध करने गया था. यह पुस्तक उसी शोध पर आधारित है.
किताब इस लिंक से प्राप्त कर सकते हैं.
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