खादी पिछड़ नहीं रही है, बदल रही है और आगे बढ़ रही है


कल एनडीटीवी के प्राइम टाइम में रवीश कुमार ने मेरठ के एक खादी ग्रामोद्योग संस्थान में जाकर खादी की हालात को दिखाया. निश्चित तौर पर जब आप किसी स्पॉट पर जाकर कुछ बताते हैं तो वस्तुस्थिति साफ होती है, इसलिए टीवी मीडिया में स्पॉट रिपोर्टिंग का अपना अलग महत्व है. मगर कल की रिपोर्ट ने खादी की जो स्थिति हमारे सामने पेश की है, वह मसले को सुलझा कम रही है, उलझाती अलग है. क्योंकि हम सब जिसने कभी किसी खादी मेले या सरस मेले जैसी जगह की यात्रा की है, जानते हैं कि जितना मरघटी सन्नाटा मेरठ के उस खादी कारखाने में पसरा था वह उसकी हकीकत नहीं है. रांची और पटना के खादी ग्रामोद्योग और सरस मेलों में तो कंधे छिलने की नौबत आ जाती है. और उन मेलों में हमने जम्मू-कश्मीर से लेकर नगालैंड तक और मिदनापुर से लेकर कोयंबटूर तक के स्टॉल में खादी के कपड़े देखे हैं. अक्सरहां हमारे जैसे लोग दाम सुन कर पीछे हट जाते हैं और अपनी पसंद की एक-आध चीज लेकर लौट जाते हैं. मगर खादी का क्रेज पिछले दिनों बढ़ा ही है, इससे कतई इनकार नहीं किया जा सकता.
दरअसल हुआ यह कि खादी की हालात को समझने के लिए रवीश खादी के उस कारखाने में पहुंच गये जो समय के साथ आउटडेटेड हो चली है. आपने वहां की प्रिंटिंग को देखा होगा. उस प्रिंटिग को करने वाले मजदूर इस वजह से सौ से पांच पर नहीं पहुंचे हैं कि खादी की मांग घट गयी है. बल्कि उस प्रिंटिग का जमाना लद गया है. आज के जमाने में उस प्रिंटिंग को आप शायद ही पसंद करें. दरअसल प्रिंटिंग तो एक फैशन है, जो समय के साथ बदलता रहता है. आज के नये जमाने में खादी के अलग डिजाइन फैशन में हैं और प्रिंट किया हुआ खादी का कपड़ा लोग न के बराबर इस्तेमाल करते हैं. जाहिर सी बात है, ऐसे में उस कारखाने में मरघटी सन्नाटा परसना ही था. उसे तभी बचाया जा सकता था, जब वहां के संचालक उसके डिजाइन में बदलाव लाते, प्रोसेसिंग की प्रक्रिया बदलते. कपड़ों के बदले धागों की डायिंग का काम शुरू करते. अब अगर टी-सिरीज कंपनी आज भी कैसेट ही बनाती जाये तो यह उसकी मूर्खता ही कही जायेगी, इसके लिए हम पब्लिक या सरकार को जिम्मेदार नहीं मान सकते.
अगर खादी के निर्माण की स्थिति को समझना है तो उसी रिपोर्ट में जगह-जगह पड़े खादी के थान को देखिये. जाहिर है उसे देखकर आप समझ सकते हैं कि खादी के निर्माण की स्थिति क्या है. खादी देश में भरपूर मात्रा में तैयार हो रही है. हालांकि साथ में यह भी बताया गया कि खादी के खरीदार नहीं के बराबर हैं. उनके स्टॉल खाली थे. अब ये स्टॉल क्यों खाली थे, इसे समझिये. आपने वह ग्रामोद्योग संस्थान को देखा होगा. वह मार्केट में नहीं है, वह बाजार से बाहर अपने विशाल कैंपस में है. आप आज के जमाने में सोच सकते हैं कि लोग उस कैंपस में सिर्फ खादी का कपड़ा खरीदने जायेंगे. आप अपनी जींस खरीदने जींस की कंपनी में जाते हैं क्या? नहीं, आप आउटलेट में जाते हैं. वैसे खादी ग्रामोद्योग के भी अपने आउटलेट हैं, वे बाजार में हैं. शापिंग मॉल के जमाने में उन आउटलेट्स में ग्राहक पहुंचते हैं. अपने-अपने गांव और कस्बों के आउटलेट्स को याद कीजिये. और अगर आप पटना में हैं तो मौर्या कॉम्प्लेक्स में जाकर खादी दुकानों की हालत देखिये और रांची में हैं तो झारक्राफ्ट के आउटलेट में पहुंचिये. आधे घंटे से कम वक्त में आप कुरते का कपड़ा खरीद लेंगे तो मैं आपको शाबासी दूंगा. दुकानदार को बहुत मुश्किल से आपके लिए वक्त मिलता है, इतनी भीड़ होती है. रांची में तो खैर झारक्राफ्ट का अपना शॉपिंग मॉल ही है.
इसके अलावा खादी की बिक्री मेलों के जरिये होती हैं. मेरे ख्याल से हर शहर में साल में एक बार जरूर खादी मेला या सरस मेला लगता होगा. वहां जबरदस्त भीड़ उमड़ती है. अगर आप ऐसे मेलों में जाते हैं तो जानते होंगे.
अब यह समझना जरूरी है कि मेरठ के उस संस्थान में और खादी की उस दुनिया में इतना फर्क क्यों है. यह फर्क समय के साथ बदलने की वजह से आया है. पिछले 20-25 साल में खादी ग्रामोद्योग के एक बड़े हिस्से ने बदलाव का रास्ता चुना है. उन लोगों के तकनीक में बदलाव किये हैं और खादी को सस्ता और आधुनिक फैशन के अनुकूल बनाने की कोशिश की है, ताकि इसे पापुलर बनाया जा सके. इसकी बिक्री बढ़े और अंततः इसका लाभ ग्रामोद्योग से जुड़े लोगों को मिले.
इस प्रोग्राम में दो सवाल बहुत ही गंभीरता के साथ उठाये गये हैं. पहला यह कि खादी अब खादी नहीं रही. इसमें मिलावट होती है. दूसरा खादी महंगी हो गयी है. इसी से मिलता-जुलता सवाल यह है कि खादी ग्रामोद्योग वाले जिस-तिस को खादी बता देते हैं. इस मसले को समझने के लिए खादी बनने की प्रक्रिया को समझना होगा. जो असली खादी तैयार होती है, जिसमें न ताना सिंथेटिक होता है न भरनी. वह सिर्फ पुराने डिजाइन के चरखे और लकड़ी के हथकरघे से तैयार हो सकती है. एक धागा तैयार करने वाला या वाली मजदूर एक दिन में बमुश्किल आधा मीटर कपड़े का ही धागा तैयार कर सकते हैं. और हथकरघे पर एक दिन में पांच मीटर से अधिक कपड़ा नहीं बुना जा सकता, जिसमें दो से तीन लोगों की मेहनत लगती है. इस तरह एक मीटर असली खादी तैयार करने की मजदूरी अगर न्यूनतम मजदूरी के हिसाब से ही देखी जाये तो लगभग 400 रुपये हो जाती है. फिर कपास की कीमत, रंगायी, छटाई, मार्केटिंग, ट्रांसपोर्टेशन सब जोड़ दीजिये. थोड़ा मुनाफा का हिसाब लगाइये तो यह कीमत जाहिर तौर पर हजार रुपये प्रति मीटर से कम किसी सूरत में नहीं पहुंचेगी. यही असली वजह है खादी के महंगे होने की. हां, अगर मजदूरी घटाकर शोषण पर आधारित व्यवस्था कायम की जाये तो लागत थोड़ी कम होगी.
इसलिए इस तरह से खादी तैयार करने का प्रचलन घटता जा रहा है. क्योंकि हर कोई हजार रुपये मीटर का खादी नहीं खरीद सकता. ऐसे में खादी बोर्ड के पास एक ही उपाय बचता था कि वह तानी या भरनी में से किसी एक में सिंथेटिक धागा इस्तेमाल करे और कपड़ा बिजली के करघे पर तैयार करवाये. क्योंकि हाथ से तैयार धागा इतना मजबूत नहीं होता है कि वह पावरलूम पर चढ़ाया जा सके. बिनायी के वक्त वह बार-बार टूट जाता है. यही समस्या रेशम उद्योग के साथ हो रही थी.
बेंगलुरू के केंद्रीय रेशम बोर्ड ने इसका समाधान निकालने की कोशिश की. उसने लोहे की रीलिंग मशीन तैयार की. यह चरखा ही है, बस थोड़ा मजबूत और थोड़ा प्रभावी है. इससे मजदूर एक दिन में कई गुना अधिक धागा तैयार कर सकता है और यह धागा मजबूत होता है. इस मशीन ने खादी की सूरत बदल दी. देश भर के प्रगतिशील खादी बोर्डों ने इसे अपनाया. इसके साथ-साथ रेशम बोर्ड ने कई और सहयोगी मशीनें बनायीं. अब जो लोग चरखे की प्रतीकात्मकता से लगाव रखते थे उन्होंने इसे नहीं अपनाया, बांकी लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया. झारखंड में जहां रेशम और खादी उद्योग की सबसे बेहतर संभावना है वहां झारक्राफ्ट का गठन कर इसे अंजाम दिया गया. इस प्रक्रिया से खादी की कीमत भी घटी और इसका असली स्वरूप भी बरकरार रहा. इसके बावजूद असली खादी 600-700 रुपये मीटर से कम में नहीं मिल सकता. इसलिए जो लोग सस्ती खादी चाहते हैं उनके लिए मिलावटी कपड़े तैयार किये जाते हैं. इसमें तानी या भरनी दोनों में से कोई एक सिंथेटिक होता है और वह सौ-सवा सौ रुपये मीटर में मिल जाता है. और मुझे इस बदलाव में कोई परेशानी नजर नहीं आती. और इसी वजह से खादी की ब्रिकी बढ़ रही है. खादी के डिजाइनर कुरते, कुरतियां, शर्ट्स और दूसरे चीज तैयार हो रहे हैं.
अब जरा बात करें. खादी के विचार की. तो खादी का मूल विचार यह था कि लोग अपनी जरूरत का कपड़ा खुद तैयार करें. जैसा रवीश की रिपोर्ट में महावीर त्यागी जी करते हैं. हालांकि वह भी पूरी तरह नहीं कर पाते. वे सिर्फ धागा तैयार करते हैं. करघा चलाना उनके बस की बात नहीं. वे धागे को गुजरात भेजते हैं, जहां कोई बुनकर उस धागे से कपड़ा तैयार करता होगा. और इस तरह कपड़े तैयार करने की लागत उन्हें कम से कम 300 रुपये मीटर पड़ती होगी, वह भी खुद चरखा चलाकर धागा तैयार करने के बाद. यह विचार का पालन नहीं, बल्कि कर्मकांड है. ऐसा विचार इसलिए अपनाया गया था, क्योंकि लोग अपनी जरूरत का कपड़ा खुद कम से कम पैसे खर्च कर तैयार कर सकें. इसमें खुद मेहनत करने की और स्वदेशी को अपनाने की भावना थी.
आज लोग खादी को इसलिए पसंद करते हैं, क्योंकि यह मौसम के अनुकूल होता है. प्राकृतिक है और आरामदेह है. इसके लिए लोग अधिक कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं. खादी पहनकर थोड़ा प्राइड भी फील होता है. आज बहुत कम लोग अपना खादी खुद तैयार कर सकते हैं. और खादी की यही भावना जिंदा रहे तो कम नहीं. आज लोग खादी पहनकर खादी पर अहसान नहीं करते. बल्कि खादी इसलिए पसंद करते हैं, क्योंकि इसकी क्वालिटी को समझने लगे हैं. यही बात खादी को आगे बढ़ा रही है. जैसे लोग जैविक खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को समझते हैं और उसकी बिक्री बढ़ रही है. खादी आज स्वाभिमान का नहीं, पर्यावरण का मसला बन गया है. और यह अच्छा है. और हां, खादी में वैसा मरघटी सन्नाटा नहीं है, जैसा रवीश बता रहे हैं.

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रवीशजी को लगता है किसी मेरठ का विद्यार्थी खादी नहीं दिखाई