Sunday, October 04, 2015

जहर मिलता रहा, जहर पीते रहे, रोज मरते रहे, वोट करते रहे...


चुनावी जमीन पर मुद्दों की पड़ताल-1
वाया मगध-गया-बेला विधानसभा-इस्माइलपुर बहादुरपुर बिगहा
गया पहुंचते ही मेरे मार्गदर्शक मगध जल जमात के सक्रिय सदस्य प्रभात कुमार ने मुझे चेता दिया कि भूल से भी गया शहर के किसी होटल का पानी नहीं पीजियेगा, आप पचा नहीं पायेंगे. वैसे भी पानी की जो विषैली गंध है वही आपको उस पानी को पीने नहीं देगी. हमलोग तो दो घंटे के लिए भी बाहर निकलते हैं तो पानी की बोतल साथ में रख लेते हैं. हालांकि मगध के इलाके के पानी के लिए प्रभात कुमार ने जो टिप्पणी की थी वह मेरे लिए चौकाने वाली नहीं थी, मगर हैरत की बात यह थी कि होटल वाले भी अपने ग्राहकों के लिए ढंग का पानी नहीं रखते. खास तौर पर यह देखते हुए कि बोधगया और पितृ पक्ष मेला की वजह से गया एक अंतरराष्ट्रीय किस्म शहर में तब्दील हो चुका है. यहां देशी-विदेशी पर्यटकों की भीड़ बारहो महीने रहती है. हो सकता है, प्रभात जी ने बड़े होटलों के बारे में यह नहीं कहा होगा, जहां ऐसे पर्यटक ठहरते हैं.
इन दिनों गया शहर में पितृपक्ष का मेला उफान पर है, सारे होटल पिंड दान करने वालों की भारी भीड़ की वजह से पहले से ही हाउसफुल हैं. लोगों ने अपने घरों के कमरे भी किराये पर उठाने शुरू कर दिये हैं. शहर में गेरुआ कपड़े पहने लोगों की अच्छी खासी भीड़ है, पिंड दानी सिर मुड़ाये यहां वहां भटकते नजर आते हैं. साथ में कुछ विदेशी सैलानी जिनके लिए यह मौका हिंदू धर्म की इस अजीबो-गरीब रस्म को देखने समझने और कैमरे में कैद कर लेने लायक मौका है. फाल्गु नदी और वैतरणी तालाब को कम से कम इन पंद्रह दिनों के लिए साफ सुथरा बना लिया गया है. मगर मेरी मंजिल न फल्गु नदी थी, और न ही वैतरणी तालाब. हम शहर से लगभग दस किमी दूर स्थित चूरी पंचायत के कुछ गांवों की तरफ जा रहे थे, जिनके बारे में सूचना थी कि पीने के पानी के संक्रमण की वजह से यहां के पचासों बच्चे और युवा विकलांग हो गये हैं. जोड़ों के दर्द की वजह से गांव के अधिकतर लोग उठने-बैठने और मेहनत-मजूरी करने से भी लाचार हो गये हैं. लगभग पूरा पंचायत फ्लोरोसिस नामक गंभीर बीमारी की चपेट में है और वह भी महज शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता की वजह से.
चुकि मैं फ्लोरोसिस प्रभावित कई गांवों की यात्रा कर चुका हूं, इसलिए यह जानकारी मेरे लिए चौंकाने वाली नहीं थी. मैं बस यह समझने जा रहा था कि आखिर वह कौन सी बाधा है जो इन गांवों को शुद्ध पेयजल का उपभोग करने नहीं दे रही. साफ पानी ही तो पीना है. अगर आप साफ पानी पियेंगे तो एक तो आपको इस तरह की गंभीर किस्म की बीमारी नहीं होगी. अनजाने में जिन लोगों को यह बीमारी हो गयी है, उनको भी काफी आराम पहुंचेगा. आज पंचायत से लेकर दिल्ली की सरकार तक के पास काफी पैसा है. शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के वादे और दावे हैं. फिर भी क्यों एक पूरी पंचायत विकलांगता का शिकार हो जाती है. और खुद लोग जो एक छोटी सी वजह से इस तरह की गंभीर बीमारी के शिकार हो जा रहे हैं, जिनको वोट देते हैं, उन पर दबाव क्यों नहीं बनाते कि वे उन्हें इस खतरनाक स्थिति से मुक्ति दिलायें.
पहला गांव इस्माइलपुर बहादुर बिगहा था. घुसते के साथ ईंट पर बैठे मिले 27 साल के युवक राम कृष्ण. तसवीर में जब आप उन्हें देखेंगे तो पायेंगे कि वे न राम हैं न कृष्ण. वे तो बामन देव बनकर रह गये हैं. उनकी ऊंचाई बमुश्किल साढ़े तीन या चार फीट होगी. पांव मुड़ गये हैं. उनके लिए चलना-फिरना मुहाल है. जन्म से वे ऐसे नहीं थे. 15 साल की उम्र तक उनके शरीर की बनावट किसी आम किशोर जैसी ही थी. मगर फिर अचानक उनके पांव मुड़ने लगे और पांव के मुड़ने की वजह से उनकी हाइट भी कम होने लगी. अब वे युवा तो हैं, मगर किसी काम के नहीं हैं. मेहनत-मजूरी उनके बस की नहीं है. ऐन पढ़ने-लिखने की उम्र में यह हादसा हुआ तो पढ़ाई-लिखाई भी छूट गयी.
थोड़ा आगे बढ़ने पर मिली सियामनी देवी. 45-50 साल उम्र है. मगर लगती सत्तर की हैं. पांच साल से बिस्तर पर हैं. शरीर में तेज लहर, दर्द और झुनझुनी की शिकायत है. हमेशा कराहती रहती हैं. दर्द जब तेज होता है तो तेज आवाज में चीखने-चिल्लाने लगती हैं. घर वाले चाह कर भी इनकी कोई मदद नहीं कर पाते. इन दिनों पांव में एक अजीब किस्म का घाव हो गया है. जिस पर मख्यियां भिनभिनाती रहती हैं. मगर खुद में इतनी ताकत नहीं बची है कि इन मख्यियों को उड़ा पाये. उनकी हालत तो ऐसी है कि करवट बदलने के लिए भी दूसरों की मदद लेनी पड़ती है. मगर मदद भी करे तो कौन करे. उनके पति खुद फ्लोरोसिस के शिकार हैं. किसी तरह चलते-फिरते हैं. बैठ गये तो उठना मुहाल. खेतों में बिखरे अनाज के दाने बटोर कर खाना-पीना होता है. तीन बेटे हैं. उन्हें भी कुछ न कुछ परेशानी है. एक बेटा फिर भी रोजी-रोजगार करता है. मगर वह पूरे परिवार का भार उठाने के लिए तैयार नहीं है.
ये लोग रविदास हैं. यानी महादलित. इतनी परेशानियों के बावजूद इनके मन में मांझी को जिताने का सपना है. हालांकि ये मुखर नहीं होते. क्योंकि मुखिया जी राम खेलावन यादव विधायक जी के आदमी हैं. कोई सुन लेगा तो परोबलम(प्रोब्लम) हो जायेगा. इसलिए राजनीति की बातें फुसफुसाकर करते हैं. मैंने जब पूछा कि मांझी के जीतने से क्या उनकी समस्या का समाधान हो जायेगा. दरद-लहर सब ठीक हो जायेगा? तो कहते हैं, नही बाबू... सबको भोट चाहिये. आजकल, काम कहां कोई करता है. चाहे इ हो, चाहे ऊ हो... सब एक्के रंग का है. मगर अपना जात-बिरादरी है तो कुछ तो देखना पड़ता है, बाबू.
यह क्षेत्र बेला विधानसभा के अंतगर्त आता है. यहां के विधायक सुरेंद्र यादव हैं. लगातार चार चुनाव से जीत रहे हैं. बाहुबली हैं. अजेय माने जाते हैं. पिछले चुनाव में इनके खिलाफ जदयू ने एक मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा था, इस उम्मीद में कि इस क्षेत्र में मुसलमानों की बड़ी आबादी है. मगर मुसलमानों ने महजब को तरजीह नहीं दी. इस बार भी हम पार्टी ने एक मुसलमान को उतारा है.
मैंने पूछा, विधायक जी इस बार वोट मांगने आयेंगे तो पूछियेगा न कि आप लोगों की समस्या का समाधान करवा दें? तो गांव के जोगिंदर मोची कहते हैं, हमरे गांव में विधायक जी उतरते भी कहां हैं, गाड़ी के खिड़की से हाथ जोड़े चले जाते हैं. हमलोग भी सोचते हैं कि धुर, जब दूसरा कोई आदमी जितबे नहीं करता है तो इनको ही भोट दे दिया जाये. काहे मुखिया जी से संबंध खराब किया जाये.
गांव का बच्चा-बच्चा जान गया है कि यह भीषण रोग सिर्फ पानी के कारण हो रहा है. पेयजल विभाग के लिए सालों पहले गांव के हैंडपंपों का पानी चेक करके गये हैं और हैंडपंप पर लाल निशान लगा दिया गया है. यानी यहां का पानी खतरनाक है, इसे न पियें. पांच साल पहले वैकल्पिक उपाय भी किये गये. लाखों की लागत से इस पंचायत में दो वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाये गये. पाइप बिछाकर पेयजल उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गयी. इन प्लांटों का पानी कुछ दिन तो रविदास टोले में पहुंचा फिर पहुंचना बंद हो गया.
क्यों? इसका जवाब देते हुए टोले के लोग कहते हैं कि उसी समय सड़क बन रही थी तो पाइप टूट गया और इधर पानी आना बंद हो गया. अब मुखिया जी पाइप ठीक कराते नहीं हैं, कहते हैं कि अगर पानी चाहिये तो उनके दरवाजे से लेकर आयें. दरअसल यह प्लांट मुखिया जी के दरवाजे पर बिठाया गया है. जो इस टोले से कम से कम डेढ़ दो किमी दूर है. हालांकि लोग वहां भी जाकर पानी ले आते, मगर यह भी उतना आसान नहीं है. वहां जाने पर मुखिया जी टोका-टोकी करने लगते हैं. अक्सर झगड़े की स्थिति बन जाती है. लोगों का कहना है कि दरअसल मुखिया जी चाहते ही नहीं है कि दूसरे टोले के लोग इस पानी का इस्तेमाल करें. वे इस पूरे फ्लोराइड मुक्त जल का इस्तेमाल खुद करना चाहते हैं, अपने टोले के लोगों को करने देना चाहते हैं. रविदास टोले के लोगों का आरोप है कि वहां स्थिति ऐसी है कि मुखियाजी के भैंसों को भी इस पानी से नहलाया जाता है, मगर हमें पीने का पानी भी नहीं मिलता.
यह पानी की राजनीति है, जो देश व्यापी है. पेयजल विभाग के संसाधनों पर गांव की दबंग जातियां हर बार कब्जा कर लेती हैं और दलित, गरीब-गुरबों के हाथ में कुछ नहीं आता. चापाकल लगना हो, या नल की टोटी. हमेशा मुखिया जी और उनके करीबियों के घर के पास लगता है. समाज का निचला तबका पेयजल की इस राजनीति का शिकार होकर हमेशा दूषित जल पीता रहता है. आज भी इस्माइलपुर बहादुरपुर बिगहा के लोग बेखौफ होकर लाल निशान वाले हैंडपंप का पानी पी रहे हैं. यह जाने बगैर कि इन पंपों से जो पानी निकल रहा है, उसमें 17 मिग्रा प्रति लीटर की दर से फ्लोराइड भी है. यह मात्रा देश में संभवतः सर्वाधिक है. तयशुदा मानकों के मुताबिक अगर पानी में 1.5 मिग्रा प्रति लीटर से अधिक फ्लोराइड हो तो वह पीने लायक नहीं होता.
मगर यह पेयजल की राजनीति का एक चरण है. इस राजनीति के कई और चरण हैं. फिर हम चुड़ावन नगर पहुंचते हैं. वह भी इसी पंचायत का हिस्सा है. भुइयां लोगों की इस बस्ती में भी एक वाटर प्यूरीफायर लगा है.(तसवीर देखें) इस वाटर प्यूरीफायर में पानी तो साफ होता है मगर वहां की व्यवस्था कैसी है, यह आप देखकर अंदाजा लगा सकते हैं. ऐन प्यूरीफायर से सटे मकान के बाहर जुड़ुवां बच्चियां नजर आती हैं. इनके पांव टेढ़े होने लगे हैं. मैं जब इनकी तसवीर लेने लगता हूं तो ये डर के मारे रोने लगती हैं. एक और बच्चा है, साल भर का भी नहीं होगा, मगर पांव टेढ़े हो गये हैं. गांव के लोग बताते हैं कि ये लोग इसी प्यूरीफायर का पानी पीते हैं. फिर ऐसा क्यों हुआ? इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं है. मगर इसका मतलब है, पांच साल पहले लगे इस प्यूरीफायर ने फ्लोराइड मुक्त करना बंद कर दिया है.
बाद में कुछ सरकारी सूत्रों से जानकारी मिलती है कि लखनऊ की संस्था वाटर लाइफ ने इन संयंत्रों को स्थापित किया था और निगरानी और मरम्मत का ठेका भी उनके ही पास है. फ्लोराइड ट्रीटमेंट प्लांट में नियमित निगरानी की जरूरत होती है और मशीन खराब हो जाये तो उसे ठीक करना और तयशुदा वक्त पर उसके मेंब्रेन को बदलना जरूरी होता है. मगर इंस्टॉलेशन के बाद लखनऊ की वह संस्था दुबारा लौट कर इन गांवों में आयी ही नहीं. लिहाजा इन प्लांट से जो पानी साफ हो रहा है वह गांव के लोगों की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा. सरकारी रिकार्ड्स में इन गांवों को फ्लोराइड मुक्त मान लिया गया है. मगर फ्लोराइड ने एक बार फिर गांव के बच्चों पर हमला कर दिया है.
पिछले साल मैं नवादा के कचरियाडीह गांव में भी गया था (रिपोर्ट पढ़ें). वहां की हालत भी कुछ ऐसी ही थी. मेंटेनेंस के अभाव में प्लांट बंद पड़ा था और एजेंसी गायब थी. सरकारी खातों में उस गांव को भी फ्लोराइड मुक्त मान लिया गया था. दरअसल पूरे दक्षिण बिहार में लोग जाने-अनजाने फ्लोराइड युक्त पानी पी रहे हैं. बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 11 जिलों की 4157 बस्तियों के पानी में फ्लोराइड की मात्रा तयशुदा मानक से अधिक है. ये जिले हैं, नालंदा, औरंगाबाद, भागलपुर, नवादा, रोहतास, कैमूर, गया, मुंगेर, बांका, जमुई और शेखपुरा. हालांकि वास्तविक धरातल पर अगर इमानदारी से पता किया जाये तो ये आंकड़े भी गलत साबित होंगे. इन आंकड़ों के मुताबिक गया की सिर्फ 129 बस्तियों में ही फ्लोराइड की मात्रा मानकों से अधिक है. मगर सरकारी सूत्र ही बताते हैं कि ऐसी बस्तियों की संख्या 517 है.
जानकार बताते हैं कि हड्डियों का मुड़ना फ्लोरोसिस का अंतिम चरण है. इसके अलावा भी इस रोग के कारण कई परेशानियां होती हैं. जैसे, खाने का नहीं पचना, गैस्ट्रिक्ट, दांतों का घिसना, जोड़ों का दर्द. अब इन रोगों को कोई फ्लोरोसिस के तौर पर नहीं लेता. वह नहीं मानता कि उसके पेयजल में कोई खराबी है. लिहाजा एक बड़ी आबादी जाने-अनजाने फ्लोराइड युक्त पानी पीती रहती है. वह इन छोटी-मोटी बीमारियों का शिकार होती रहती है.
बिहार के लोगों के लिए फ्लोराइड संक्रमण ही एक बड़ा खतरा नहीं है. मध्य बिहार के 13 जिले आर्सेजिक के कहर के शिकार हैं. ये जिले हैं- बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगुसराय, भागलपुर, लखीसराय, मुंगेर, खगड़िया, दरभंगा और कटिहार. उसी तरह कोसी-सीमांचल के नौ जिलों के लोग आयरनयुक्त जल पीने को विवश हैं. ये जिले हैं, खगड़िया, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, सुपौल, किशनगंज, बेगूसराय, मधेपुरा और सहरसा.
यानी तकरीबन पूरा बिहार पीने के पानी में आर्सेनिक, आयरन या फ्लोराइड जैसे विषैले तत्वों को पीने के लिए विवश है. अब एक नया जहरीला तत्व सामने आया है, नाइट्रेट, जो गर्भस्थ और नवजात शिशुओं के लिए काल के समान है. इन तत्वों की वजह से बड़ी आबादी तरह-तरह की छोटी-बड़ी बीमारियों की चपेट में है, मगर आज चुनावी बहस में शुद्ध पेयजल का सवाल किसी की जुबान पर नहीं है. उनकी जुबान पर भी नहीं, जिनकी वजह से पीने का पानी ही उनके लिए जानलेवा हो गया है.

2 comments:

अजय कुमार झा said...

आपकी एक पोस्ट , पिछले दिनों लगभग बाढ़ की तरह आ रही मीडिया रिपोर्टों पर भारी है पुष्यमित्र जी | शुक्र है सोशल मीडिया का कि अब वास्तविक वस्तुस्थिति यहीं देखने पढने सुनने को मिल रही है

पुष्यमित्र said...

शुक्रिया अजय जी...