Monday, October 12, 2015

खाली बतवे के बोरिंग चलावल करे हे नेताजी


चुनावी जमीन पर मुद्दों की पड़ताल 3
खेती की राजनीति
केड़िया ग्राम, बरहट प्रखंड, जमुई जिला
जीतेगा भाई जीतेगा लालटेन छाप जीतेगा... हमारा नेता कैसा हो अजै प्रताप जैसा हो.... फलां छाप पर मोहर लगा कर विजै बनावें... यह चुनाव आपकी तकदीर बदल देगा... बदलिये बिहार... फिर से नीतीश कुमार... लाउडस्पीकर लगातार चीख रहा था. शाम होने से पहले पार्टी वाले भोंपू गाड़ी को मोहलत देने के लिए तैयार नहीं थे. शाम में तो प्रचार अभियान बंद हो ही जाना था. इसी शोरगुल के बीच यह संवाददाता जमुई के केड़िया गांव पहुंचा. आप केड़िया गांव को जानते हैं... ? क्यों जानें, आखिर क्या है, इस गांव में... ? 94 किसान परिवारों की साधारण सी नजर आने वाली इस बस्ती में कि इसे पूरे बिहार के लोग जानें. ऐन चुनाव के वक्त उसकी चर्चा की जाये. क्या खास है...
वैसे देखा जाये तो कुछ बहुत खास नहीं है. इस गांव के सभी किसानों ने पिछले साल दृढ़ निश्चय करके यह तय कर लिया कि वे रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल करना छोड़ देंगे. हालांकि अभी इनका इस्तेमाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. गांव वाले कहते हैं, नशा कभी एक बार में नहीं छोड़ाना चाहिये.. धरती को भी यूरिया-डीएपी का नशा लगा हुआ है और किसान को तो पैसों का नशा है ही... धीरे-धीरे छूटेगा. इसके बावजूद इस गांव में कीटनाशकों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद है, रासायनिक खाद का प्रयोग एक चौथाई रह गया है. इसके बदले किसान जीवामृत, अमृत जल, केचुआ खाद, अग्नेयास्त्र और क्या-क्या तरीके आजमाते हैं पता नहीं. पड़ोस के गांव के किसान हैरत में हैं कि बताइये बिना यूरिया-डीएपी के धान छाती भर का हो गया है. क्या जादू करते हैं, ये लोग.
अब केड़िया गांव वाले अपने खेत में चाहे जो भी जादू-टोना करें, हमें इससे क्या मतलब. हम तो यह समझने गये थे कि चुनाव में नेताजी लोग तरह-तरह का फार्मूला बता रहे हैं. बिहार के किसानों का तकदीर बदल देंगे, ऐसा कह रहे हैं. इसके बारे में केड़िया के जादूगर किसानों का क्या कहना है?
आनंदी यादव जी, आप ही बताइये. आप प्रगतिशील किसान हैं. बीजेपी वालों के दृष्टिपत्र में लिखा है कि किसानों के लिए अलग फीडर बना कर सिंचाई के लिए कम से कम 10 घंटे बिजली उपलब्ध करायेंगे. ऐसा हो गया तो आप लोगों का तो सारा प्रोब्लम खतम ही हो जायेगा. मगर मेरे इस बात पर आनंदी यादव भड़क गये. कहने लगे, देखिये ऊ बिजली का खंभा. उस पर तार भी नहीं चढ़ा है. सरकार ऐसे ही काम करती है. आजादी के 60 साल बाद हमारे गांव में बिजली का खंभा गड़ा है. जबकि ऐसा नहीं है कि हमारा गांव कोई ऐल-गैल इंटीरियर में है. हाइवे से मात्र डेढ़ किमी अंदर है. पूर्व कृषि मंत्री का इलाका है. तब ई हाल है. पूरी दुनिया के किसान को पूछिये तो वह यही कहेगा कि आप खाली उसके खेत में पानी का इंतजाम करवा दीजिये, बांकी वह सलट लेगा.
जब से खेती शुरू हुआ है किसान एक ही मांग कर रहा है. मगर सतजुग से आज तक कोई सरकार ऐसी नहीं हुई जो किसान के खेत में पानी का सही इंतजाम करा सके. हमलोगों ने पंचायत से मांग की कि हमारे खेतों में 10 फुटिया (10 फुट चौड़ाई वाला) एक-एक कुआं दे दीजिये, उसी से हमारा काम हो जायेगा. मगर वह भी नहीं मिला. शायद जादवों का गांव था इसलिए. अब सरकार ने डीजल पर सब्सिडी देना शुरू कर दिया. उसमें घुसखोरी अलग है. इसके अलावा हमलोग मानते हैं कि बोरिंग की सिंचाई से फायदा कम नुकसान ज्यादा है. गांव का वाटर लेयर तुरंत डाउन हो जायेगा. हम समझ गये कि सरकार से कुछ नहीं होगा. सारे किसान एकजुट हुए. गांव से एक कोस दूर एक कैनाल था, वहां से पइन खोदकर गांव तक ले आये. अब हर खेत तक पानी पहुंच रहा है. हालांकि इतने से ही काम पूरा नहीं हुआ है. साल में चार बार पूरा गांव पईन को साफ करता है, तब जाकर खेत में हरियाली आती है.
पास में ही बैठे थे, चुन्नी यादव. कहने लगे, सरकार के भरोसे रहेंगे तो हो गयी खेती. इनको चुनाव में किसान-किसान कहने दीजिये. भोट लेना है तो कुछ न कुछ तो कहेंगे. मगर सरकार बनने पर सब पार्टी एक जैसी हो जाती है. अब बीज की कहानी सुनिये, कहते हैं कि ब्लॉक में सरकारी बीज फिरी(फ्री) बंटता है. मगर लेने की कोशिश कीजिये तो पता चलेगा. सब्सिडी तो बाद में मिलेगा, पहले 300 रुपया किलो के दर से एडवांस पैसा जमा कराइये. अब बताइये, जब जुताई, सिंचाई, खाद और दस तरह के काम में किसान का बटुआ ढीला हो रहा है, उस वक्त दस किलो बीज के लिए एडवांस पैसा जमा कराना ही पड़ गया तो क्या फायदा. और फिर सरकारी बीज का कोई भरोसा नहीं, कब फ्लॉप हो जाये. फिर इसको दुबारा इस्तेमाल भी नहीं कर सकते. हवा हवाई योजना बनता है, ग्राउंड पर आकर देखिये कि जरूरत क्या है.
आनंदी यादव से बरदास्त नहीं होता है, कहने लगते हैं, घोषणा पत्र तो हम भी पढ़ रहे हैं, अब जैसे कह रहे हैं पैक्स को कंप्यूटराइज करेंगे. अरे कंप्यूटराइज बाद में कीजियेगा, पहले पैक्स और गल्ला व्यापारी का जो तालमेल है उसको तो तोड़िये. पिछले साल धान का सरकारी रेट 1,660 रुपये तय हुआ, मगर हमारे पंचायत का पैक्स वाला पहले धान खरीदने के लिए तैयार ही नहीं हुआ. लाचारी में किसानों को धान व्यापारियों को लागत की लागत में 1,050-1100 रुपये दर से बेचना पड़ा. बाद में पता चला कि गल्ला व्यापारी सब वही धान पैक्स को बेच दिया और मार्जिन आधा-आधा बांट लिया. सहदेव यादव बोले, हम तो किसी तरह अपना धान पड़ोस के पंचायत के पैक्स में बेच दिये, मगर उसका क्या लाभ. पेमेंट आज तक नहीं हुआ है.
किसानों ने बताया कि इस गांव से सिर्फ दो लोगों ने केसीसी से लोन लिया है. कहते हैं, केसीसी में अलग तरह का करप्शन है. लोन लेते वक्त ही 25-30 परसेंट कमीशन मांगते हैं. अधिकारी कहते हैं, लोन तो माफ होना ही है, इसलिए कोई टेंशन नहीं है. अब किसान इस डर से लोन नहीं लेते कि कहीं अगर किसी वजह से लोन माफ न हुआ तो चुकाना तो उन्हीं को पड़ेगा. तो कर्जा कहां से लेते हैं, इस सवाल पर लोगों ने कहा कि हमारे लिए बैंक आज भी वही व्यापारी हैं, जिनसे वे खाद-बीज खरीदते हैं, या जिन्हें अपनी उपज बेचते हैं. उनसे 5 रुपये सैकड़ा महीना की भारी दर से कर्ज लेना ही किसानों को विश्वसनीय तरीका मालूम होता है. वे कहते हैं, सरकारी कर्जे में बहुत गड़बड़ी है.
वहां बैठे एक बुजुर्ग किसान ने कहा कि राज्य के किसानों को ज्यादा कुछ नहीं चाहिये. बस हर खेत के लिए पानी का इंतजाम करा दे और फसल की सरकारी खरीद की व्यवस्था दुरुस्त करा दे, यही काफी है. अगर किसानों को उसके पैदावार की अच्छी कीमत समय से मिल जाये तो उसे कर्ज लेने की जरूरत भी नहीं पड़ेगा. और खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए भी ज्यादा कुछ नहीं करना है, बस हर किसान को एक-एक कुआं भी मिल जाये तो काफी है. उनकी बात में टीप लगाते हुए आनंदी यादव ने कहा, मगर चचा नेताजी इतना सीधा-सपाट बात बूझते थोड़े हैं... इस बीच सड़क से गुजरते प्रचार वाहनों के लाउडस्पीकर पर नारे बुलंद हो रहे थे, हर दाने की कीमत दिलायेंगे, हर खेत तक पानी पहुंचायेंगे... बिहार का पानी जिंदाबाद, बिहार की जवानी जिंदाबाद. इन नारों को सुनकर केड़िया गांव के किसानों ने जोरदार ठहाका बुलंद किया... सहदेव यादव ने चुटकी ली, खाली बतवे के बोरिंग चलावल करे हे नेताजी...
कहानी केड़िया गांव की
जमुई के बरहट ब्लॉक के पाड़ो पंचायत के इस गांव के सभी किसान परिवारों ने पिछली साल जैविक कृषि को अपनाया है. गांव में फिलहाल 32 किसानों के पास जैविक खाद तैयार करने के बेड हैं और 40 किसान इसे बनाने वाले हैं. गांव की समृद्धि के पीछे किसानों के पास पशुधन की उपलब्धता का बड़ा हाथ है. यहां तकरीबन हर किसान के पास 15-20 पालतू पशु तो हैं ही. कई किसानों के पास यह संख्या 70-75 तक पहुंच गयी है. उन्होंने जैविक खाद के साथ-साथ बायोगैस प्लांट भी स्थापित कराये हैं, जिनसे उनके घरों का गैस चूल्हा जलता है. उनका लक्ष्य 2020 तक गांव को रासायनिक खाद से मुक्त कर देना है. किसान स्वाबलंबी हैं. अपने खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए उन्होंने खुद 4-5 किमी लंबी पईन खोदी है. 4-5 किमी लंबा रास्ता तैयार किया है. आज आसपास के गावों के लिए यहां की उन्नत खेती अनुकरणीय साबित हो रही है. गांव के सभी किसानों ने मिल कर एक संगठन भी बनाया है, जीवित माटी किसान समिति. इस गांव के किसानों की आत्मनिर्भरता और स्वाबलंबन को देखते हुए ग्रीन पीस संस्था ने पिछले साल से वहां काम की शुरुआत की है. संस्था की ओर से इश्तेयाक अहमद किसानों को जैविक खेती के गुर सिखाते हैं और उनकी खेती को बेहतर बनाने में हर तरह से उनकी मदद करते हैं.
घोषणा पत्रों में खेती की बात
भाजपा के दृष्टि पत्र में पृथक कृषि बजट, सिंचाई के लिए अलग फीडर, 10 घंटे न्यूनतम बिजली, पैक्सों का कंप्यूटराइजेशन, मिट्टी जांच, जीरो परसेंट कृषि ऋण आदि के वायदे किये गये हैं. रोचक यह है कि नीतीश कुमार के सात निश्चय में खेती का कहीं उल्लेख ही नहीं है. महागंठबंधन के कॉमन मिनिमन प्रोग्राम में कृषि के विकास का उल्लेख जरूर है.
(प्रभात खबर में प्रकाशित)

1 comment:

Firoz Ahmad said...

mai aap se baat karna cha raha hu dr firoz 9044918670